भारतीय आर्थिक नियोजन की मुख्य उपलधियों का मूल्यांकन कीजिए |

भारतीय आर्थिक नियोजन की मुख्य उपलधियों का मूल्यांकन कीजिए |

अथवा

आर्थिक नियोजन की अवधारणा को स्पष्ट करें।
अथवा
भारत में आर्थिक नियोजन के स्वरूप का उल्लेख करें।
अथवा
भारत में संचालित विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं की उपलब्धियों का वर्णन करें।
उत्तर – आर्थिक नियोजन का अर्थ एक संगठित आर्थिक प्रयास से है जिसमें एक निश्चित अवधि में सुनिश्चित एवं सुपरिभाषित सामाजिक एवं आर्थिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए आर्थिक साधनों का विवेकपूर्ण ढंग से समन्वय एवं नियंत्रण किया जाता है। “
चूंकि भारतीय अर्थव्यवस्था एक मिश्रित अर्थव्यवस्था है जहां सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र का सह अस्तित्व पाया जाता है जिसमें आर्थिक नियोजन को विकास की प्रक्रिया में केन्द्रीय स्थान दिया गया है। आर्थिक नियोजन के उद्देश्यों में आर्थिक विकास को बढ़ावा देना, गरीबी एवं बेरोजगारी की समस्या का निवारण करना, सामाजिक न्याय एवं आत्मनिर्भरता प्राप्त करना, निवेश एवं पूंजी निर्माण में वृद्धि करना, मानव संसाधन का विकास करना एवं समावेशी विकास निहित है।
1950 में सीमित संसाधनों का वरीयता के आधार पर उपयोग कर तेज विकास सुनिश्चित करने के लिए योजना आयोग के नेतृत्व में योजनागत विकास का ढांचा तय किया गया। योजना आयोग के निम्नलिखित कार्य निर्धारित किये गये –
> संसाधनों की पहचान करना ।
> विकास के लिए क्षेत्र एवं वरीयता का निर्धारण करना ।
> योजना का निर्माण करना।
> संसाधनों का आवंटन करना ।
> योजना के क्रियान्वयन की देख-रेख एवं उनका मूल्यांकन करना, आदि।
योजना आयोग द्वारा तैयार योजना में राज्यों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए योजना का अंतिम अनुमोदन राष्ट्रीय विकास परिषद द्वारा किया जाता है। अब तक कुल 12 पंचवर्षीय योजनाएं बनी हैं लेकिन 12वीं पंचवर्षीय योजना की समयावधि 31 मार्च, 2017 तक के बीच में ही नरेन्द्र मोदी सरकार ने 1 जनवरी, 2015 को योजना आयोग की जगह नीति आयोग का गठन कर दिया। इन वर्षों में विकास से संबंधित सभी क्षेत्रों में महत्वपूर्ण सुधार हुए हैं। जैसे
> खाद्यान्न के मामले में 1950 में कुल उत्पादन 5.05 करोड़ टन था जबकि आज (2018-19) यह 27 करोड़ टन तक पहुंच गया है।
> प्रति व्यक्ति आय स्थिर मूल्य पर 1950-51 में 3687 रु. वार्षिक थी, वहीं आज (2018-19) यह बढ़कर 1,12,835 रु. से अधिक हो गई है।
> 1950-51 में जीवन प्रत्याशा 32.1 वर्ष था वहीं आज (2018-19) यह बढ़कर 68.64 से अधिक हो गया है।
> 1950-51 में मृत्यु दर 27.4 प्रति हजार था, जो आज घटकर 7.3 प्रति हजार हो गया है।
>  1950-51 में साक्षरता दर 18.33% था जो आज (2018-19) बढ़कर 73 हो गया है।
> 1950-51 में प्रति दस हजार पर पंजीकृत चिकित्सकों की संख्या 6.18 थी, जो आज बढ़कर 600 से अधिक हो गया है।
> 1950-51 में विद्युत उत्पादन क्षमता 1400 मेगावाट था, जो आज (2018-19) बढ़कर 5,65,530 मेगावाट हो गया है।
 > 1950-51 में दूरसंचार घनत्व शून्य था जो आज (2018-19) बढ़कर 93% हो गया है ।
> 1950-51 में कुल रेल नेटवर्क 53.6 हजार किमी. थी, जनमें अधिकांश छोटी लाइन एवं एकल लाइन थी, आज (2018-19) कुल रेल नेटवर्क 67,312 किमी. हो गयी है, जिनमें अधिकांश बड़ी एवं डबल लाइन है।
>  1950-51 में विद्युतीकृत रेल लाइन 400 किमी थी, जो आज (2018-19) बढ़कर 33,057 किमी. हो गयी है।
