6th JPSC सिविल सेवा मुख्य परीक्षा- 2019

6th JPSC सिविल सेवा मुख्य परीक्षा- 2019

परीक्षा तिथि- 28/01/2019
विषय : सामान्य हिन्दी और सामान्य अंग्रेजी
Subject: General Hindi And General English

> सामान्य हिन्दी

1.निम्नलिखित विषयों में से किसी एक पर लगभग 400 शब्दों में निबंध लिखिए |
(क) आधुनिक भारतीय शिक्षा प्रणाली
(ख) भारत-पाक संबंध
(ग) भारतीय समाज में दहेज उन्मूलन के उपाय
(घ) यदि मै भारत का प्रधानमंत्री होता
(ङ) झारखंड राज्य के 16 वर्ष
2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए : 
(क) संधि और समास में उदाहरण सहित अंतर स्पष्ट कीजिए
(ख) कारक किसे कहते हैं? इसके भेदों को उदाहरण सहित लिखिए।
(ग) क्रिया विशेषण से क्या तात्पर्य है? उदाहरण के साथ बताइए ।
3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर निर्देशानुसार लिखिए : 
(क) किन्ही पांच मुहावरों के अर्थ लिखकर उनका वाक्यों में प्रयोग कीजिए :
उठा न रखना, खेत रहना, गूलर का फूल होना,
नाच नचाना, तीन तेरह होना, नाक रगड़ना, गर्दन उठाना
(ख) निम्नलिखित अशुद्ध वाक्यों में से किन्ही पांच को शुद्ध कीजिए:
मैं आपकी भक्ति करता हूँ।
उस समय आपकी आयु चालीस वर्ष की थी।
आपका भवदीय, हम तो अवश्य ही आएंगे।
मेरे लिए ठंडी बर्फ लाओ।
मैं अपनी बात का स्पष्टीकरण करने के लिए तैयार हूँ।
वहां भारी-भरकम भीड़ जमा थी ।
4. प्रस्तुत अवतरण का उपयुक्त शीर्षक देते हुए संक्षेपण कीजिए : 
आज आवश्यकता है कि विकलांग व्यक्ति उन महान विकलांग विभूतियों का अनुसरण करें जिन्होंने विकलांगों के लिए सामान्य व्यक्तियों जैसा जीवन जीने का पथ प्रशस्त किया है। ध्यान देना होगा कि कैसे हेसेन कीलर ने नेत्रहीनता, श्रवणहीनता और मूकता को पराजित करके समाज में अपना सम्मानित, प्रेरक और गौरवपूर्ण स्थान बनाया। बालक विरजानंद ने निर्धनता और नेत्रहीनता के बावजूद किस प्रकार वैदिक ज्ञान को उजागर किया। दोनों पैर कटे रहने पर भी अलैक्सेई मरैस्येव ने विमान को उड़ाया। जीते-जागते प्रमाण के रूप में बाबा आम्टे भी हैं जो स्वर्य अस्थि विकलांक होते हुए भी पिछले पैतीस वर्षों से निरंतर कुष्ठ रोगियों की सेवा कर रहे हैं। सीखना होगा किस विपत्तियों और बाधाओं का सामना कैसे करें और कैसे आगे बढ़े। किन्ही संदर्भों में विकलांगता एक मनोभाव है क्योंकि विकलांग व्यक्ति भी साधारण व्यक्ति की अपेक्षा अधिक योगदान दे सकता है। विकलांगता और बहुविकलांगता चाहे कितनी भी गंभीर क्यों न हो व्यक्ति अपनी संकल्पशक्ति द्वारा अपना योगदान देते हुए सम्मान प्राप्त कर सकता है।

> General English

1. Write an essay on any one of the following topics (Approximate length :40 words)
(a) The night before an examination
(b) Tourism in Jharkhand
(c) Uses and Abuses of Internet.
(d) An interesting train journey
2. (i) Fill in the blanks with appropriate articles wherever necessary.
______ poor peasant set out early one morning to plough, taking with him for his breakfast a piece of bread. He got his plough ready, wrapped _________ bread in his coat, put it under ________ bush and set to work. After a while when his horse _______ was tired and he was hungry, the peasant fixed _______ plough, let horse graze and went to get his coat and his breakfast.
(ii) Correct and rewrite only five of the following sentences. If a sentence is grammatical, mention it.
(a) My mother is a good cooker.
(b) I don’t know to drive a car.
(c) He did not know the answer.
(d) He know where does his father lives.
(e) One of my friend is a palmist
(f) He died for cholera.
(g) There are twenty sheeps in the field.
(iii) Use the correct form of each verb given in the bracket, You may include an auxiliary verb along with it, if required attempt any five.
(a) Premchand _______many outstanding novels. (write)
(b) Amit has been ________in the plant since 2012. (work)
(c) The trian _______before we reached the station. (leave)
(d) The work cannot be _______ in two days. (complete)
(e) When the principal entered the room she found Mary ________a novel. (read)
(f) Bob ________ melodious songs, doesn’t he? (compose)
(g) We expected him here last night but he did not _______ (come)
3. Read the given passage carefully and answer the questions that follow :
younger I remember a certain Indian village where I had been inveited to visit the home of a family with some modern educations, though not much and some means, though not wealth. The house was mud-malled and the roof was of thatch. Inside were several rooms however, the floor smooth and polished with the usual mixture of cow dung and water. The active master of the house was not the head of the family but a brother. This I discovered when I arrived, for befroe we entered the house, my host led me to a curious sort of cape standing well above the ground on four parts. Inside the cape, made of wire netting, I saw to my amazement an ageing man lying on his back, his head supported by a pillow, ‘My eldest brother’ my host explained. He has had a stroke of paralysis and though we beg him to live in the house, he chooses to live out here so that he may be ready to listen to the villagers when they come to him.
My host spoke fair English, but the elderst brother spoke none; and we could only exchange greeting and look at each other with friendliness, what I saw was an intelligent, pain-sharpened face, whose eyes were at once wise and piercing. The body was quite helpless but it was absolutely clean and the cotton garments were snow-white. We exchanged a few remarks and then a group of villagers approached, not to see me but to talk with the elder brother and so my host led me into the house to meet his young wife and children.
All during my stay, I watched that cage and seldom indeed did I see it except surrounded by people and never, as long as daylight lasted, without atleast one man sitting on the ground talking earnestly and then listening. My host said: ‘My brother has always been our wise man. Now he is our saint’.
