नाम-कीर्तन के आगे कवि किन कर्मों की व्यर्थता सिद्ध करता है ?

नाम-कीर्तन के आगे कवि किन कर्मों की व्यर्थता सिद्ध करता है ? उत्तर :- पुस्तक-पाठ, व्याकरण के ज्ञान का बखान, दंड-कमण्डल धारण करना, शिखा बढ़ाना, तीर्थ-भ्रमण, जटा बढ़ाना, तन में भस्म लगाना, वसनहीन होकर नग्न-रूप में घूमना इत्यादि के अनुसार नाम-कीर्तन के आगे व्यर्थ हैं। हमसे जुड़ें, हमें फॉलो करे .. Telegram ग्रुप ज्वाइन करे … Read more

गुरु की कृपा से किस युक्ति की पहचान हो पाती है ?

गुरु की कृपा से किस युक्ति की पहचान हो पाती है ? उत्तर :- कवि कहते हैं कि ब्रह्म से साक्षात्कार करने हेतु लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष, निंदा आदि से दूर होना आवश्यक है। ब्रह्म की सान्निध्य के लिए सांसारिक विषयों – से रहित होना अत्यन्त जरूरी है । ब्रह्म-प्राप्ति की इसी युक्ति की पहचान … Read more

‘शिक्षा और संस्कृति’ पाठ का सारांश लिखिए।

‘शिक्षा और संस्कृति’ पाठ का सारांश लिखिए। अथवा, शिक्षा और संस्कृति के संबंध में महात्मा गाँधी के विचारों को स्पष्ट कीजिए। उत्तर :- गाँधीजी के विचार से अहिंसक प्रतिरोध सबसे उदात्त ओर बढिया शिक्षा है। वर्णमाला सीखने के पहले बच्चे को आत्मा,, सत्य, प्रेम और आत्मा की छिपी शक्तियों का पता होना चाहिए। यह बताया … Read more

गाँधीजी कताई और धुनाई जैसे ग्रामोद्योगों द्वारा सामाजिक क्रांति कैसे संभव मानते थे ?

गाँधीजी कताई और धुनाई जैसे ग्रामोद्योगों द्वारा सामाजिक क्रांति कैसे संभव मानते थे ? उत्तर :- कताई और धुनाई जैसे ग्रामोद्योगों के संबंध में गाँधीजी की कल्पना थी कि यह एक ऐसी शांत सामाजिक क्रांति की अग्रदूत बने । जिसमें अत्यंत दूरगामी परिणाम भरे हुए हैं। इससे नगर और ग्राम के संबंधों का एक स्वास्थ्यप्रद … Read more

अपनी संस्कृति और मातृभाषा की बुनियाद पर दूसरी संस्कृतियों और भाषाओं से संपर्क क्यों बनाया जाना चाहिए ? गाँधीजी की राय स्पष्ट कीजिए।

अपनी संस्कृति और मातृभाषा की बुनियाद पर दूसरी संस्कृतियों और भाषाओं से संपर्क क्यों बनाया जाना चाहिए ? गाँधीजी की राय स्पष्ट कीजिए। उत्तर :- गाँधीजी के विचारानुसार अपनी मातृभाषा के माध्यम बनाकर हम अत्यधिक विकास कर सकते हैं। अपनी संस्कृति के माध्यम से जीवन में तेज गति से उत्थान किया जा सकता है । … Read more

दूसरी संस्कृति से पहले अपनी संस्कृति की गहरी समझ क्यों जरूरी है ?

दूसरी संस्कृति से पहले अपनी संस्कृति की गहरी समझ क्यों जरूरी है ? उत्तर :- दूसरी संस्कृतियों की समझ और कद्र स्वयं अपनी संस्कृति की कद्र होने और उसे हजम कर लेने के बाद होनी चाहिए, पहले हरगिज नहीं। कोई संस्कृति इतने रत्न-भण्डार से भरी हुई नहीं है जितनी हमारी अपनी संस्कृति है। सर्वप्रथम हमें … Read more

गाँधीजी देशी भाषाओं में बड़े पैमाने पर अनुवाद-कार्य क्यों आवश्यक मानते थे ?

गाँधीजी देशी भाषाओं में बड़े पैमाने पर अनुवाद-कार्य क्यों आवश्यक मानते थे ? उतर :- गाँधीजी का मानना था कि देशी भाषाओं में अनुवाद के माध्यम से किसी भी भाषा के विचारों को तथा ज्ञान को आसानी से ग्रहण किया जा सकता है। अंग्रेजी या संसार के अन्य भाषाओं में जो ज्ञान-भंडार पड़ा है, उसे … Read more

गाँधीजी किस तरह के सामंजस्य को भारत के लिए बेहतर मानते हैं और क्यों ?

गाँधीजी किस तरह के सामंजस्य को भारत के लिए बेहतर मानते हैं और क्यों ? उतर :- गाँधीजी भिन्न-भिन्न संस्कृतियों के सामंजस्य को भारत के लिए बेहतर मानते हैं, क्योंकि भिन्न-भिन्न संस्कृतियों के सामंजस्य भारतीय जीवन को प्रभावित किया है और स्वयं भी भारतीय जीवन से प्रभावित हुई है। यह सामंजस्य कुदरती तौर पर स्वदेशी … Read more

शिक्षा का ध्येय गाँधीजी क्या मानते थे और क्यों ?

शिक्षा का ध्येय गाँधीजी क्या मानते थे और क्यों ? उत्तर :- शिक्षा का ध्येय गाँधीजी चरित्र-निर्माण करना मानते थे। उनके विचार से शिक्षा के माध्यम से मनुष्य में साहस, बल, सदाचार जैसे गुणों का विकास होना -चाहिए, क्योंकि चरित्र-निर्माण होने से सामाजिक उत्थान स्वयं होगा । साहसी और सदाचारी व्यक्ति के हाथों में समाज … Read more

मस्तिष्क और आत्मा का उच्चतम विकास कैसे संभव है ?

मस्तिष्क और आत्मा का उच्चतम विकास कैसे संभव है ? उत्तर :- शिक्षा का प्रारंभ इस तरह किया जाए कि बच्चे उपयोगी दस्तकारी सीखें और जिस क्षण से वह अपनी तालीम शुरु करें उसी क्षण उन्हें उत्पादन का काम करने योग्य बना दिया जाए। इस प्रकार की शिक्षा-पद्धति में मस्तिष्क और आत्मा का उच्चतम विकास … Read more