कार्बनिक यौगिक (Organic Compounds)

कार्बनिक यौगिक (Organic Compounds)

कार्बनिक यौगिक (Organic Compounds)

हाइड्रोकार्बन और उनके व्युत्पन्न (derivatives) अर्थात् कार्बन के यौगिक CO, CO2, कार्बोनेटों और बाइकार्बोनेटों को छोड़कर कार्बनिक यौगिक कहलाते हैं। सन् 1780 के आस-पास यह धारणा थी कि प्रयोगशाला में कार्बनिक यौगिक का संश्लेषण नहीं किया जा सकता है लेकिन केवल सजीवों द्वारा ही इनका संश्लेषण किया जा सकता है। यही कारण है कि इन यौगिकों को निरूपित करने के लिए ऑर्गेनिक (organic) शब्द का प्रयोग किया गया। ऑर्गेनिक एक एंग्लो शब्द है जिसका अर्थ ‘बायो’ (या सजीव) है।
स्वीडिश वैज्ञानिक बजलियस ने प्रतिपादित किया कि ‘जैव शक्ति’ (vital force) कार्बनिक यौगिकों के निर्माण के लिए उत्तरदायी है। (जैव शक्ति सिद्धान्त ) |
एफ वोल्हर (1828) ने संयोग से अकार्बनिक यौगिकों अमोनियम सल्फेट और पोटैशियम सायनेट से कार्बनिक यौगिक यूरिया का संश्लेषण किया, जब वह इन यौगिकों से अमोनियम सायनेट बनाने की कोशिश कर रहे थे।
बाद में, कोल्बे (1845) द्वारा ऐसिटिक अम्ल का संश्लेषण इसके अवयवी तत्वों से, बर्थलोट (1856 ) द्वारा मेथेन के संश्लेषण के परिणामस्वरूप यह दिखाया गया कि कार्बनिक यौगिकों को अकार्बनिक स्रोतों से प्रयोगशाला में संश्लेषित किया जा सकता है।
पेट्रोलियम : कार्बनिक यौगिकों के एक स्रोत के रूप में (Petroleum : as a Source of Organic Compounds) 
पेट्रोलियम मुख्यतया ऐलिफैटिक हाइड्रोकार्बनों तथा अल्प मात्रा में ऐरोमैटिक हाइड्रोकार्बनों का मिश्रण है। इसमें अल्प मात्रा में सल्फर तथा नाइट्रोजन के कार्बनिक यौगिक भी पाए जाते हैं।
◆ पेट्रोलियम को रॉक ऑयल (पेट्रा = चट्टान, ओलियम = तेल) काला सोना और द्रव सोना (इसकी वाणिज्यिक महत्ता के कारण) भी कहते हैं।
◆ इन दिनों पक्की सड़कों के निर्माण में कोलतार के स्थान पर एक पेट्रोलियम उत्पाद बिटुमेन का प्रयोग किया जाता है।
◆ विश्व का पहला तेल का कुआँ, पेनसिलवेनिया अमेरिका में 1859 में प्रवोधित (ड्रिल) किया गया था।
◆ रुका हुआ पानी टार से बनी सड़कों को क्षतिग्रस्त कर देता है।
◆ बायोडीजल ट्रांसएस्टरीफिकेशन प्रक्रिया से प्राप्त किया जाता है।
पेट्रोरसायन (Petrochemicals)
पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस से अनेक उपयोगी पदार्थ प्राप्त किए जाते हैं। इन्हें पेट्रोरसायन कहते हैं। संतृप्त हाइड्रोकार्बन (मेथेन, एथेन, प्रोपेन, आदि), असंतृप्त हाइड्रोकार्बन (एथिलीन, प्रोपिलीन, आदि), ऐरोमैटिक हाइड्रोकार्बन (बेन्जीन, टॉलुईन), ऐल्कोहॉल, फॉर्मेल्डिहाइड, ऐसीटोन, ऐसीटिक अम्ल, आदि कुछ पेट्रोरसायनों के उदाहरण हैं।
उपयोग (Uses) पेट्रोरसायनों का उपयोग अपमार्जक (detergents), रेशे (पॉलीएस्टर, नायलॉन, ऐक्रिलिक, आदि), पॉलीथीन और अन्य मानव निर्मित प्लास्टिक आदि के औद्योगिक निर्माण में किया जाता है। प्राकृतिक गैस से प्राप्त हाइड्रोजन गैस का उपयोग उर्वरकों (यूरिया) के उत्पादन हेतु किया जाता है।
कार्बनिक यौगिकों का वर्गीकरण (Classification of Organic Compounds) 
अचक्रीय अथवा विवृत्त श्रृंखला यौगिक (Acyclic or Open Chain Compounds) 
इन यौगिकों को ऐलिफैटिक (वसीय यौगिक) भी कहा जाता है। ये सीधी या शाखित विवृत श्रृंखला (branched open chain) के बने होते हैं
उदाहरण
मेथेन सबसे सरल ऐलिफैटिक यौगिक है और बेन्जीन सबसे सरल ऐरोमैटिक यौगिक है अतः इन्हें अपनी संगत श्रेणियों (respective classes) का पिता अर्थात् मूल (parent) यौगिक माना जाता है।
ऐलिसाइक्लिक यौगिक या बन्द शृंखला या वलय यौगिक (Alicyclic or Closed Chain Compounds)
इन यौगिकों में कार्बन परमाणु जुड़कर एक वलय समचक्रीय बनाते हैं। कभी-कभी वलय में कार्बन के अलावा अन्य परमाणु होते हैं (विषम चक्रीय) |
उदाहरण
ये ऐरोमैटिक यौगिकों की अपेक्षा अचक्रीय (ऐलिफैटिक) यौगिकों से अधिक मिलते जुलते हैं।
ऐरोमैटिक यौगिक (Aromatic Compounds)
ऐरोमैटिक शब्द ग्रीक शब्द ऐरोमा जिसका अर्थ ‘सुगन्ध’ है से लिया गया था। इन यौगिकों में बेन्जीन (छः कार्बन से बना वलय यौगिक जिसमें एकान्तर क्रम में एकल और द्विआबन्ध होते हैं) तथा दूसरे सम्बन्धित वलय यौगिक (बेन्जिनॉइड) हैं। ऐलिसाइक्लिक यौगिकों की तरह, ऐरोमैटिक यौगिकों में वलय में विषम परमाणु हो सकता है (विषम चक्रीय ऐरोमैटिक यौगिक ) |