My host. I observed had his own place too, in the village life, for twice while we were eating our lunch that day, he rose from his corner of the room and went out, to answer a shout, apparently from a neighbour. when he came back he made the same explanation. ‘I was called to kill a dangerous snake’.
(a) Describe the house visited by the author.
(b) Why did the host’s elder brother stay in a cage ?
(c) Why was the author unable to talk to the elder brother?
(d) Why was the host called out by the villagers ?
(e) Give the meaning of the words
i) Amazement
ii) Ageing
4. Make a precise of the following passage and give a suitable title to it.
The life of Marie Curie contains prodigies in such numbers that one would like to tell her story like a legend.
She was a woman; she belonged to an oppressed nation; she was poor; she was beautiful, a powerful vocation summoned from her motherland, Poland to study in Paris, where she lived years of poverty and solitude. There she met a man whose genius was akin to hers. She married him, their happiness was unique. By the most desperate and avid effort, they discovered a magic element, radium. This discovery not only gave, birth to a new science and a new philosophy; it provided mankind with the means of treating a dreadful disease.
At the moment when the fame of the two scientists and benefactors was spreading over the world, grief overtook Marie; her husband, her wonderful companion was taken from her by death in an instant. But in spite of distress and physical illness, she continued alone the work that had been begun with him and brilliantly developed the science they had created together.

> प्रश्नोत्तर एवं उत्तर व्याख्या

> सामान्य हिन्दी
उत्तर 1 :
(क) : आधुनिक भारतीय शिक्षा प्रणाली
किसी भी राष्ट्र में शिक्षा उसके नागरिकों के व्यक्तित्व निर्माण तथा सामाजिक व आर्थिक प्रगति का आधार और मापदंड दोनों होती है। प्राचीन भारत में शिक्षा का उद्देश्य केवल सांसारिक जीवन की तैयारी हेतु ज्ञानार्जन ही नहीं था अपितु पूर्ण आत्मज्ञान की प्राप्ति और श्रेष्ठ मानव के रूप में विकास था। इस शिक्षा पद्धति ने ही भारत को विश्व में जगद् गुरू का स्थान दिलाया। अनेकानेक विद्वानों एवं उनके कार्यों ने विश्व में ऊँचे प्रतिमान स्थापित किये।
भारत की आधुनिक शिक्षा प्रणाली ब्रिटिश प्रतिरूप पर आधारित है जिसमें स्वतंत्रता पश्चात कई सुधार किये गये । विभिन्न अवसरों पर अलग-अलग शिक्षा नीतियों द्वारा भारतीय शिक्षा व्यवस्था में सुधार के प्रयासों में कोठारी आयोग, राष्ट्रीय शिक्षा नीति-1986, 1992 (संशोधन), 2009 का अनिवार्य एवं निःशुल्क शिक्षा अधिनियम आदि महत्वपूर्ण पड़ाव रहे। इसी क्रम में राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 अगला महत्वपूर्ण प्रयास है जिसके सामने आने पर आधुनिक भारतीय शिक्षा प्रणाली का गहन अवलोकन प्रासंगिक हो गया है।
वर्तमान भारतीय शिक्षा व्यवस्था 10+2+3 ढाँचे पर आधारित है जिसमें 10 वर्ष स्कूली शिक्षा, 2 वर्ष माध्यमिक शिक्षा तथा 3 वर्ष स्नातकीय शिक्षा से संबंधित है।
वर्तमान शिक्षा प्रणाली का अवलोकन करने पर हम पाते हैं कि यह संतोषजनक नहीं है, इसके विभिन्न घटकों यथा प्राथमिक शिक्षा, माध्यमिक शिक्षा, उच्च शिक्षा, व्यावसायिक एवं तकनीकी शिक्षा की गुणवत्ता, शिक्षकों, शिक्षण संस्थानों, शिक्षण सामग्री की उपलब्धता एवं गुणवत्ता तथा आज के डिजीटल युग में इनकी कार्यक्षमता एवं उत्कृष्टता कतिपय कारणों से वैश्विक मापदंड पर पीछे है।
यदि क्रमशः देखा जाए तो प्राथमिक शिक्षा की स्थिति कहीं अधिक असंतोषपूर्ण है जहाँ छात्रों का बौद्धिक एवं शैक्षिक स्तर, शिक्षक छात्र अनुपात एवं शिक्षकों का शैक्षिक स्तर निराशाजनक स्तर पर है। कतिपय सरकारी प्रयासों के बावजूद स्वतंत्रता के लगभग 70 वर्षों बाद भी प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था लचर और लाचार नजर आती है। जबकि यह शिक्षा की नींव का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पड़ाव है।
स्कूली शिक्षा की भांति उच्च शिक्षा की गुणवत्ता भी संतोषप्रद नहीं है। तमाम उपलब्ध संसाधनों के बावजूद शिक्षित बेरोजगारों की बढ़ती संख्या इसका प्रमाण है। सामान्य और तकनीकी शिक्षा में संतुलन की कमी एवं वैश्विक आवश्यकताओं के अनुरूप गुणवत्तापूर्ण एवं प्रासंगिक शिक्षा की कमी इसका एक कारण है। विश्व के टॉप-200 रैंकिंग में बहुत कम भारतीय शिक्षण संस्थान आते हैं।
व्यावसायिक एवं तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में सरकारी एवं निजी प्रयासों से विस्तार देखा जा रहा है परंतु यह क्षेत्र भी संसाध नों, शिक्षकों की कमी एवं वांछित प्रोत्साहन की कमी के कारण आशानुरूप स्थिति में नहीं है ।
