“भारतीय राजनीतिक दलीय व्यवस्था राष्ट्रोन्मुखी न होकर व्यक्ति उन्मुखी है।” इस तथ्य को बिहार राज्य के परिप्रेक्ष्य में स्पष्ट कीजिए।

“भारतीय राजनीतिक दलीय व्यवस्था राष्ट्रोन्मुखी न होकर व्यक्ति उन्मुखी है।” इस तथ्य को बिहार राज्य के परिप्रेक्ष्य में स्पष्ट कीजिए।

अथवा

 संविधान निर्माण में बहुदलीय राजनीतिक व्यवस्था के उद्देश्यों को उद्घाटित करें।
अथवा
आजादी के बाद राष्ट्रीय फलक पर राजनीतिक दलों का संगठन की जगह व्यक्तिकेन्द्रीत दलीय व्यवस्था की चर्चा करें।
अथवा
क्षेत्रीयस्तर पर विभिन्न राजनीतिक दलों के उत्थान एवं व्यक्तिकेन्द्रीत राजनीति का उल्लेख करें।
उत्तर – स्वतंत्र भारत के हमारे राष्ट्रनिर्माताओं ने देश का विधान ‘संविधान’ के निर्माण में इसकी विविधता और विशालता को ध्यान में रखते हुए भारत को एक लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने हेतु एक बहुदलीय राजनीतिक व्यवस्था की संकल्पना की थी। जिसका मुख्य उद्देश्य था – ‘लोकतंत्र में सबकी भागीदारी, सबकी जिम्मेदारी है। इस संकल्पना का मूलमंत्र था भारत को ‘अनेकता में एकता’ के सूत्र में बांधना और नागरिकों में राष्ट्रोन्मुखी भावना पैदा करना । राजनीतिक दलों को जाति, धर्म, सम्प्रदाय, भाषा अथवा क्षेत्रवाद से ऊपर उठकर देश सेवा और त्याग से राष्ट्र सेवक बनाना, राजनीति को रोजगार समझने की बजाय देश सेवा अथवा जन सेवा का अवसर मानना । लेकिन कालांतर में आजादी के आठवें दशक में आते-आते भारतीय राजनीतिक दलीय व्यवस्था में सामूहिक अथवा संगठनात्मक भागीदारी की जगह व्यक्तिनिष्ठता की भावना में निरंतर उभार आने लगा। पार्टियों की पहचान अब संगठन अथवा दल की जगह व्यक्ति विशेष से होने लगी। उनके समर्थकों (जनता) की निष्ठा और विश्वास किसी दल विशेष से ज्यादा एक व्यक्ति में निहित होने लगा। अगर राष्ट्रीय फलक पर उदाहरण के तौर पर देखें तो भारतीय राजनीति सात दशक को हम नेहरू युग, इंदिरा युग, अटल युग और अब मोदी युग के नाम से ही ज्यादा जानते हैं। इनमें पार्टियां अथवा दलों के नाम लगभग गौण हो जाते हैं। इसी तरह राज्य स्तर पर बात करें तों कई राज्यों में पार्टियों की पहचान उनके नायकों/ नेताओं से ही जाना-माना जाता है। इसके विपरीत राष्ट्रोन्मुखी राजनीति में दलों की पहचान उनके संगठन अथवा विचारधारा के आधार पर होती है, इसमें लोगों की आस्था या निष्ठा व्यति से ज्यादा सामूहिकता अथवा संगठन में होता है। आजादी से पहले जितने भी स्वतंत्रता संग्राम में पार्टियां अथवा दल बनें थे वे सभी संगठन अथवा संस्था के नाम से जाने जाते थे। हां, कुछ अपवादस्वरूप वैयक्तिक अथवा निजी संगठन व्यक्ति विशेष के नाम से जरूर पहचाने गए।
इधर कुछ दशकों की राजनीति की बात करें तो देश में केन्द्र सरकार हो या कोई राज्य सरकार इन दोनों स्तरों की सरकारों में व्यक्तिग हस्तक्षेप आज कहीं ज्यादा मौजूद है। सरकार द्वारा लिए गये निर्णयों में इनके व्यक्तिगत हस्तक्षेप भारतीय दलीय व्यवस्था में राष्ट्र के हित की अपेक्षा राजनीतिक दल तथा उनके नेताओं की आकाक्षाओं के प्रति उन्मुखता का भाव प्रकट करता है।
अगर वर्तमान संदर्भ में बिहार विशेष की बात करें तो भाजपा की पहचान नरेन्द्र मोदी से है तो राजद की पहचान लालू यादव से है तो जेडीयू की पहचान नीतीश कुमार से है, लोजपा की पहचान रामविलास पासवान से है तो हम पार्टी की पहचान जीतन राम मांझी से है। इस प्रकार 2020 का बिहार विधान सभा चुनाव भी सभी दलों ने व्यक्ति विशेष के नाम पर ही लड़े थे ।
निष्कर्षतः आजादी के बाद के सात दशकों के अध्ययन स्वरूप हम पाते हैं कि भारत में केन्द्रीय तथा राज्य स्तरों पर सत्ताध ारी सरकारों का उद्देश्य राष्ट्रोन्मुखीता से अधिक येन-केन प्रकारेणा अपने राजनीतिक दल को अधिक संगठित कारने का होता है। और उनकी पार्टी की पहचान किसी खास नेता की धुरी के इर्द-गिर्द ही घूमती रहती है।
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