उदाहरण
क्रियात्मक समूह अथवा प्रकार्यात्मक समूह (Functional Group)
किसी कार्बनिक यौगिक में विशिष्ट प्रकार से जुड़ा परमाणु या परमाणुओं का समूह, जो कार्बनिक यौगिकों में अभिलाक्षणिक (characteristic) रासायनिक गुणों के लिए उत्तरदायी होता है, क्रियात्मक समूह या प्रकार्यात्मक समूह कहलाता है।
सजातीय श्रेणियाँ (Homologous Series) 
कार्बनिक यौगिकों के समूह अथवा ऐसी श्रेणी, जिसमें एक विशिष्ट क्रियात्मक समूह हो सजातीय श्रेणी बनाते हैं। इसके सदस्यों को सजात (homologues) कहते हैं। उदाहरण मेथेन (CH4), एथेन (C2H6), प्रोपेन (C3H8), ब्यूटेन (C4H10), आदि सीधे श्रृंखला ऐल्केन हैं।
इसी प्रकार मेथिल ऐल्कोहॉल (CH3 OH), एथिल ऐल्कोहॉल (C2H5 OH), प्रोपिल ऐल्कोहॉल (C3H7 OH), ब्यूटिल ऐल्कोहॉल (C4H9 OH) और एमिल ऐल्कोहॉल (C5H11 OH), आदि ऐल्कोहॉल श्रेणी के समजात हैं। इस घटना को समजातीयता (homology) कहते हैं ।
सजातीय श्रेणी के लक्षण (Characteristics of Homologous Series ) 
(i) सजातीय श्रेणी के सदस्यों को एक सामान्य सूत्र द्वारा प्रदर्शित किया जा सकता है। जैसे ऐल्केन श्रेणी का सामान्य सूत्र CnH2n+2, ऐल्कीन का CnH2n तथा ऐल्कोहॉल का CnH2n+1 .OH है।
(ii) सजातीय श्रेणी के क्रमागत सदस्यों के अणुसूत्रों के मध्य CH2 इकाई का अन्तर होता है।
(iii) सजातीय श्रेणी के क्रमागत सदस्यों के आण्विक द्रव्यमानों में 14 u का अन्तर होता है।
(iv) किसी श्रेणी के सभी सदस्यों को कुछ सामान्य प्रतिक्रियाओं द्वारा बनाया जा सकता है।
(v) किसी भी श्रेणी के सभी सदस्यों के भौतिक गुणधर्मों जैसे क्वथनांक, गलनांक, घनत्व आदि में अणुभार वृद्धि के साथ-साथ क्रमिक परिवर्तन होता है।
(vi) किसी भी श्रेणी के सभी सदस्यों के रासायनिक गुणधर्म लगभग समान होते हैं क्योंकि सभी सदस्यों में एक ही क्रियाशील समूह होता है।
समावयवता (Isomerism )
दो या दो से अधिक यौगिक जिनके अणुसूत्र समान हो, किन्तु गुण अथवा विन्यास (configuration) भिन्न हों) समावयव (isomers) कहलाते हैं और इस परिघटना को ‘समावयवता’ कहते हैं।
समावयवता दो प्रकार की होती है
1. संरचनात्मक समावयवता (Structural Isomerism) 
यौगिक जिनके अणुसूत्र समान होते हैं, किन्तु संरचना भिन्न होती है, उन्हें संरचनात्मक समावयवियों में वर्गीकृत किया जाता है।
उदाहरण आण्विक सूत्र C2H12 के तीन श्रृंखला समावयवी (i) n-पेन्टेन (ii) आइसो-पेन्टेन और (iii) निओ-पेन्टेन हैं। जिनके संरचना सूत्र इस प्रकार है
संरचनात्मक समावयवता चार प्रकार की होती है
(i) श्रृंखला समावयवता
(ii) स्थिति समावयवता
(iii) क्रियात्मक समूह समावयवता
(iv) मध्यावयवता
2. त्रिविम समावयवता (Stereoisomerism)
त्रिविम समावयव वे यौगिक हैं जिनमें संरचना एवं परमाणुओं के आबन्धन का क्रम तो समान रहता है, परन्तु उनके अणुओं में परमाणुओं अथवा समूहों की त्रिविम स्थितियाँ भिन्न रहती है। इस प्रकार की समावयवता त्रिविम समावयवता कहलाती है।
त्रिविम समावयवता दो प्रकार की होती हैं
(i) ज्यामितीय समावयवता (geometrical isomerism)
(ii) प्रकाशीय समावयवता (optical isomerism)
हाइड्रोकार्बन (Hydrocarbon)
हाइड्रोकार्बन शब्द का अर्थ है केवल हाइड्रोजन और कार्बन के यौगिक । पेट्रोलियम या कच्चा तेल इनका प्राकृतिक स्रोत है हाइड्रोकार्बन विभिन्न प्रकार के होते हैं। कार्बन-कार्बन आबन्धों के प्रकार के आधार पर इन्हें तीन मुख्य वर्गों में वर्गीकृत किया गया है
1. संतृप्त हाइड्रोकार्बन (Saturated Hydrocarbons) 
इनमें कार्बन-कार्बन तथा कार्बन-हाइड्रोजन एकल आबन्ध होते हैं।
ये दो प्रकार के होते हैं
(i) ऐल्केन या पैराफिन (Alkanes or Paraffin) पैराफिन एक लैटिन शब्द है जिसका अर्थ है ‘अल्प क्रियाशील’, अतः ये रासायनिक रूप से अधिकांश रसायनों के प्रति निष्क्रिय हैं। इन यौगिकों में, विभिन्न कार्बन परमाणु एक दूसरे से एकल आबन्धों द्वारा जुड़कर कार्बन परमाणुओं की खुली श्रृंखला बनाते हैं। ऐल्केनों का सामान्य सूत्र CnH2n+ 2 होता है। मेथेन इस परिवार का प्रथम सदस्य है।
परिवार के दूसरे सदस्य द्रव्यमान के बढ़ते क्रम के साथ इस प्रकार हैं
एथेन (C2H6)<प्रोपेन (C3H8)<ब्यूटेन (C4H10)< पेन्टेन (C5H12) < हेक्सेन (C6H14) < हेप्टेन (C7H16) | मेथेन या मार्श गैस (Methane or Marsh Gas), CH4 यह साधारण ताप पर गैस है। यह दलदली स्थानों में वनस्पतियों के सड़ने से (जीवाणुओं द्वारा अपघटन से) बुलबुलों के रूप में उत्पन्न होती रहती है अतः इसे मार्श गैस भी कहते हैं। सामान्यतः यह सेप्टिक टैंक के द्वारा भी मुक्त होती रहती हैं।