कुल मिलाकर आधुनिक भारतीय शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता है। उपलब्ध आर्थिक संसाधनों को ध्यान में रखते हुए इसके लिए सरकार, समाज, शिक्षक, छात्र एवं विभिन्न संस्थानों अर्थात् प्रत्येक स्तर पर सामूहिक एवं गंभीर प्रयासों की आवश्यकता है।
कौशल शिक्षण, आधुनिक तकनीकों यथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सूचना प्रोद्यौगिकी तथा शोध एवं नवाचारों को प्रोत्साहन के साथ ही सतत् निगरानी एवं मूल्यांकन की आवश्यकता है। तभी हम ऐसी शिक्षा व्यवस्था बना पाएँगे जो आधुनिक विश्व की माँगों के अनुरूप वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में भारत को एक गौरवपूर्ण स्थान दिला सके और साथ ही आधुनिक भारत के सर्वागीण विकास का आधार बन सके।
(ख) : भारत-पाक संबंध
द्विराष्ट्र सिद्धांत के तहत अगस्त, 1947 में भारत व पाकिस्तान अलग हुए। भाषाई, सांस्कृतिक, भौगोलिक, आर्थिक एवं जातीय संबंध साझा करते हुए भी भारत-पाक रिश्ते पिछले 72 वर्षों में बेहतर नहीं हो पाये। भारत द्वारा शांतिपूर्ण सह अस्तित्व की नीति का पालन एवं उदारतापूर्ण व्यवहार के बावजूद 1965, 1971, 1991 समेत चार प्रमुख युद्ध हो चुके हैं।
वास्तव में भारत-पाक संबंधों में इस खटास का कारण पाकिस्तान का भारत के प्रति विद्वेषपूर्ण एवं दुर्भावनात्मक व्यवहार है। भारत और पाक के बीच विवाद के कई मुद्दे हैं जिनमें प्रमुख हैंकश्मीर समस्या, सिंधु नदी जल विवाद, सियाचिन, सरक्रीक सीमा विवाद, चीन-प – पाक आर्थिक गलियारा और इन सबसे अधिक पाक प्रायोजित आतंकवाद ।
पाकिस्तान विभिन्न आतंकवादी संगठनों का पोषक है और इन संगठनों का इस्तेमाल वह भारत में आतंकवादी गतिविधियाँ फैलाने में करता है। जैश ए मोहम्मद, जमात उत दावा जैसे लगभग सैकड़ों आतंकवादी संगठन हैं जिन्हें पाक सरकार और उसकी खुफिया एजेंसी ISI का समर्थन एवं सहयोग प्राप्त है। इनके द्वारा 26/11 मुंबई बम काण्ड, संसद पर हमले, पुलवामा अटैक, पठानकोट हमला जैसी अनेक घटनाओं को भारत में अस्थिरता एवं आतंक पैदा करने के लिए अंजाम दिया जाता रहा है।
कश्मीर की सुंदर घाटी आज इन पाक समर्थित आतंकी गतिविधियों के कारण ही युद्ध क्षेत्र में परिणत है जहाँ आए दिन आतंकियों और भारतीय सेना के बीच झड़पें होती हैं।
भारत के सहिष्णुतापूर्ण रवैये का पाकिस्तान द्वारा अनुचित लाभ उठाया जाता है। साथ ही पाकिस्तान विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत के विरूद्ध भ्रामक तथ्यों की प्रस्तुति करता आया है बावजूद इसके इन मंचों पर हमेशा उसे निराशा ही हाथ लगी है।
भारत पाक के तनावपूर्ण संबंधों को सामान्य करने हेतु शिमला समझौता, लाहौर वार्ता, भारतीय प्रधानमंत्रियों की पाक यात्रा आदि जैसे अधिकांश प्रयास भी भारत द्वारा ही किये गये हैं। रिश्तों को सामान्य बनाने की ऐसी कोई गंभीर पहल पाकिस्तान द्वारा अब तक नहीं की गई।
हालांकि आज सारा विश्व पाकिस्तान को आतंकी लाँच पैड के रूप में जानता है ।
वर्तमान में आर्थिक रूप से दिवालिया स्थिति में पहुँच चुके पाकिस्तान के भारत से आर्थिक संबंध भी भारत के पक्ष में हैं। वर्तमान परिदृश्य में आर्थिक विकास घरेलू व्यापार में वृद्धि और शांतिपूर्ण विकास के लिए भारतीय पक्ष द्वारा ही प्रयास किए जा रहे हैं जिनसे भविष्य में भारत-पाक संबंधों के नए आयाम सामने आएँगे । वास्तव में अच्छा पड़ोसी दोनों देशों की जरूरत है और दोनों को मिलकर इस दिशा में काम करना होगा।
(ग) : भारतीय समाज में दहेज उन्मूलन के उपाय
यूं तो मानव समाज एवं सभ्यता के समक्ष कई सारी चुनौतियाँ मुँह बाये खड़ी हैं, परंतु इनमें से एक चुनौती ऐसी है, जिसका पूर्ण समाधान अभी तक प्राप्त नहीं हुआ है। कहना नहीं होगा कि विवाह संस्कार से जुड़ी हुई यह सामाजिक विकृति दहेज प्रथा ही है। दहेज कुप्रथा भारतीय समाज के लिए एक भयंकर अभिशाप की तरह है। हमारी सभ्यता एवं संस्कृति का यह एक बड़ा कलंक है। ‘दहेज’ शब्द अरबी भाषा के ‘जहेज’ शब्द से रूपान्तरित होकर उर्दू और हिन्दी में आया है, जिसका अर्थ होता है ‘सौगात ‘ । इस भेंट या सौगात की परम्परा भारतीय रीति में कब से प्रचलित हुई, यह विकासवाद की खोज के साथ जुड़ा हुआ तथ्य है। प्राचीन आर्य ग्रन्थों के अनुसार, अग्निकुंड के समक्ष शास्त्रज्ञ विद्वान विवाह सम्पन्न कराता था तथा कन्या का हाथ वर के हाथ में देता था।
कन्या के माता-पिता अपनी सामर्थ्य और शक्ति के अनुरूप कन्या के प्रति अपने स्नेह और वात्सल्य के प्रतीक के रूप में कुछ उपहार भेंटस्वरूप दिया करते थे। इस भेंट में कुछ वस्त्र, गहने तथा अन्न आदि होते थे। इसके लिए ‘वस्त्रभूषणालंकृताम्’ शब्द का प्रयोग सार्थक रूप में प्रचलित था। इन वस्तुओं के अतिरिक्त दैनिक जीवन में काम आने वाली कुछ अन्य आवश्यक वस्तुएँ भी उपहार के रूप में दी जाती थीं। उपहार की यह प्रथा कालिदास के काल ( पाँचवीं सदी) में भी थी।
स्नेह, वात्सल्य और सद्भावनाओं पर आधरित यह प्रतीक युग में परिवर्तन के साथ-साथ स्वयं में परिवर्तित होता गया। स्नेहोपहार की यह भावना कालक्रम में अत्यन्त विकृत होती चली गयी | मध्य युग में वस्त्र, रत्न, आभूषण, हाथी, घोड़े तथा राज्य का कोई भाग – यहाँ तक की दास-दासियाँ भी दहेज में देने की प्रथा चल पड़ी।
