पंत रचित ‘भारतमाता’ कविता का सारांश लिखें।

पंत रचित ‘भारतमाता’ कविता का सारांश लिखें। उत्तर :- भारतमाता’ शीर्षक कविता पंत का श्रेष्ठ प्रगीत है। इसमें हर तत्कालीन भारत (परतंत्र भारत) का यथार्थ चित्र प्रस्तुत किया है। यह प्रगीत भावात्मक कम विचारात्मक ज्यादा है। कवि कहता है कि भारतमाता गाँवों में निवास करती है। ग्रामवासिनी भारतमाता का धूल से भरा हुआ, मैला-सा श्यामल … Read more

‘स्वदेशी’ कविता का मूल भाव क्या है? सारांश में लिखिए।

‘स्वदेशी’ कविता का मूल भाव क्या है? सारांश में लिखिए। उत्तर :- स्वदेशी कविता का मूल भाव है कि भारत के लोगों से स्वदेशी भावना लुप्त हो गई है। विदेशी भाषा, रीति-रिवाज से इतना स्नेह हो गया है कि भारतीय लोगों का रुझान स्वदेशी के प्रति बिल्कुल नहीं है। सभी ओर मात्र अंग्रेजी का बोलबाला … Read more

कवि भारतमाता को गीता-प्रकाशिनी मानकर भी ज्ञानमूढ़ क्यों कहता है ?

कवि भारतमाता को गीता-प्रकाशिनी मानकर भी ज्ञानमूढ़ क्यों कहता है ? उत्तर :- परतंत्र भारत की ऐसी दुर्दशा हुई कि यहाँ के लोग खुद दिशाविहीन हो गये, दासता में बँधकर अपने अस्मिता को खो दिये । आत्म-निर्भरता समाप्त हो गई। इसलिए कवि कहता है कि भारतमाता गीता- प्रकाशिनी है, फिर भी आज ज्ञानमूढ़ बनी हुई … Read more

कवि की दुष्टि में आज भारतमाता का तप-संयम क्यों सफल है ?

कवि की दुष्टि में आज भारतमाता का तप-संयम क्यों सफल है ? उत्तर :- किन्तु भारतमाता ने गाँधी जैसे पूत को जन्म दिया और अहिंसा का स्तन्यपान अपने पुत्रों को कराई है । अतः विश्व को अंधकारमुक्त करनेवाली, संपूर्ण संसार को अभय का वरदान देनेवाली भारत माता का तप-संयम आज सफल है । हमसे जुड़ें, … Read more

भारतमाता का हास भी राहग्रसित क्यों दिखाई पड़ता है ?

भारतमाता का हास भी राहग्रसित क्यों दिखाई पड़ता है ? उत्तर :- भारतमाता के स्वरूप में ग्राम्य शोभा की झलक है। मुखमंडल पर चंद्रमा के समान दिव्य प्रकाशस्वरूप हँसी है, मुस्कुराहट है। लेकिन, परतंत्र होने के कारण वह हँसी फीकी पड़ गई है। ऐसा प्रतीत होता है कि चन्द्रमा को राहु ने ग्रस लिया है। … Read more

भारतमाता शीर्षक कविता में पंत जी ने भारतीयों का कैसा चित्र खींचा है ?

भारतमाता शीर्षक कविता में पंत जी ने भारतीयों का कैसा चित्र खींचा है ? उत्तर :- प्रस्तुत कविता में कवि ने दर्शाया है कि परतंत्र भारत की स्थिति दयनीय हो गई थी। परतंत्र भारतवासियों को नंगे वदन, भूखे रहना पड़ता था। यहाँ की तीस करोड़ जनता शोषित-पीड़ित, मूढ, असभ्य, अशिक्षित, निर्धन एवं वृक्षों के नीचे … Read more

भारतमाता अपने ही घर में प्रवासिनी क्यों बनी हुई है ?

भारतमाता अपने ही घर में प्रवासिनी क्यों बनी हुई है ? उत्तर :-भारत को अंग्रेजों ने गुलामी की जंजीर में जकड़ रखा था। परतंत्रता की बेड़ी में जकड़ी, काल के कुचक्र में फंसी विवश, भारतमाता चुपचाप अपने पुत्रों पर किये गये अत्याचार को देख रही थी। इसलिए कवि ने परतंत्रता को दर्शाते हए मुखरित किया … Read more

भारतमाता कहाँ निवास करती है ?

भारतमाता कहाँ निवास करती है ? उत्तर :- कविता के प्रथम अनुच्छेद में भारतमाता को ग्रामवासिनी मानते हुए तत्कालीन भारत का यथार्थ चित्रण किया गया है कि भारतमाता का फसलरूपी श्यामल शरीर है, धूल-धूसरित मैला-सा आँचल है। गंगा-यमुना के जल अश्रुस्वरूप हैं। ग्राम्य छवि को दर्शाती हुई भारत माँ की प्रतिमा उदासीन है। हमसे जुड़ें, … Read more

निम्नलिखित पंक्तियों की सप्रसंग व्याख्या करें :

निम्नलिखित पंक्तियों की सप्रसंग व्याख्या करें : “दास-वृत्ति की चाह चहूँ दिसि चारहु बरन बढ़ाली करत खुशामद झूठ प्रशंसा मानह बने डफाली।” उत्तर :- प्रस्तुत पंक्तियाँ कवि ‘प्रेमघन’ की ‘स्वदेशी’ कविता की है । इन दोहों में राष्ट्रीय स्वाधीनता की चेतना को सहचर बनाया गया है। साथ ही, नवजागरण का स्वर मुखरित किया गया है। … Read more

‘मनुज भारती देखि कोउ, सकत नहीं पहिचान’ की व्याख्या करें।

‘मनुज भारती देखि कोउ, सकत नहीं पहिचान’ की व्याख्या करें। उत्तर :- प्रस्तुत पंक्ति हिन्दी साहित्य की पाठ्य-पुस्तक के ‘स्वदेशी’ शीर्षक पद .. से उद्धृत है। इसकी रचना देशभक्त कवि बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ द्वारा की … गई है। इसमें कवि ने देशप्रेम के भाव को जगाने का प्रयास किया है। प्रस्तुत व्याख्येय पंक्ति में कवि … Read more