प्रयोगशाला में यह सोडियम ऐसीटेट को सोडालाइम के साथ गर्म करके प्राप्त की जाती है। व्यापारिक स्तर पर इसे ऐलुमिनियम कार्बाइड पर जल या तनु हाइड्रोक्लोरिक गैस की अभिक्रिया द्वारा बनाया जाता है। इसकी आकृति चतुष्फलकीय होती है तथा दो C—H आबन्धों के बीच का कोण 109°28′ होता है। यह काले रंग की होती है।
मेथेन का उपयोग ईंधन के रूप में प्रकाश और ऊर्जा उत्पन्न करने में कार्बन ब्लैक, छापेखाने की स्याही बनाने में, मेथेनॉल के औद्योगिक उत्पादन में, कार्बनिक यौगिकों के संश्लेषण में तथा हाइड्रोजन के औद्योगिक उत्पादन में किया जाता है।
(ii) साइक्लोऐल्केन (Cycloalkane) साइक्लोऐल्केनों में कार्बन परमाणु बन्द शृंखला या वलय बनाते हैं। इनका सामान्य सूत्र CnH2n है। साइक्लोप्रोपेन (C3H8) इस परिवार का प्रथम सदस्य है। एकल आबन्ध से जुड़े दो कार्बन परमाणुओं के बीच की दूरी हमेशा बहुआबन्धों (द्विआबन्ध और त्रिआबन्ध) से जुड़े दो कार्बन परमाणु के बीच की दूरी से अधिक होती है। अतः एथेन में C — C आबन्ध लम्बाई एथीन, एथाइन और बेन्जाइन की अपेक्षा अधिक है।
2. असंतृप्त हाइड्रोकार्बन (Unsaturated Hydrocarbons)
असंतृप्त हाइड्रोकार्बनों में कार्बन-कार्बन बहुआबन्ध जैसे द्विआबन्ध, त्रिआबन्ध या दोनों उपस्थित होते हैं।
ये दो प्रकार के होते हैं
(i) ऐल्कीन (Alkenes) ये द्विआबन्ध युक्त असंतृप्त हाइड्रोकार्बन होते हैं। इनका सामान्य सूत्र CnH2n होता है। इनका प्रथम सदस्य एथिलीन अथवा एथीन C2H4 है। ऐल्कीनों के प्रथम सदस्य एथिलीन की अभिक्रिया क्लोरीन से कराने पर तैलीय द्रव प्राप्त होता है। अतः ऐल्कीनों को ओलीफीन (तैलीय यौगिक बनाने वाले) भी कहते हैं।
एथिलीन (Ethylene), C2H4 इसे एथिल ऐल्कोहॉल तथा सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल के मिश्रण को 160° से 170°C पर गर्म करके प्राप्त किया जाता है। इसका उपयोग पॉलिथीन प्लास्टिक, पॉलिविनाइल क्लोराइड तथा उच्च बहुलक बनाने में, अल्प मात्रा में निश्चेतक के रूप में, मस्टर्ड गैस बनाने में, फलों को पकाने तथा उन्हें सड़ने से रोकने के लिए और ऑक्सी एथिलीन ज्वाला उत्पन्न करने (वेल्डिंग में) किया जाता है। ट्राइक्लोरोएथिलीन भी शुष्क धुलाई (dry cleaning) में प्रयुक्त की जाती है।
ब्यूटीन (CH3 CH2CH=CH2) यह द्रवित पेट्रोलियम गैस का अवयव है और ईंधन के रूप में प्रयुक्त किया जाता है।
(ii) ऐल्काइन (Alkynes or Acetylenic Hydrocarbon) ये कम से कम एक त्रिआबन्ध युक्त असंतृप्त हाइड्रोकार्बन होते हैं। इनका सामान्य सूत्र CnH2n-2 होता है। इनका प्रथम सदस्य ऐसीटिलीन या ऐथाइन (C2H2) है। सिल्वर नाइट्रेट के साथ ऐसीटिलीन की अभिक्रिया इसके अम्लीय गुण को दर्शाती है।
ऐसीटिलीन (Acetylene), C2H2 सर्वप्रथम इसे अमेरिकी वैज्ञानिक विल्सन ने बनाया था। यह कैल्सियम कार्बाइड पर जल की अभिक्रिया द्वारा बनाई जाती है। ऐसीटिलीन का उपयोग ऑक्सीऐसीटिलीन ज्वाला (वेल्डिंग में) ताप 3200°C उत्पन्न करने में, अल्प मात्रा में निश्चेतक (नारसेलिन के रूप में), ल्यूसाइट नामक विषैली गैस बनाने में, बेन्जीन के संश्लेषण में, कपूर बनाने में, दीप्तिमान ज्वाला उत्पन्न करने में तथा फलों को कृत्रिम रूप से पकाने में तथा निओप्रीन नामक कृत्रिम रबड़ बनाने में किया जाता है।
3. ऐरोमैटिक हाइड्रोकार्बन (Aromatic Hydrocarbons)
इन्हें एरीन भी कहते हैं, क्योंकि इनके अधिकांश यौगिकों में विशिष्ट गन्ध होती है (ग्रीक शब्द एरोमा का अर्थ है सुगन्ध)। इनका सामान्य सूत्र CnH2n-6 होता है। इनमें अधिकांश यौगिकों में बेन्जीन वलय पाई जाती है। बेन्जीन, टॉलुईन, नेफ्थैलीन, बाइफेनिल, ऐन्थ्रासीन, आदि ऐरोमैटिक हाइड्रोकार्बन है।
बेन्जीन (Benzene), C6H6 बेन्जीन को सभी ऐरोमैटिक यौगिकों का जन्मदाता कहा जाता है। इसकी खोज सर्वप्रथम फैराडे ने सन् (1825) में की थी। फैराडे ने बेन्जीन को व्हेल मछली के तेल के भंजक आसवन से प्राप्त किया था। हॉफमान (Hofmann) ने कोलतार के प्रभाजी आसवन द्वारा इसे प्राप्त किया। कोलतार और पेट्रोलियम इसके मुख्य स्रोत हैं। रक्त तप्त नली में ऐसीटिलीन गैस प्रवाहित करके सर्वप्रथम बर्थेलोट ने बेन्जीन का संश्लेषण किया। इसका उपयोग अन्य ऐरोमैटिक यौगिकों के निर्माण में, तेल, वसा, रबड़ तथा अन्य पदार्थों के विलायक के रूप में, ऊनी कपड़ों की शुष्क धुलाई में किया जाता है। बेन्जीन और पेट्रोल के मिश्रण का उपयोग मोटरकारों में ईंधन के रूप में किया जाता है।