आधुनिक दहेज प्रथा मूलतः धनी लोगों की देन है, जिसकी चक्की में निर्धन भी पिस रहे हैं। इस प्रथा के पीछे लोभ तथा स्वार्थ की दुष्प्रवृत्ति छिपी हुई है। आज दहेज प्रथा भारत के सभी क्षेत्रों और वर्गों में व्याप्त है। इस कुप्रथा ने लड़कियों के पिता का जीवन दूभर कर दिया है। लड़कों के पिता अपने लड़के का कथित सौदा करने लगे हैं। यह घोर नैतिक पतन नहीं तो और क्या है? इस कुप्रथा के चलते कितने लड़की वाले बेघर एवं बर्बाद हो रहे हैं। कितनी ही विवश कन्याओं को आत्महत्या जैसा कुकर्म करना पड़ रहा है। कितनी वधुएँ दहेज की खातिर जीवित जला कर मारी जा रही हैं।
गांधी भारत की राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ-साथ आर्थिक, नैतिक और सामाजिक स्वतंत्रता के भी हिमायती थे। उन्होंने दहेज प्रथा की क्रूरता और भयावहता से क्षुब्ध होकर कहा था- “दहेज की पातकी प्रथा के खिलाफ जबर्दस्त लोकमत बनाया जाना चाहिए और जो नवयुवक इस प्रकार गलत ढंग से लिये गये धन से अपने हाथों को अपवित्र करे, उसे जाति से बहिष्कृत कर देना चाहिए।” आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानन्द ने भी इस राष्ट्रीय कलंक की ओर जनता का ध्यान आकृष्ट किया। पं. जवाहर लाल नेहरू ने इस दहेज – दानव के विनाश के लिए जनता का उद्बोधन किया। इन्हीं के प्रधानमंत्रित्वकाल में सन् 1961 ई. में दहेज निरोधक अधि नियम बनाया गया, किन्तु जनता के सहयोग के अभाव में यह कानून की पुस्तकों की ही शोभा बनकर रह गया।
यह कुप्रथा कानून बना देने मात्र से ही समाप्त नहीं हो सकती। इस सामाजिक कोढ़ से तभी मुक्ति मिल सकती है, जब युवा वर्ग इस ओर अग्रसर हो । दहेज जैसी कुरीति को दूर करने के लिए देश के युवा वर्ग को आगे आना ही होगा। युवा वर्ग ही अपने संगठित प्रयास से समाज की इस बुराई को दूर कर सकता है। इस
प्रथा की रोक के लिए निडर कन्याओं की भूमिका भी अत्यन्त महत्वपूर्ण है। उन्हें दहेज माँगने वाले लोगों का एक स्वर से विरोध करना होगा। साथ ही, दहेज विरोधी सरकारी कानून को भी सख्ती गू करना होगा, तभी इस कुप्रथा को मिटाया जा सकता है।
(घ) : यदि मैं भारत का प्रधानमंत्री होता 
कल्पना करना कोई नयी बात नहीं है। सभी कल्पना करते हैं, करनी भी चाहिए। किन्तु, कल्पना का आधार उदात्त होना चाहिए । उदात्तता के साथ-साथ उसमें क्रियाशीलता भी होनी चाहिए। निष्क्रिय कल्पना का कोई अर्थ नहीं, कोई उपयोगिता नहीं होती। ‘यदि मैं देश का प्रधानमंत्री होता?’ एक मधुर कल्पना है। यदि मेरी कल्पना साकार हो जाये, तो मैं देश का कायापलट कर दूँगा। किसी जादू की छड़ी से नहीं, वरन अपने सद्कर्तव्यों से अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति से |
आज हमारा देश विभिन्न समस्याओं के घेरे में छटपटा रहा है। प्रधानमंत्री का पद अत्यन्त दायित्वपूर्ण होता है, अतः प्रधानमंत्री बनकर मैं सर्वप्रथम देश की उन कमजोरियों को दूर करने का प्रयास करूँगा, जो हमारी प्रगति में बाधक बनी हुई हैं। मैं यह भी जानता हूँ कि प्रधानमंत्री सम्पूर्ण देश का प्रतिनिधि होता है, अतः मैं प्रमुख राजनीतिक दलों से संभाषण करूँगा तथा उनके सहयोग से एक राष्ट्रीय सरकार का निर्माण करूंगा। मैं अपने मंत्रिमंडल में विभिन्न क्षेत्रों के सुयोग्य व्यक्तियों को सम्मिलित करूंगा। मैं अपने पूर्व प्रधानमंत्रियों के सद्विवेक और सुनीतियों को अपनाऊँगा।
हमारे देश में गरीबी, बेरोजगारी, महँगाई तथा आवश्यक वस्तुओं की कमी विकराल समस्याएँ हैं। इन समस्याओं के समाधान के लिए मैं एक प्रभावकारी एवं नयी योजना का निर्माण करूंगा। मैं कृषि एवं औद्योगिक प्रगति पर विशेष ध्यान दूँगा । किसानों को मैं ऐसी सुविधाएँ दूँगा, जिसमें वे अधिक अन्नोत्पादन कर सकें और हमारा देश अन्न के मामले में पूर्णत: आत्मनिर्भर हो सके। किसान कृषि की नवीन एवं वैज्ञानिक पद्धति अपनाएँ, इसके लिए मैं उनके प्रशिक्षण एवं उपयुक्त साधनों की व्यवस्था करूँगा । वृहद उद्योगों के विकास पर भी मेरा ध्यान होगा, परन्तु लोग लघु एवं कुटीर उद्योगों के प्रति विशेष रूप से आकृष्ट हों, इस दिशा में मेरा अधिकाधिक प्रयास होगा।
मैं शिक्षा पद्धति में ऐसा सुधार लाऊँगा, ताकि छात्रों में चारित्रिक एवं नैतिक भावनाओं का विकास हो सके। मैं देश के सभी प्रमुख क्षेत्रों में ऐसे विद्यालयों संस्थानों को खुलवाने की व्यवस्था करवाऊँगा, जहाँ छात्र साहित्य, इतिहास, भूगोल, विज्ञान आदि विषयों के साथ-साथ शिल्प, प्रौद्योगिकी (टेक्नोलॉजी) का भी अध्ययनअनुसंधान कर सकें।
देश के सम्यक विकास के लिए ऊर्जा-शक्ति की आवश्यकता होती है। इसके लिए पर्याप्त विद्युत व्यवस्था हानी चाहिए। विद्युत उत्पादन में कोयला, जल, परमाणु शक्ति विशेष रूप से आवश्यक हैं।
हमारे देश में इन शक्तियों का विस्तृत भंडार है। इनके अतिरिक्त सौर ऊर्जा, गोबर गैस, पवन ऊर्जा आदि शक्ति के अन्य स्रोत हैं। शक्ति के इन सभी स्रोतों का मैं समुचित उपयोग करवाऊँगा।