> राष्ट्रीय राजमार्गों के साथ-साथ अन्य सड़कों की लम्बाई एवं गुणवत्ता में व्यापक सुधार हुआ है।
> नगर विमान क्षेत्र में भी व्यापक सुधार है। 1950-51 की तुलना में आज विमान कंपनियों की विमानों, विमान यात्रियों एवं हवाई अड्डों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है।
> 1950-51 की तुलना में लौह-इस्पात की उत्पादन क्षमता 10 लाख टन से बढ़कर 2018-19 में 17.9 करोड़ टन हो गया है।
> 1950-51 की तुलना मे सीमेन्ट की उत्पादन क्षमता 27 लाख टन से बढ़कर 2018-19 में 45.5 करोड़ टन हो गया है ।
> 1950-51 की कोयला की उत्पादन क्षमता 3.2 करोड़ टन से बढ़कर 2018-19 में 67.6 करोड़ टन हो गया है।
> 1950-51 की तुलना में कच्चे तेल का उत्पादन क्षमता 3 लाख टन से बढ़कर 2018-19 में 7.24 करोड़ टन हो गया है ।
इस तरह कृषि क्षेत्र, औद्योगिक क्षेत्र, सामाजिक सूचकों में उपरोक्त वृद्धि के साथ-साथ भारत में व्यापार-वाणिज्य भुगतान संतुलन, विदेशी मुद्रा मामले तथा सेवा क्षेत्र से संबंधित मामलों में भारी वृद्धि एवं विस्तार हुआ है। वर्तमान में सकल घरेलू उत्पाद में सेवा क्षेत्र की भागीदारी लगभग 57% हो गई है।
उपरोक्त महत्वपूर्ण सुधारों के कारण भारत आज विकासशील से विकसित देश बनने की ओर अग्रसर है, किन्तु इस प्रक्रिया की कुछ सीमाएं भी रह गई हैं जैसे
> आज भी लगभग 27 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं।
> क्षेत्रीय असंतुलन बढ़ा है।
> उड़ीसा एवं बिहार जैसे राज्यों का औसत राष्ट्रीय मानकों से काफी पीछे है। कमजोर तबके के लोग जैसे- अनुसूचित जाति एवं जनजाति, महिलाएं एवं बच्चों के साथ अनेक प्रकार की समस्याएं हैं जैसे गरीबी, बेरोजगारी, कुपोषण, बाल श्रम जैसी समस्याएं गम्भीर है।
> गांव एवं शहर के बीच का अन्तर बढ़ता चला गया है। शहर बेहतर जीवन के केन्द्र बन गये हैं। परिणामतः गांव से शहर की ओर पलायन की समस्या बढ़ गयी है।
> अभी भी विकास के अनुरूप आधारभूत संरचना का विकास नहीं हो सका है जैसे- विद्युत का उत्पादन एवं आपूर्ति, परिवहन – प्रणाली, कृषि सहायक क्रियाओं का विकास आदि ।
>  विदेश व्यापार के मामले में भी नकारात्मक व्यापार संतुलन तथा चालू खाते में नकारात्मक भुगतान संतुलन की समस्या विद्यमान है।
> बढ़ती जनसंख्या को नियंत्रित नहीं कर पाना भी गम्भीर समस्या है। इसके कारण विकास का प्रभाव औसत रह जाता है।
 उपरोक्त सीमाओं को दूर करने के लिए कुछ कारगर कदम उठाने की आवश्यकता है। इस संदर्भ में दो स्तरीय कदम आवश्यक हैं-
1. विकास की गति को तेज करना एवं इसके लिए निजी क्षेत्र की भागीदारी को सुनिश्चित करना ।
2. कमजोर तबकों एवं पिछड़े क्षेत्रों के विकास पर विशेष बल देना तथा जनसंख्या नियंत्रण के लिए तत्कालीन उपायों के साथ-साथ दीर्घकालीक उपायों के लिए कदम उठाना भी आवश्यक है, जिससे विकास की प्रभाविता व्यक्त हो और भारत एक सशक्त देश के रूप में अंतर्राष्ट्रीय मंच पर उभर सके। इस तरह भारत के आर्थिक एवं सामाजिक विकास में आयोजन का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। आज उदारीकरण में इसका महत्व और अधिक बढ़ गया है, क्योंकि यह अनियंत्रित आर्थिक एवं सामाजिक विकास के न्यायपूर्ण वितरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
अतः स्पष्ट है कि भारत का विकास मूल रूप से योजनागत प्रारूप पर ही निर्भर है और इसी के आधार पर भारत के समस्त आर्थिक एवं सामाजिक क्षेत्र का विकास संभव हो सकता है इसलिए इसे सफल बनाने के लिए पारदर्शिता एवं दृढनिश्चयता पर बल देना चाहिए।
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