टॉलुईन (Toluene), C6H5CH3 इसे सर्वप्रथम टॉलू बाल्सम (tolue balsam) नामक एक रेजिन के शुष्क आसवन द्वारा प्राप्त किया जाता है। इसका उपयोग TNT विस्फोटक, प्रतिहिमीभूत (antifreeze) के रूप में, विलायक के रूप में, क्लोरामीन-टी (chloramine-T) नामक दवा बनाने में, कृत्रिम मधुरक सैकरीन के निर्माण में तथा शुष्क धुलाई में किया जाता है।
कार्बन हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के कार्बनिक यौगिक (Organic Compounds Containing Carbon, Hydrogen and Oxygen) 
ये ऐल्कोहॉल, फीनॉल, ईथर, ऐल्डिहाइड, कीटोन, कार्बोक्सिलिक अम्ल, ऐसिड ऐनहाइड्राइड और एस्टर है।
1. ऐल्कोहॉल (Alcohols)
डाइ, जब ऐलिफैटिक हाइड्रोकार्बन का कोई हाइड्रोजन परमाणु हाइड्रॉक्सिल (–OH) समूह द्वारा प्रतिस्थापित होता है, तो ऐल्कोहॉल बनते हैं। इनका सामान्य सूत्र CnH2n+1 OH है। ऐल्कोहॉलों को इनके यौगिकों में उपस्थित एक (मोनो), दो (डाइ), तीन, (ट्राइ) अथवा अधिक हाइड्रॉक्सिल (–OH) समूह की संख्या के अनुसार क्रमशः मोनो, ट्राइ और पॉलिहाइड्रॉक्सी यौगिकों में वर्गीकृत किया गया है।
मोनोहाइड्रिक ऐल्कोहॉल (monohydric alcohols) उदाहरण मेथेनॉल, एथेनॉल।
डाइहाइड्रिक ऐल्कोहॉल ( dihydric alcohols) उदाहरण ग्लाइकॉल ।
ट्राइहाइड्रिक ऐल्कोहॉल (trihydric alcohols) उदाहरण ग्लिसरॉल।
इस समूह की उपस्थिति एस्टरीकरण परीक्षण द्वारा ज्ञात की जाती है। कार्बोक्सिलिक अम्ल के साथ भीनी-भीनी गन्ध वाले यौगिक का बनना ऐल्कोहॉल की उपस्थिति दर्शाता है।
(i) मेथिल ऐल्कोहॉल या मेथेनॉल (Methyl Alcohol or Methanol), CH3OH 
इसे काष्ठ स्प्रिट भी कहते हैं क्योंकि इसे लकड़ी के भंजक आसवन से प्राप्त किया जाता है। यह फार्मेल्डिहाइड को पोटैशियम या सोडियम हाइड्रॉक्साइड के साथ गर्म करने पर भी प्राप्त किया जाता है। अभिक्रिया के दौरान सोडियम और पोटैशियम फॉर्मेट भी बनते हैं। यह रंगहीन, विषैला, वाइन जैसी गन्ध वाला द्रव है।
इसके बहुत कम सेवन से भी अन्धापन हो जाता है। ऐसा ऑप्टिक नर्व के प्रभावित होने के कारण होता है। अधिक मात्रा में इसके सेवन से मृत्यु भी हो सकती है। (यकृत में मेथेनॉल का ऑक्सीकरण मेथेनल में हो जाता है, जो यकृत की कोशिकाओं के घटकों के साथ शीघ्रता से क्रिया करके प्रोटोप्लाज्म को स्कन्दित कर देता है ।
इसका प्रयोग पेन्ट और वानिशों में विलायक के रूप में, कृत्रिम रंगों के निर्माण में, फॉर्मेल्डिहाइड और विकृत ऐल्कोहॉल बनाने में, पेट्रोल में मिश्रित करके ईंधन के रूप में किया जाता है।
(ii) एथिल ऐल्कोहॉल या एथेनॉल (Ethyl Alcohol or Ethanol), C2H5OH
औद्योगिक स्तर पर इसे शीरे (molasses-a by-product of sugar industry) या स्टार्च युक्त खाद्यान्न के किण्वन से बनाया जाता है। इसे फॉस्फोरिक अम्ल की उपस्थिति में एथीन की जल (भाप) के साथ अभिक्रिया द्वारा बनाया जाता है।
यह एक रंगहीन वाष्पशील द्रव है। यह वार्निश, पेन्ट, आदि में विलायक के रूप में प्रयुक्त होता है। यह पारदर्शक साबुन, परफ्यूम, आयोडीन टिंचर, पॉलिश, शराब (वाइन) के उत्पादन में तथा अनेक कार्बन यौगिकों के बनाने में प्रयुक्त होता है। यह स्प्रिट लैम्प तथा स्टोव में ईंधन के रूप में और जख्मों को साफ करने में भी प्रयुक्त किया जाता है।
जब अधिक मात्रा में एथेनॉल का सेवन किया जाता है, तो इससे उपापचयी प्रक्रिया धीमी हो जाती है तथा केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र कमजोर हो जाता है। व्यक्ति राहत महसूस करता है लेकिन उसे पता नहीं चल पाता कि उसके सोचने समझने की क्षमता तथा माँसपेशी बुरी तरह प्रभावित हुई हैं।
(iii) एथिलीन ग्लाइकॉल (Ethylene Glycol),CH2OH—CH2OH 
यह डाइहाइड्रॉक्सी ऐल्कोहॉल है। यह मीठा गाढ़ा द्रव है। ठण्डे स्थानों में जल का हिमांक कम करने के लिए इसका उपयोग कारों के रेडिऐटर में किया जाता है।
(iv) ग्लिसरॉल या ग्लिसरीन (Glycerol or Glycerine), CH2OHCHOHCH2OH 