देश की बाह्य सुरक्षा को सुदृढ़ करने के लिए मैं सेना के तीनों अंगों- स्थल, वायु एवं जल – को अत्याधुनिक आयुधों एवं उपकरणों से सुसज्जित करूँगा । इनके साथ ही विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में सैन्य-शिक्षा (एन.सी.सी.) अनिवार्य करवा दूंगा।
आज देश में वर्ग-भेद, जाति-भेद, धर्म और सम्प्रदाय – भेद बड़ी तीव्र गति से पनप रहे हैं। देश की इन विकृतियों को दूर करने के लिए मैं समाज के सभी वर्गों के लिए समान नागरिक संहिता बनाऊँगा। मैं जातिगत पिछड़ेपन को आरक्षण का आधार न मान कर आर्थिक रूप में पिछड़ेपन के आधार को प्रश्रय दूँगा। सभी वर्ग के लोगों को उनकी योग्यता एवं कार्यक्षमता के अनुसार काम या सेवा का अवसर प्रदान करवाऊँगा।
मेरी विदेश नीति अपने देश के हितों को सामने रख कर अधिकाधिक शांतिपूर्ण, सहयोग एवं सह-अस्तित्व पर आधारित होगी। मेरा प्रयास होगा कि विश्व के सभी राष्ट्र हमारे मित्र हों, कोई हम पर अनुचित दबाव न डाले। मैं अपने देश की विश्व बन्धुत्व और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की चिर उदात्त भावना को प्रश्रय दूँगा।
मैं यह भी चाहूँगा कि हमारा देश धन-धान्य, ज्ञान-विज्ञान में पूर्ण समद्ध हो और वह पुनः अपने विश्व गुरु के सम्मानित पद पर प्रतिष्ठित हो जाये।
(ङ) : झारखंड राज्य के 16 वर्ष
15 नवंबर, 2020 को गठित तथा वयस्क होने की कगार पर खड़ा राज्य झारखंड आज भी गरीबी और कमजोर प्रशासन की मार झेल रहा है। देश के 40 प्रतिशत खनिज संपदा से लैस इस राज्य में आज भी लगभग 40 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन कर रहे हैं। वहीं लगभग 20 प्रतिशत शिशु और बच्चे कुपोषण का शिकार हैं।
प्रशासन और नेता शिक्षा व्यवस्था, रोजगार तो उपलब्ध करवा नहीं पा रहे हैं, लेकिन गरीब किसानों आदिवासियों की जमीन औने-पौने दाम पर उद्योगपतियों को बेच दे रहे हैं। ये उद्योगपति न सिर्फ यहाँ की अकूत खनिज सम्पदा का दोहन कर रहे हैं, बल्कि राज्य के विकास में साथ देने की जगह जंगलों का सफाया कर भूमिगत जल को दूषित कर रहे हैं, साथ ही राज्य की आबो-हवा में जहर घोल इसे पीछे धकेल रहे हैं। आइए जानते हैं कि किन कारणों से झारखंड में विकास पैदा होने से पहले ही कुपोषण का शिकार हो गया…
राजनीतिक अस्थिरता ने झारखंड को सबसे ज्यादा नुकसान पहुँचाया है। राज्य की स्थापना के 17 साल में कुल 13 सरकारें और 6 सीएम हुए हैं।
यहाँ की जीडीपी पर गौर करें तो सेवा क्षेत्र में इजाफा मैन्युफैक्चरिंग की कीमत पर आया है, जो 2004-05 के 34 फीसदी से गिरकर 2013-14 में केवल 20 फीसदी पर आ चुका है। इस दौरान सेवा क्षेत्र की हिस्सेदारी में 12 फीसदी का इजाफा हुआ, जबकि मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की हिस्सेदारी 14 फीसदी कम हुई। वहीं 13 साल में झारखंड लोक सेवा आयोग ने सिर्फ पाँच परीक्षाएँ ली हैं। उसमें भी तीन परीक्षाएँ जाँच के घेरे में हैं।
राज्य सरकार और केंद्र सरकार की मानें तो झारखंड को सबसे ज्यादा नुकसान नक्सलवाद से झेलना पड़ा। अधिकतर सरकारी योजनाएँ कारगर ढंग से लागू नहीं हो सकीं। नक्सलवाद की वजह से बिगड़े औद्योगिक माहौल के अलावा कई बड़े प्रोजेक्ट सालों से पीछे चल रहे हैं या फिर लटके हुए हैं। वहीं आँकड़ों के अनुसार झारखंड जब बना तब राज्य के 14 जिले नक्सल प्रभावित थे। ऐसे जिलों की संख्या अब बढ़कर 18 हो गई है। हालाँकि बीच के कुछ सालों में यह 21 तक पहुँच गई थी, लेकिन केंद्र सरकार के दबाव और सुरक्षा बलों की कार्रवाई के बाद कुछ जगहों से नक्सलियों का सफाया हुआ है।
एक साथ जन्में तीनों राज्यों झारखंड, उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ की तुलना करें तो बीते 17 सालों में झारखंड में शहरीकरण की रफ्तार सबसे धीमी रही । जहाँ 2000 में झारखंड में शहरी क्षेत्र 22 प्रतिशत के आसपास था वर्तमान में यह 24.05 प्रतिशत है। वहीं ऐसा तब है जब झारखंड में खनिज संपदा अकूत भरी हुई है और यहाँ औद्योगीकरण की काफी संभावनाएँ मौजूद हैं। वहीं राज्य के पहले से विकसित शहर जमशेदपुर की तुलना में देवघर और दूसरे पिछड़े शहरों में विकास की रफ्तार तेज देखी गई है।
कहते हैं इमारत उतनी ही मजबूत होती है, जितनी की उसकी नींव। झारखंड की बात करें तो इसकी नींव ही काफी कमजोर है। नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस-4) 2015-16 की रिपोर्ट के अनुसार झारखंड के 47.8 फीसदी बच्चे कुपोषित हैं। सर्वे से यह पता चला है कि इनमें से करीब चार लाख बच्चे अति कुपोषित हैं। कई रिपोर्टों में झारखंड में बच्चों व महिलाओं की स्वास्थ्य संबंधी दयनीय स्थिति की पुष्टि हो चुकी है। कुपोषण झारखंड की बड़ी समस्या है।
झारखंड में अधिकांश आदिवासी समुदाय कृषि के माध्यम से अपनी आजीविका कमाता है। झारखंड में गरीबी दर भले ही 45 प्रतिशत से घटकर 37 प्रतिशत के करीब पहुँच गया हो, झारखंड के लोगों की सामाजिक-आर्थिक हालत दयनीय है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक झारखंड के किसान परंपरागत तरीकों से खेती करके पहले खुश थे, लेकिन बदले समय के अनुसार सिंचाई सुविधा का अभाव और खाद, बीज के लिए कर्ज लेना पड़ रहा है। फसल खराब होने से किसान इस कर्ज को चुका नहीं पा रहे हैं। सरकार भी किसानों की मदद नहीं कर रही है। ऐसे में झारखंड में किसान बदहाल हो रहा है। ऐसे में अगर विकास करना है तो सरकार के लिए शीर्ष पाँच प्राथमिकताएँ होनी चाहिए शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, खनन और विनिर्माण क्षेत्र की बहाली और पहले से उभर रहे सेवा क्षेत्र को प्रोत्साहन देना, ताकि वह और तेजी से वृद्धि कर सके।
