बिहार में किसान आंदोलन का सामान्य वर्णन करते हुए चंपारण आंदोलन में गांधी जी के हस्तक्षेप का वर्णन करें।

बिहार में किसान आंदोलन का सामान्य वर्णन करते हुए चंपारण आंदोलन में गांधी जी के हस्तक्षेप का वर्णन करें।

(39वीं BPSC/1993)
अथवा
चंपारण एवं बाद के कुछ किसान आंदोलनों का कारण सहित वर्णन करें।
उत्तर- पूरे देश की तरह बिहार में भी किसान जमींदारों / अंग्रेजों के सताए हुए थे। लेकिन बिहार में प्रथम प्रमुख आंदोलन चंपारण आंदोलन ही हुआ, इसमें किसानों की मांगों को पूरा करते हुए तीन कठिया पद्धति को समाप्त कर दिया गया एवं किसानों पर लगान भी घटा दिया गया, साथ ही उन्हें क्षतिपूर्ति भी दी गई। लेकिन इस आंदोलन की सफलता का सर्वप्रमुख कारण इसमें गांधीजी का हस्तक्षेप था। गांधी जी जनवरी 1915 में भारत आगमन से पूर्व ही दक्षिण अफ्रीका में किए गए सत्याग्रह आंदोलन के कारण भारत की जनता के बीच प्रसिद्ध हो गए थे। गांधीजी कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन (1916 ) में चंपारण के राजकुमार शुक्ल के आग्रह पर किसानों की स्थिति का आकलन करने को तैयार हुए एवं अप्रैल 1917 में चंपारण आए। गांधी जी के आगमन से जहां प्रशासन सकते में आ गयी, वहीं पूरे देश का ध्यान किसानों की समस्याओं पर पड़ा एवं किसानों/जनसामान्य में उम्मीद की एक किरण जगी। चंपारण नील आंदोलन में राजेन्द्र प्रसाद, ब्रजकिशोर प्रसाद, अनुग्रह नारायण सिंह आदि ने गांधी जी को सहयोग दिया। उपराज्यपाल एडवर्ड गेट ने गांधी जी को वार्ता के लिए बुलाया एवं Champaran Agrarian Committee गठित की जिसमें गांधी जी भी सदस्य के रूप में थे। किसानों को गोरे जमींदार बलपूर्वक नील की खेती के लिए बाध्य करते थे। प्रत्येक बीघा (20 कट्ठा) पर उन्हें 3 कट्ठे में नील की खेती अनिवार्यतः करनी होती थी। इसे तीन कठिया व्यवस्था कहते थे, जो अन्यायपूर्ण थी। अतः गठित Committee ने तीन कठिया व्यवस्था को कानूनन समाप्त कर दिया। इस आंदोलन की सफलता ने जहां राष्ट्रीय आंदोलन को एक नया मोड़ दिया, वहीं बिहार के किसानों को अंग्रेजों / जमींदारों से लड़ने का साहस भी दिया।
चंपारण आंदोलन के बाद कुछ अन्य किसान आंदोलन भी बिहार में हुए। 1919 में मधुबनी जिला के किसानों को दरभंगा राज के विरुद्ध आंदोलन के लिए स्वामी विद्यानंद ने संगठित किया। लगान वसूली के क्रम में राज के गुमाश्तों के अत्याचार के विरोध में यह आंदोलन था। जंगल से फल एवं लकड़ी प्राप्त करने का अधिकार भी आंदोलनकारी चाहते थे। विद्रोहियों ने कांग्रेस का समर्थन पाना चाहा परंतु दरभंगा महाराज के कांग्रेस में प्रभाव के कारण कांग्रेस का समर्थन उन्हें नहीं मिला जिससे यह आंदोलन हिंसक हो गया एवं इसका विस्तार पूर्णिया, सहरसा, भागलपुर, मुंगेर तक हो गया। कालांतर में किसानों के कुछ मांगों को स्वीकार कर लिया गया जिससे आंदोलन शिथिल हो गया।
1928 में स्वामी सहजानंद सरस्वती ने किसान सभा की स्थापना कर किसान आंदोलन को निर्णायक मोड़ दिया। 1936 में अखिल भारतीय किसान सभा का गठन हुआ। इसके अध्यक्ष स्वामी सहाजानंद सरस्वती एवं महासचिव प्रो. एन. जी. रंगा थे। इन्होंने किसानों की समस्याओं के प्रति कांग्रेस का ध्यान आकृष्ट कराने का प्रयास किया जो ज्यादा सफल न रहा। बाद में किसान आंदोलनकारियों का झुकाव साम्यवादी दल के प्रति हो गया।
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