हर सामाजिक विभिन्नता सामाजिक विभाजन का रूप नहीं लेती। कैसे ?

हर सामाजिक विभिन्नता सामाजिक विभाजन का रूप नहीं लेती। कैसे ?

उत्तर- यह कोई जरूरी नहीं कि हर सामाजिक विभिन्नता सामाजिक विभाजन का रूप ले ले। सामाजिक विभिन्नता के कारण लोगों में विभेद की विचारधारा अवश्य बनती है, परंतु यही विभिन्नता कहीं-कहीं पर समान उद्देश्य के कारण मूल का काम भी करती है। सामाजिक विभाजन एवं विभिन्नता में बहुत बड़ा अंतर है। सामाजिक विभाजन तब होता है जब कुछ सामाजिक अंतर दूसरी अनेक विभिन्नताओं से ऊपर और बड़े हो जाते हैं। संवर्णों एवं दलितों के बीच अंतर एक सामाजिक विभाजन है, क्योंकि दलित संपूर्ण देश में आम तौर पर गरीब, वंचित एवं बेघर हैं तथा भेदभाव के शिकार हैं, जबकि सवर्ण आमतौर पर सम्पन्न एवं सुविधायुक्त हैं। अर्थात् दलितों को महसूस होने लगता है कि वे दूसरे समुदाय के है। परंतु, इन सबके बावजूद जब क्षेत्र अथवा. राष्ट्र की बात होती है तो सभी एक हो जाते हैं। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि हर सामाजिक विभिन्नता सामाजिक विभाजन का रूप नहीं लेती।

Ajit kumar

Sub Editor-in-Chief at Jaankari Rakho Web Portal

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