प्रश्न 2 ( क ) : संधि और समास में उदाहरण सहित अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : संधि : दो या दो से अधिक वर्णों के मेल को संधि कहते हैं।
समास : दो या दो से अधिक शब्दों के मेल को समास कहते हैं।
जैसे- यथाशक्ति – शक्ति के अनुसार, भरपेट : पेट भरकर ।
प्रश्न 2 ( ख ) : कारक किसे कहते हैं? इसके भेदों को उदाहरण सहित लिखिए।
उत्तर : कारक : संज्ञा और (या) सर्वनाम के जिस रूप से वाक्य के अन्य शब्दों के साथ संबंध सूचित हो, उसे कारक कहते हैं। जैसेश्रीराम ने खारे जल के समुद्र (संज्ञा) पर बन्दरों (संज्ञा) से पुल बँधवा दिया (क्रिया) |
> हिन्दी में आठ कारक हैं।
> कारकों का परिचय :
1. कर्त्ता : वाक्य में जो पद काम करनेवाले के अर्थ में आता है।
जैसे- मोहन पढ़ता है।
2. कर्म : जिसपर क्रिया का फल पड़े ।
जैसे- राम ने रावण को मारा। यहां ‘रावण को’ कर्म है।
3. करण : जिससे काम हो उसे ‘करण’ कहते हैं ।
जैसे- राम कलम से लिखता है।
4. सम्प्रदान : जिसके लिए काम किया जाय, उसे ‘सम्प्रदान’ कहते हैं।
जैसे- शिष्य ने अपने गुरु लिए सब-कुछ किया।
5. आपादान : जिससे किसी वस्तु को अलग किया जाय।
जैसे- पेड़ से पत्ता गिरा।
6. सम्बन्ध : जिससे किसी वस्तु का सम्बन्ध हो ।
जैसे- रहीम का मकान छोटा है।
7. अधिकरण : जिससे क्रिया का आधार जाना जाय ।
जैसे- लड़की घोड़े पर बैठी है।
8. सम्बोधन: जिससे किसी को पुकारा या सम्बोधित किया जाय।
जैसे- अरे भाई! जल्दी आओ। हे राम! दया करो।
प्रश्न 2 ( ग ) : क्रिया विशेषण से क्या तात्पर्य है? उदाहरण के साथ बताइए।
उत्तर : क्रिया: क्रिया की विशेषता बताने वाले अविकारी शब्द
क्रियाविशेषण कहलाते हैं। जैसे- चार बजे यकायक श्यामा की नींद खुली, किवाड़ खुले हुए थे आदि ।
उपयुक्त दोनों वाक्यों में रेखांकित शब्द हमें बता रहे हैं कि क्रिया कब, कहाँ, कैसे और कितनी हुई। दूसरे शब्दों में ये शब्द क्रिया की विशेषता बता रहे हैं।
> क्रियाविशेषण के चार भेद हैं – (i) कालवाचक, (ii) स्थानवाचक, (iii) रीतिवाचक तथा (iv) परिणामवाचक
प्रश्न 3 ( क ) : किन्ही पांच मुहावरों के अर्थ लिखकर उनका वाक्यों में प्रयोग कीजिए :
उत्तर :
(i) : उठा न रखना (कमी न करना) अमित ने परीक्षा में अपनी ओर से उठा न रखी, परन्तु वह सफल न हो सका।
(ii) : खेत रहना (शहीद होना) – हमारे कई सिपाही युद्ध में खेत रहे।
(iii) : गुलर का फूल होना – (दुर्लभ होना ) वातावरण में परिवर्तन के कारण कई प्राणियों की प्रजाति गुलर का फूल होती जा रही हैं।
(iv) : नाच नचाना (बहुत परेशान करना) पिछले एक महीने से चोरों ने पुलिस को नाच नचा रखा है। –
(v) : तीन तेरह होना (अलग या पृथकता की बात करना) –
मतभेद इतने बढ़े कि पूरी सभा तीन तेरह हो गई।
तक नाक रगड़ने के बाद भी रवि को नौकरी नहीं मिली।
(vii) : गर्दन उठाना ( विरोध करना ) सरकार के किसी तर्क पर सहमति नहीं होने पर विपक्षी पार्टी गर्दन उठाने लगती है।
प्रश्न 3 ( ख ) : निम्नलिखित अशुद्ध वाक्यों में से किन्ही पांच को शुद्ध कीजिए:
उत्तर : –
(ख)(i) : मैं आपका भक्त हूँ।
(ii) : उस समय आपकी आयु चालीस वर्ष थी।
(iii) : मैं अवश्य आऊँगा, भवदीय। :
(iv) : मेरे लिए बर्फ लाओ।
(vi) : मैं अपनी बात के स्पष्टीकरण के लिए तैयार हूँ।
(v) : वहां अत्यधिक भीड़ थी।
प्रश्न 4: प्रस्तुत अवतरण का उपयुक्त शीर्षक देते हुए संक्षेपण कीजिए :
उत्तर :
> शीर्षक: विकलांगता और संकल्पशक्ति
संक्षेपण – विकलांगता अभिशाप नहीं है, बल्कि एक मनोभाव है। विकलांग व्यक्ति भी अपनी दृढ़ संकल्पशक्ति के साथ समाज में सम्मान एवं गौरवपूर्ण स्थान बना सकते हैं। हेसेन कीलर, बालक बिरजानंद, बाबा आम्टे आदि प्रेरक व्यक्तियों ने अपने कृतयों से सामान्य व्यक्तियों जैसा जीवन जीने का पथ प्रशस्त किया है। इन विभूतियों ने समाज के लिए अमूल्य योगदान दिया है।
Ans. 1:
(a) The night before an examination
The night before the examination is indeed a nightmare, something like a bad dream. One suffers the agonies of fear and anxiety. All sorts of improbable accidents occur to the mind and create unnecessary nervousness and even panic. For those who have been playing truant through the year, the pattern is more or less the same. They anticipate the unlikeliest things to upset their equanimity. They are in a state of nervous tension. At one moment, they may feel a wave of optimism; at the next, the mind suddenly becomes blank; things slip out of the memory and refuse to come back. One wakes up in a cold sweat of fear.
