बिहार में संथाल विद्रोह (1855-56) के कारणों एवं परिणामों का मूल्यांकन कीजिए ।

बिहार में संथाल विद्रोह (1855-56) के कारणों एवं परिणामों का मूल्यांकन कीजिए ।

( 63वीं BPSC / 2019 )
अथवा
संयुक्त बिहार में संथाल विद्रोह के इतने बड़े पैमाने पर सशस्त्र रूप धारण करने के मूल कारणों एवं परिणामों की चर्चा करें।
संथाल विद्रोह ( 1855-56)
> नेता- सिद्धू एवं कान्हू
> क्षेत्र – भागलपुर, मानभूम एवं राजमहल की पहाड़ियों के आदिवासी
> कारण- जमींदारों एवं साहूकारों द्वारा शोषण, अत्याचार साथ ही पुलिस का दमन इनके परंपरागत जमीन से इन्हें बेदखल किया जाना । प्रारंभ में ये आधुनिक छोटानागपुर के आसपास बसे थे। लेकिन 1793 की भूमि के स्थायी बंदोबस्त से ये राजमहल की पहाड़ियों में चले गए। लेकिन वहां भी जमींदारों ने अपना दावा किया
>  परिणाम- अंग्रेजों ने इस आंदोलन को निर्ममता पूर्वक कुचल दिया। कैप्टन फगान के नेतृत्व में पैलापुर के मुठभेड़ में कान्हू मारा गया एवं सिद्धू पकड़ा गया
क्षेत्र का शासन गर्वनर जनरल के अधीन कर इसे ‘बहिर्गत क्षेत्र’ (Excluded Area) घोषित किया गया। यह क्षेत्र ‘संथाल परगना’ कहलाया
उत्तर – अंग्रेजों के अनेक सशस्त्र संघर्ष वनवासियों अथवा जनजातियों से हुए। इनमें संथालों का विद्रोह अद्वितीय था । यह विद्रोह 1855-56 में वर्तमान बिहार एवं झारखंड के संयुक्त प्रांत में हुए । यद्यपि राजमहल की पहाड़ियों के आस-पास के क्षेत्र अधिक प्रभावित रहे।
 स्वतंत्रताप्रिय एवं परंपरागत रीति-रिवाजों को दृढ़ता से मानने वाले संथाल जनजाति के लोग आधुनिक छोटानागपुर के दक्षिण में बसे हुए थे। लेकिन 1793 की भूमि के स्थायी बंदोबस्त से यह भूमि जमींदारों की हो गई थी। फलतः ये राजमहल की पहाड़ियों के आस-पास चले गए एवं उस क्षेत्र को कठिन परिश्रम से खेती-बाड़ी योग्य बनाया। लेकिन, इस भूमि पर भी जमींदारों ने अपने दावे किए। इसके साथ ही नील की खेती से इनका अंग्रेजों से टकराव बढ़ गया था। शीघ्र ही ये पुलिस के दमन और अत्याचारों के शिकार हो गए। इतना ही नहीं इन दिनों पूर्वी क्षेत्रों में रेल निर्माण हो रहा था। रेलवे अधिकारी और कर्मचारी इनसे मनमानी करते और इनकी महिलाओं की बेइज्जती भी करते थे।
इन अत्याचारों ने भयंकर असंतोष का रूप ले लिया जो 1855-56 में एक सशस्त्र विद्रोह के रूप में प्रकट हुआ, जिसमें भागलपुर, मानभूम, राजमहल की जनजातीयों ने भाग लिया। प्रारंभ में संथालों ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा करते हुए, जमींदारों, महाजनों, पुलिस एवं अधिकारियों पर हमले किए एवं उनकी हत्याएं की साथ ही रेलवे स्टेशन, डाकघर, पुलिस एवं फैक्ट्रियों पर आक्रमण किए। इन्होंने भागलपुर एवं राजमहल के मध्य डाक-तार एवं रेल सेवाओं को ठप्प कर दिया। परिणामस्वरूप अंग्रेजों ने विद्रोह का दमन करना प्रारंभ किया एवं क्षेत्र में ‘मार्शल-ला’ लगा दिया। संथालों के नेता सिद्धू एवं कान्हू सहित लगभग 10,000 संथाल मारे गए । विद्रोह धीरे-धीरे जब शांत हुआ तो इस क्षेत्र का शासन सीधे भारत के गवर्नर जनरल के हाथों में दे दिया गया। इस क्षेत्र को ‘संथाल परगना’ नाम दिया गया और संथालों को विशेष सुविधाओं के बहाने इसे एक बहिर्गत क्षेत्र (Excluded Area) घोषित कर दिया। शासन ने सैनिक अभियान, पुलिस दमन के साथ-साथ ईसाई मिशनरियों का भी सहारा लिया। भारतीय जनता से इन वनवासियों को अलग कर दिया गया, परंतु इस क्षेत्र में ईसाई पादरियों को जाने की छूट दी गई और उन्हें प्रोत्साहित किया गया।
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