यह अत्यधिक आर्द्रताग्राही पदार्थ है। यह मुक्त अवस्था में मानव रक्त तथा शक्कर के किण्वित घोल में पाया जाता है तथा संयुक्त अवस्था में ग्लिसराइड (एस्टर) के रूप में वसा और तेलों में पाया जाता है। इसका उपयोग विस्फोटकों जैसे ट्राईनाइट्रोग्लिसरीन ( सान्द्र HNO3 और सान्द्र H2SO4 द्वारा ग्लिसरीन के नाइट्रीकरण द्वारा) और डायनामाइट, आदि के बनाने में, कॉर्डाइट नोदक बनाने में, छापे की स्याही, जूते की पॉलिश, टाइप मशीन के फीते, पारदर्शक साबुन, प्रसाधन सामग्री बनाने में किया जाता है।
अनेक कार्बनिक यौगिकों को बनाने में, शक्ति पहुँचाने वाली दवाओं (टॉनिक) में, सूजन आदि को ठण्डक पहुँचाने वाले मलहम बनाने में तथा खाद्य पदार्थों शराब तथा फलों को सुरक्षित रखने में परिरक्षक के रूप में भी ग्लिसरॉल का प्रयोग किया जाता है। घड़ियों के विभिन्न कलपुर्जे साफ करने में भी इसका प्रयोग किया जाता है।
ऐल्कोहॉलीय पेय (Alcoholic Beverages)
ऐल्कोहॉलीय पेय अन्य पेयों चाय, कॉफी जैसे हैं। ये अंगूर, मक्का, गन्ना, आदि के किण्वन से प्राप्त किए जाते हैं। विभिन्न पेयों में ऐल्कोहॉल की मात्रा भिन्न-भिन्न होती है। ऐल्कोहॉलीय पेयों में मुख्य अवयव एथिल ऐल्कोहॉल होता है। यीस्ट में उपस्थित जाइमेस एन्जाइम ग्लूकोस को ऐल्कोहॉल में परिवर्तित कर देता है।
ऐल्कोहॉलीय पेयों के प्रकार (Types of Alcoholic Beverages)
ऐल्कोहॉलीय पेय पदार्थों को दो वर्गों में बाँटा गया है
(i) आसवित पेय (Distilled Beverages) 
इन पेयों को आसवन द्वारा प्राप्त किया जाता है इनमें ऐल्कोहॉल की मात्रा 40% से 55% तक होती है।
वाइन (Wine) यह एक ऐल्कोहॉलीय पेय है इसे अंगूर, सेब और बेरी, आदि के किण्वन से प्राप्त किया जाता है। इसमें आयतनानुसार लगभग 9% से 16% तक एथिल ऐल्कोहॉल होता है। स्प्रिट (Spirit) यह ऐल्कोहॉलीय पेय है यह अन्न, फल आदि पदार्थों के किण्वन से प्राप्त एथिल ऐल्कोहॉल के आसवन द्वारा प्राप्त की जाती है।
◆ ऑनोलोजी (Oenology) रसायन विज्ञान की वह शाखा जिसमें वाइन और वाइन बनाने के सभी पहलुओं का अध्ययन किया जाता है ऑनोलोजी कहलाती है।
(ii) अनासवित पेय (Undistilled Beverages)
इन्हें अन्न या फलों के रस के किण्वन से बनाया जाता है। किण्वित द्रव को छानकर उसमें इच्छानुसार रंग, सुगन्ध आदि मिला दिए जाते हैं। इनमें भी ऐल्कोहॉल की मात्रा 3% से 15% तक होती है।
ऐल्कोहॉल से सम्बन्धित कुछ परिभाषित शब्द (Some Terms Related to Alcohols)
◆ विकृतिकृत ऐल्कोहॉल (Denatured Alcohol) पीने के अयोग्य बने एथिल ऐल्कोहॉल को विकृतिकृत ऐल्कोहॉल कहते हैं। एथिल ऐल्कोहॉल को पीने के अयोग्य बनाने के लिए इसमें पिरिडीन, ऐसीटोन, मेथिल ऐल्कोहॉल, आदि विषैले पदार्थ मिलाये जाते हैं।
◆ परिशुद्ध ऐल्कोहॉल (Absolute Alcohol) यह 100% शुद्ध एथिल ऐल्कोहॉल है, जो कि वाष्पशील तथा रंगहीन द्रव होता है।
◆ शक्ति ऐल्कोहॉल (Power Alcohol) परिशोधित स्प्रिट, बेन्जीन और पेट्रोल का मिश्रण शक्ति ऐल्कोहॉल कहलाता है। क्योंकि इसका प्रयोग इन्जनों को चलाने में किया जाता है।
◆ रेक्टिफाइड स्प्रिंट (Rectified Spirit) इसमें 95.6% एथिल ऐल्कोहॉल तथा 4.4% जल होता है। इसे बारम्बर आसवित करके प्राप्त किया जाता है। इसे व्यवसायिक ऐल्कोहॉल भी कहते हैं।
◆ काष्ठ स्प्रिट (Wood Spirit) यह काष्ठ (लकड़ी) के भंजक आसवन से प्राप्त किया जाता है इसमें मेथिल ऐल्कोहॉल (मेथेनॉल) होता है।
◆ अन्न ऐल्कोहॉल (Grain Alcohol) एथिल ऐल्कोहॉल स्टार्च युक्त खाद्य पदार्थों के किण्वन से प्राप्त किया जाता है। अतः इसे अन्न ऐल्कोहॉल भी कहते हैं।
2. फीनॉल (Phenols), C6H5OH
जब ऐरोमैटिक हाइड्रोकार्बन का कोई H-परमाणु हाइड्रॉक्सिल समूह ( – OH) द्वारा प्रतिस्थापित होता है, तो फीनॉल बनते हैं। बेन्जीन का सबसे सरलतम हाइड्रॉक्सिल व्युत्पन्न फीनॉल (C6H5 OH) है। फेरिक क्लोराइड परीक्षण फीनॉलों की उपस्थिति को इंगित करता है।
फीनॉल को सामान्यतः कार्बोलिक अम्ल भी कहते हैं। इसे रंगे (Runge) ने सन् 1834 में बनाया था। इसका उपयोग रोगाणुनाशक के रूप में, पिक्रिक अम्ल (विस्फोटक), फिनॉल्फ्थैलीन (सूचक), बैकेलाइट, सैलोल, फेनेसिटिन, सैलिसिलिक अम्ल, ऐस्प्रिन, आदि के निर्माण में किया जाता है। कार्बोलिक साबुन बनाने में भी फीनॉल का प्रयोग किया जाता है।
3. ईथर (Ethers)