Feelings, of course, differ from examinee to examinee. But one pre-occupation remains common: the
examination and how to pass the test. With this end in view, some feverishly glance through the well-marked passages in the textbooks, or go quickly once again through questions carefully selected and prepared; others fall back upon cram books in a last desperate effort to recover confidence, perhaps make a final attempt to discover the shortest way to success. Perhaps a friend comes with the latest suggestions from some reputed scholar, and the two set themselves to the task of getting the answers to these properly worked out. Or wild rumor filters through that questions in a certain paper have ‘leaked out’, and they become busy over these. Not having worked for success they now proceed to gamble on it.
But it is quite different with those who have not been negligent in their studies. They take things more easily. They are more confident and do not allow
themselves to be frightened by any prospect of the unexpected. They are anxious but not afraid. They may just refresh themselves over the more difficult parts of their texts for a part of the night, but for the most part, they spend the night in comfortable sleep.
The night before the examination should never excite either undue fear or unreasonable confidence. One should have one’s preparations completed beforehand, and be ready for the ordeal with courage. Worry is bad, and must be avoided; it never helps. For one thing, it disturbs sleep, and that is always undesirable. There is nothing like a few hours of sleep to refresh the mind. A tired mind will be depressed and pessimistic, and this is bad for the examinee. A fresh mind is always sure of success and can be trusted to make a good start. But a mind jaded by over-night work fumbles vaguely with facts that do not come right; that means a bad beginning and poor prospect of success.
How the night before an examination is spent depends upon the degree of preparation that leads up to it. Those who have attended to their work with diligence have nothing to fear. Unfortunately, most students are negligent. That is why there is so much hurry and scurry, so much nervousness, so much suspense, and tension. That is why so many go about picking up stray suggestions of invoking divine aid. They gamble on the chance of leakage of questions, or the mystic intervention of some mantra or magic. But as Euclid said in another context, there is no ‘royal road’ to success.
(b) Tourism in Jharkhand
The state of Jharkhand is situated on the Chhotanagpur Plateau and is known for its wild life, waterfalls, flora, fauna and National Parks. One of the three newly found states of India, the extremely mineralrich state of Jharkhand has the potential to be the economic powerhouse of India in no time.
The best time to visit Jharkhand is between the months of October and February when the weather is extremely pleasant, so one can indulge in sightseeing. At this time, the temperature remains between 10°C and 20°C. The state has a tropical climate so the summer months from March to June are extremely hot, with May being the hottest month of the year. The temperature ranges between 25°C and 37°C. July and September are the rainy seasons when there is a lot of humidity.
There are various means of transport to visit Jharkhand and its beautiful places. It is connected to rest
of the India and world by air,by rail and by road. Ranchi Airport, various stations are well connected through many flights and trains.
Ranchi, the capital city of Jharkhand is a picturesque hill station still full of old colonial charm. It is of special interest to those who are interested in anthropology for the Tribal Research Institute and museum is located here. It is well worth a visit for those who want to know more about the tribal life of Jharkhand.
On the outskirts of Ranchi lies the famous Tagore Hill, which is named after the disting ished poet Rabindranath Tagore. It is believed that he wrote a part of his famous literary work Gitanjali, and some other poems here.
The Kanke Dam is a delightful tourist spot that is regularly frequented by tourists. A few kilometers from it lies the famous 17th century Jagannath Temple.
Another interesting site is the War Cemetery, the smallest ‘concentration’ cemetery in India with a total of 708 burials.
Mccluskieganj is a small village near Ranchi that evokes nostalgia as one gradually discovers that it was once popular with the Anglo-Indian community.
The Betla National Park at Palamau is where the world’s first tiger-census was conducted in 1932. The best time to visit it is between February and April. Wild animals like the sloth bear, wolf, wild boar, panther, tiger, gaur, Indian porcupine, chinkara, sambar, mouse deer, dhole (wild dogs), and pangolin can be spotted here as one drives through the dense sal and bamboo forests.
The Hazaribagh Wildlife Sanctuary is another important site in Jharkhand. Wild boar, sambar, nilgai, cheetal and kakar can be sighted near waterholes at dusk here.
Netarhat is a beautiful sunset and sunrise point, a couple of hours from Betla. Rajrappa is famous for the “Ma Chhina Mastika” temple, where the River Bhera joins the Damodar, forming a 20 feet high waterfall. Boating facilities are available here.
Parasnath the highest hill in Jharkhand, lies on the eastern margin of the Hazaribagh plateau. A site of religious significance, 20 out of 24 Jain tirthankaras or saints (including Parsvanatha) are believed to have attained salvation in the Sammeta Shikhar here.
Deoghar or Baidyanathdham is the most important Hindu pilgrimage site for the people of Jharkhand as well as Bihar.