जब हाइड्रोकार्बन का एक H-परमाणु ऐल्कॉक्सी (–OR) या एरिलॉक्सी (–OAr) समूह द्वारा प्रतिस्थापित होता है, तो ईथर बनते हैं। इनका सामान्य सूत्र (CnH2n+1)2O होता है उदाहरण डाइमेथिल ईथर, डाइएथिल ईथर, आदि डाइएथिल ईथर (Diethylether), C2H5OC2H5 इसे केवल ईथर भी कहते हैं। इसे 140°C पर ऐथेनॉल को सान्द्र H2SO4 के साथ गर्म करके या विलियमसन-संश्लेषण विधि द्वारा (सोडियम एथॉक्साइड को आयोडो एथेन के साथ गर्म करके) संश्लेषित किया जाता है। यह रंगहीन, तीक्ष्ण स्वाद वाला, अतिवाष्पशील द्रव है। इसका उपयोग क्लोरोफॉर्म से बेहतर होने के कारण निश्चेतक के रूप में किया जाता है।
4. ऐल्डिहाइड (Aldehydes)
कार्बनिक यौगिकों जिनमें प्रकार्यात्मक समूह – CHO होता है, ऐल्डिहाइड कहलाते हैं। इनका सामान्य सूत्र C2H2n+1 CHO होता है। फॉर्मेल्डिहाइड (HCHO), ऐसीटैल्डिहाइड (CH3 CHO), प्रोपिऑनैल्डिहाइड (CH3 CH2CHO) आदि कुछ प्रमुख ऐल्डिहाइड हैं। ये टॉलेन अभिकर्मक, शिफ अभिकर्मक और फेहलिंग विलयन द्वारा पहचाने जाते हैं।
फॉर्मेल्डिहाइड (Formaldehyde), HCHO यह ऊतक स्थापक तथा मृत शरीर को रसायनों द्वारा सुरक्षित रखने में प्रयुक्त होता है। यह रोगाणुनाशक के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। इसका 40% जलीय विलयन फॉर्मेलिन (formalin) कहलाता है। इसका उपयोग जैविक नमूनों के परिरक्षण में किया जाता है। इसके अलावा यह कृत्रिम रंगों के निर्माण में, मूत्र रोगों की दवा में, प्लास्टिक जैसे बैकेलाइट, फॉर्मेल्डिहाइड यूरिया बनाने में तथा फोटोग्राफी की प्लेटों पर जिलेटिन फिल्म को स्थिर रखने में प्रयुक्त किया जाता है।
6. कार्बोक्सिलिक अम्ल (Carboxylic Acids)
ऐसे कार्बनिक यौगिक जिनमें कार्बोक्सिलिक (–COOH) प्रकार्यात्मक समूह उपस्थित होता है कार्बोक्सिलिक अम्ल कहलाते हैं। इनका सामान्य सूत्र CnH2n+1 COOH होता है। फॉमिक अम्ल (HCOOH), ऐसीटिक अम्ल (CH3COOH), प्रोपिओनिक अम्ल (CH3CH2COOH), आदि कार्बोक्सिलिक अम्ल के उदाहरण हैं।
फॉर्मिक अम्ल (Formic Acid), HCOOH सर्वप्रथम इसे लाल चीटियों और जल के आसवन द्वारा प्राप्त किया था जिसके कारण इसका नाम फॉर्मिक अम्ल रखा गया। (लेटिन में फार्मिक्स का अर्थ है लाल चीटियाँ) इसका उपयोग ऊनी तथा सूती कपड़ों की रंगाई में, फलों के रसों को सुरक्षित रखने में, रबर लेटेक्स को स्कन्दित करने में विद्युत लेपन में, चमड़े के शोधन में, गठिया रोग की औषधयों में, निकैल फॉर्मेट (तेलों के हाइड्रोजनीकरण में) बनाने में किया जाता है। यह कीटनाशक के रूप में भी प्रयुक्त किया जाता है।
ऐसीटिक अम्ल (Acetic Acid), CH3COOH औद्योगिक स्तर पर इसका निर्माण पायरोलिग्नियस अम्ल से किया जाता है। आजकल ऐसीटिक अम्ल मुख्यतः सिरके ( 4-6% ऐसीटिक अम्ल) से बनाया जाता है। यह एक रंगहीन, तीक्ष्ण गन्ध वाला तथा संक्षारक द्रव है। इसका उपयोग रबर के स्कन्दन में, फोटोग्राफिक फिल्म बनाने में, सेलुलोस ऐसीटेट तथा पॉलीवाइनिल ऐसीटेट नामक कृत्रिम रेशे बनाने में, लेड टेट्राऐसीटेट बनाने में किया जाता है। यह सिरके के रूप में, अचार, चटनी, आदि बनाने में भी प्रयुक्त किया जाता है।
पैरों के पसीने में उपस्थित कार्बोक्सिलिक अम्ल को पहचानकर प्रशिक्षित कुत्ते लोगों का पीछा करते हैं।
ऑक्सेलिक अम्ल (Oxalic Acid),COOHCOOH यह डाइकार्बोक्सिलिक अम्ल वर्ग का प्रथम सदस्य है यह रुबार्ब, सारेल तथा ऑक्सेलिक समूह के पौधों में अपने पोटैशियम लवण के रूप में पाया जाता है। इसका उपयोग कपड़ों की छपाई व रंगाई में रंग बंधक के रूप में, स्याही के धब्वे छुड़ाने में (10% विलयन), चमड़े के विरंजन में, धातुओं की पॉलिश, स्याही व रंगों के बनाने में, एलिल ऐल्कोहॉल, फॉर्मिक अम्ल तथा अन्य उपयोगी कार्बनिक यौगिक बनाने में किया जाता है। फोटोग्राफी में फेरस ऑक्सेलेट का प्रयोग उत्पादक के रूप में किया जाता है।
लैक्टिक अम्ल (Lactic Acid), CH3CHOHCOOH यह मोनोहाइड्रॉक्सी अम्ल है, जो दूध में पाया जाता है। और दूध को खट्टा बनाता है। यह जल में H- आबन्धों के कारण अधिक विलेय है लेकिन कार्बनिक विलायकों में अविलेय है। लैक्टिक अम्ल के माँसपेशियों में एकत्रित होने के कारण हम थकान अनुभव करते हैं। इसका प्रयोग खाद्य उत्पाद जैसे— दही बनाने में, फॉर्मेसी में तथा प्रसाधन सामग्री बनाने में किया जाता है।
सैलिसिलिक अम्ल C6H4 (OH) COOH (Salicylic Acid) यह श्वेत क्रिस्टलीय हाइड्रॉक्सी बेन्जोइक अम्ल है। इसका उपयोग दर्द निवारक दवाओं, काय मलहमों के निर्माण में किया जाता है।