Along with these there are many waterfalls, river meets to enhance the beauty of Jharkhand. One will be satisfied with the tour and travel of Jharkhand in all the aspects.
(c) Uses and Abuses of Internet
An international system of communication through connecting computers and website is called as internet. It is a global computer network. Internet has completely changed our lifestyle and the style of our work as well. The invention of internet has saved our time and reduced our effort in almost every work. Internet can provide any information to us in no time that has been stored in it. So the question is ‘how can the internet be used?’. In order to use internet, we require a telephone connection, a computer and a modem.
The uses of internet are immense. Internet is used everywhere such as school, college, bank, shopping mall, railway, airport etc. Moreover, we use internet at home for different purpose. We can access different websites, social networking sites, can make online transactions through internet. Different files and information can be shared via emails or messengers. The use of internet in business has made a different platform for both the buyers and sellers. We have lots of advantages of internet.
The uses of internet for students is like a blessing to them. Students can find any information in the web to boost up their studies. Nowadays the use of internet in education is very common. The educational institutions provide internet for students at schools so that their knowledge can be improved.
We can’t decline the fact that the uses of internet have developed the human civilization a lot, but we must agree that we have both advantages and disadvantages of internet. The abuses of internet or misuse of internet can ruin a person at any moment. Generally, abuses of internet or internet abuse means the improper use of the internet. These days the teenagers are found addicted to internet as they spend most of their time on internet playing online games, surfing social networking sites etc. As a result, they are lacking behind in their studies. On the other hand, lots of people have become the victim of cybercrime. Some anti-social groups use internet to deceive people through cheat-funds. Again hackers may easily access our personal information that has been stored in internet. Misuse of internet can spoil our life.
of internet has developed us to a great extent. It has made our life simple, easy and comfortable as well. Uses of internet in education has made us wiser than before, use of internet in business has formed a different and wider market for us. Misuse of internet can definitely ruin us but if we use internet wisely, it will make our life easier and more simple in future.
(d) An interesting train journey
A train is not just a vehicle. It carries emotions; it carries the joy of moving forward, it carries the thrill of speed. Many times, when we read about any train journey in a book or on the internet, we are told the story of travelling in inter-state trains. However, a local trainjourney is not devoid of thrill, adventure and happiness either.
Last week I travelled to Kolkata from Tata on steel Express train. We reached the station at 10 am. The station itself had many stories to tell. There were so many people families, office-goers, masons, labourers, vendors, the fruit hawkers and food sellers and so on. All looked so busy, so full of life. As I was sitting in the station for my train to arrive, I saw many trains come and go. A deep realisation engulfed me – the trains come and go, the station remains the same.
Almost 15 minutes later, our train arrived. There was so much rush as it was office hour. At first, there was no seat for us to sit. The train started moving and the station moved backwards. It felt so amazing to imagine that the train was still but the trees and the houses were moving. However, it was hard for me to look out from the window because of the crowd. The office goers were the regular commuters, so they remained in their group and talked about politics and the sports. The women in the train were sitting and wiping the sweat off their faces. I saw two senior citizens. They were standing. It felt good to see that some of the passengers offered their seats to those two people. However, there were some rowdies too in the train who were standing near the door and were blocking the entrance. People were finding it hard to enter the train because of them.
As two or three stations passed, the crowd in the train became thin. Now, I could enjoy the journey. I got a seat. The typical sound of the moving train had a rhythm to it. It felt musical. Outside the window, I could see the meadows, the houses, the cows and goats. The train was moving at a decent speed and the air from the window brushed my face. It felt good in the sweltering
heat. There was a couple sitting on the opposite seat. They had 5-year old daughter travelling with them. Somehow, the family and I started a conversation and it felt good to meet new people.
While I was in the train, many hawkers boarded the compartment. They were selling different kinds of things. Some were selling toffees and snack items, some were selling files and copies, some were selling perfumes and so on. The speciality of these local train hawkers was, they can outshine any advertisement-writer with their own salespitch. Their sales pitches were not bland and dry. Some sang songs, some imitated the politicians while selling things. They had a very distinct sense of literature.
There was one thing that I wish I had not experienced. Apart from the green meadows that I saw from the windows, I also saw countless huts and tinshade houses. There were many slums that were situated beside the rail line. The poverty all around was disheartening to see. I promised myself to help these poor people when I’ll start earning money.
As the train stopped at my destination station, I got down. After leaving the station, I felt like I was living on another planet for the past 4 hours. It was not a train journey. It was an epiphany.
Question 2 (i): Fill in the blanks with appropriate articles wherever necessary.
Ans. :
(i) : A; the; a; the; the.
Question 2 (ii): Correct and rewrite only five of the following sentences. If a sentence is grammatical, mention it.
Ans. :
(a) My mother is a good cook.
(b) I don’t know how to drive a car.
(c) He did not know the answer.
(d) He knows where does his father live.
(e) One of my friends is a palmist.
(f) He died of cholera.
(g) There are twenty sheep in the field.
Question 2 (iii): Use the correct form of each verb given in the bracket, You may include an auxiliary verb along with it, if required attempt any five.
Ans. :
(a) wrote,
(c) had left,
(d) completed,
(e) reading,
(f) composes,
(g) come
Question 3: Read the given passage carefully and answer the questions that follow :
Ans. :
(a) : The house was mud-malled and the roof was of thatch. There were several rooms inside the house, the floor was smooth and polished with the usual mixture of cow dung and water.
(b) : Host’s elder brother stayed in a cage, because he has had a stroke of paralysis and though he was asked to live in the house. He chose to live out there, so that he could easily listen to the villagers when they come to him.
(c) : Author was not able to talk to the elder brother because his english was not good enough. They could only exchange greetings and look at each other with friendliness.
(d) : The host was called out by the villagers to kill a dangerous snake.
(e) : (i) a feeling of great surprise or wonder. (ii) the process of growing old, elderly.
Question 4: Make a precise of the following passage and give a suitable title to it.
Ans. Tittle of the precies ‘Marie Curie: The Legend’ Marie Curie’s story is legendary. A beautiful woman, belonging to Poland, an oppressed nation, she moved to Paris and lived in poverty until she met her husband. Their discovery of Radium created a new science and allowed treatment of a dreadful disease. Despite her husband’s tragic death and her own illnesses, she brilliantly continued developing the science they had created.
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Sujeet Jha

Editor-in-Chief at Jaankari Rakho Web Portal

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