सिट्रिक अम्ल (Citric Acid) यह सिट्रस फल जैसे नींबू, सन्तरा, मौसमी में पाया जाता है यह मोनोहाइड्रॉक्सी ट्राइकार्बोक्सिलिक अम्ल है।
7. एस्टर (Esters )
ऐसे कार्बनिक यौगिक जिनमें – COOR प्रकार्यात्मक समूह उपस्थित होता है एस्टर कहलाते हैं। इनका सामान्य सूत्र RCOOR’ या CnH2n+1 COOR या CnH2nO2 मेथिल ऐसीटेट CH3 COOCH3 एथिल ऐसीटेट CH3 COOC2H5 आदि एस्टर के उदाहरण हैं।
ऐथिल ऐसीटेट (Ethyl Acetate), CH3 COOC2H5 यह कृत्रिम परफ्यूम तथा दवाएँ बनाने में प्रयुक्त किया जाता है।
कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण कार्बनिक यौगिक (Some Other Important Organic Compounds)
क्लोरोफॉर्म (Chloroform), CHCl3
इसकी खोज लीबिग ने सन् 1831 में की थी। क्लोरोफॉर्म प्रकाश की उपस्थिति में ऑक्सीकृत होकर विषैली फॉस्जीन (कार्बोनिल क्लोराइड) बनाता है। इसलिये इसे भण्डारण के लिए पूर्णतः भरी हुई रंगीन बोतलों में रखा जाता है। जिससे इसमें वायु न रहे।
सर्वप्रथम इसका प्रयोग सेम्पसन ने निश्चेतक के रूप में किया था बाद में इसका प्रयोग शल्य चिकित्सा में किया गया। यह वसा, ऐल्केलॉइडों, आयोडीन, रबड़, आदि के लिए विलायक के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। इसका प्रयोग कीटनाशक के रूप में भी किया जाता है। वर्तमान में क्लोरोफॉर्म का प्रमुख उपयोग फ्रेऑन प्रशीतक R-22 बनाने में किया जाता है। क्लोरोफॉर्म को सूँघने से केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र अवनमित हो जाता है इससे संवेदी अंग बन्द हो जाते हैं। इसलिये इसे निश्चेतक के रूप में प्रयुक्त किया जाता है।
आयोडोफॉर्म (Iodoform), CHI3
यह पीले रंग का विशिष्ट गन्ध वाला उर्ध्वपातित क्रिस्टलीय ठोस है। यह आयोडीन, NaOH और एथेनॉल की अभिक्रिया जिसे हैलोफॉर्म अभिक्रिया कहते हैं के द्वारा बनाया जाता है। पूर्व में इसका उपयोगी पूतिरोधी (antiseptic) के रूप में किया जाता था। इसका पूतिरोधक गुण मुक्त हुई आयोडीन के कारण होता है न कि स्वयं आयोडोफॉर्म के कारण। यह एक बैक्टीरियानाशक पदार्थ है।
क्लोरोफ्लोरोकार्बन (Chlorofluorocarbons), CFCs
इन्हें फ्रेऑन भी कहते हैं। ये अत्याधिक स्थाई, अक्रियाशील, अविषैले (निरावेषी- non-toxic), असंक्षारक (non-corrosive) और आसानी से द्रवित होने वाली गैसें हैं। फ्रेऑन-12 उद्योगों में सर्वाधिक प्रयुक्त होने वाले सामान्य फ्रेऑनों में से एक है। इनका प्रयोग ऐरोसॉल प्रणोदक, प्रशीतक तथा वायु शीतलन में किया जाता है। ये क्षोभमण्डल में विसरित होकर ओजोन परत का क्षरण करते हैं तथा प्रकृति में ओजोन सन्तुलन को अनियन्त्रित कर देते हैं।
कार्बन टेट्राक्लोराइड (Carbon Tetrachloride), CCl4
इसका अत्यधिक मात्रा में उत्पादन प्रशीतक बनाने तथा ऐरोसॉल कैन के लिए प्रणोदक के उत्पादन में उपयोग करने के लिए किया जाता है ग्रीस, दाग, धब्बे, आदि को छुड़ाने वाले द्रव के रूप में इसका प्रयोग किया जाता है। पायरीन नाम से इसे बिजली से लगी आग बुझाने में भी प्रयुक्त किया जाता है।
ऐनिलीन (Aniline or Amino Benzene), C6H5 NH2
यह ऐमीन व्युत्पन्न है तथा इसका नाम पुर्तगाली शब्द एनिल जिसका अर्थ इंडिगो (नील) है से लिया गया है। अनवरडॉरबेन ने इसे प्रथम बार सन् 1826 में चूने के पानी और इंडिगो के आसवन से तैयार किया था। रुंगे ने इसे कोलतार से तथा फ्रित्से ने इसे इंडिगो को सान्द्र क्षार के साथ गर्म करके प्राप्त किया था।
इसका उपयोग अन्य ऐरोमैटिक यौगिकों जैसे सल्फोनिलिक अम्ल, नाइट्रोऐनिलीन तथा विस्फोटकों के निर्माण में, रंजकों के निर्माण में, औषधियों के निर्माण में, ज्विटर आयन (Zwitter ion) के निर्माण मे, रबड़ उद्योग में, वल्कनीकरण में, उत्प्रेरक के रूप में किया जाता है।
मेथिल आइसोसायनेट (Methyl Isocyanate)
इसका प्रयोग रबड़, चिपकाने वाले पदार्थ (adhesives) तथा पीड़कनाशी के निर्माण में किया जाता है। USA की यूनियन कार्बाइड कम्पनी के प्लांट से इस गैस (MIC) के रिसाव के कारण भोपाल गैस दुर्घटना में हजारों लोग मारे गए थे।
बेन्जीन हेक्साक्लोराइड (BHC) या गैमेक्सीन या लिण्डेन (Gammexane or Benzene Hexachloride or Lindane)
सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में बेन्जीन की क्लोरीन से अभिक्रिया के फलस्वरूप इसे प्राप्त किया जाता है। यह एक प्रबल कीटाणुनाशक है।
फॉर्मामिन्ट (Formamint)
यह गले की दवाएँ ( चबाने वाली गोली) बनाने में प्रयुक्त होता है।
नाइट्रोबेन्जीन या मिरबेन का तेल (Nitrobenzene or Oil of Mirbane), C6H5 NO2
इसमें प्रकार्यात्मक समूह — NO2 (नाइट्रो) होता है इसका निष्कर्षण सर्वप्रथम मिश्चरलिच (Mitscherlich) ने सन् 1834 में किया था। इसका उपयोग ऐनिलीन, बेन्जिडीन, मेटानिलिक अम्ल, TNB (ट्राइनाइट्रो बेन्जीन-विस्फोटक) तथा अन्य कार्बनिक यौगिकों के निर्माण में किया जाता है। मिरबेन के तेल के नाम से इसका उपयोग साबुन तथा पॉलिश में सस्ती सुगन्ध के रूप में किया जाता है।
नेफ्थैलीन (Naphthalene), C10H8
यह बहुल केन्द्रकीय हाइड्रोकार्बन है इसका मुख्य स्त्रोत कोलतार है यह विषाक्त कैन्सर जनित गुण दर्शाते हैं। इसका प्रयोग जीवाणुनाशी के रूप में तथा (moth) कीड़ों को कपड़ों से दूर करने में किया जाता है।
ल्यूसाइट (Lewisite)
यह एक विषैली गैस है इसका प्रयोग द्वितीय विश्वयुद्ध में किया गया था। ऐसीटिलीन की निर्जल ऐलुमिनियम क्लोराइड की उपस्थिति में आर्सेनिक ट्राइक्लोराइड से अभिक्रिया के फलस्वरूप इसे प्राप्त किया जाता है।
पैराऐल्डिहाइड (Paraldehyde)
ऐसीटैल्डिहाइड सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल की उपस्थिति में पैराऐल्डिहाइड देता है। इसका उपयोग नींद की दवा में किया जाता है।
यूरोट्रोपीन या हेक्सामेथिलीन टेट्राऐमीन (Urotropine or Hexamethylene Tetramine)
यह फॉर्मेल्डिहाइड और अमोनिया की अभिक्रिया के फलस्वरूप प्राप्त होता है इसका उपयोग मूत्र रोगों की दवा के निर्माण में किया जाता है।
क्लोरिटोन (Chloretone)
ऐसीटोन कॉस्टिक पोटाश की उपस्थिति में क्लोरोफॉर्म से अभिक्रिया के फलस्वरूप क्लोरिटोन यौगिक बनाता है। इसका उपयोग पहाड़ी यात्रा या समुद्री यात्रा में चक्कर आने तथा उल्टियाँ रोकने की दवा के रूप में होता है।
ऐसिटामाइड (Acetamide), CH3CONH2
अशुद्ध अवस्था में इसमें से चूहे जैसी गन्ध आती है। आर्द्रताग्राही होने के कारण इसका प्रयोग कपड़े, चमड़े, कागज, आदि पदार्थों को मुलायम बनाने में, मेथिल ऐमीन बनाने में तथा न्यूरोनल नामक नींद लाने वाली औषधि बनाने में किया जाता है।
क्लोरोबेन्जीन (Chlorobenzene), C6H5Cl
इसे आयरन उत्प्रेरक की उपस्थिति में बेन्जीन की क्लोरीन के साथ अभिक्रिया द्वारा बनाया जाता है।
औद्योगिक स्तर पर इसे बेन्जीन द्वारा राश्चिग विधि से बनाया जाता है। इसका उपयोग ऐनिलीन, फीनॉल, क्लोरोनाइट्रोबेन्जीन तथा कीटाणुनाशक डी टी टी के निर्माण में किया जाता है।
डाइक्लोरोमेथेन (Dichloromethane ), CH2Cl2
यह पॉलिहैलोजन यौगिक है इसका प्रयोग विलायक के रूप में, पेन्ट अपचायक के रूप में, ऐरोसॉल में प्रणोदक के रूप में तथा औषध निर्माण की प्रक्रिया में विलायक के रूप में तथा धातुओं की सफाई में किया जाता है।
डाइक्लोरो डाइफिनाइल ट्राइक्लोरो एथेन (डी डी टी) (Dichloro Diphenyl Trichloro Ethane) 
यह मच्छर, जुओं के लिए एक प्रमुख कीटनाशक है तथा इसके अनेकों औद्योगिक उपयोग हैं।
बेन्जीन सल्फोनिक अम्ल (Benzene Sulphonic Acid), C6H5 SO3
यह रंगहीन क्रिस्टलीय ठोस है इसे बेन्जीन के सल्फोनीकरण से प्राप्त किया जाता है। इसका उपयोग रंजकों, औषधियों (सल्फा ड्रग्स), सैकरीन (कृत्रिम मधुरक) तथा अपमार्जकों के निर्माण में किया जाता है।
यूरिया (Urea), NH2CONH2
यह प्रयोगशाला में संश्लेषित किए जाने वाला प्रथम कार्बनिक यौगिक है। इसका निष्कर्षण सर्वप्रथम (1773) मूत्र से किया गया था। यह रंगहीन, गन्धहीन, जल में विलेय पदार्थ है। इसमें नाइट्रोजन की मात्रा 46% होती है जिसके कारण इसे नाइट्रोजनी उर्वरक के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। इसका उपयोग बेरोनल दवा बनाने फॉर्मेल्डिहाइड यूरिया, प्लास्टिक बनाने में किया जाता है।
क्लोरल या ट्राइक्लोरोऐसीटैल्डिहाइड (Chloral or Trichloroacetaldehyde), CCl3 CHO 
इसे ऐसीटैल्डिहाइड पर क्लोरीन की अभिक्रिया द्वारा बनाया जाता है। यह तैलीय रंगहीन द्रव है मुख्यतः इसका उपयोग डी डी टी बनाने में किया जाता है।
हमसे जुड़ें, हमें फॉलो करे ..
  • Telegram ग्रुप ज्वाइन करे – Click Here
  • Facebook पर फॉलो करे – Click Here
  • Facebook ग्रुप ज्वाइन करे – Click Here
  • Google News ज्वाइन करे – Click Here

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *