हिन्दी साहित्य में नाटकों का प्रारम्भ और प्रगति

हिन्दी साहित्य में नाटकों का प्रारम्भ और प्रगति भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से पूर्व हिन्दी में नाटक साहित्य नहीं के बराबर था। जो कुछ था भी वह  नाममात्र के लिए था। उन नाटकों में न नाटकीय लक्षण थे, न मौलिकता । अधिकांश नाटक संस्कृत के नाटकों के आधार पर लिखे हुए पद्यबद्ध नाटकीय काव्य थे। इस प्रकार … Read more

हिन्दी साहित्य में कहानियों का उद्भव और विकास

हिन्दी साहित्य में कहानियों का उद्भव और विकास कहानी के मूल में जिज्ञासा और अभिव्यक्ति दो प्रबल मनोवृत्तियाँ कार्य करती हैं।  सभ्यता  के प्रारम्भिक क्षणों में जब मनुष्य ने भाषा सीखी होगी तब मनोगत अनुभवों को दूसरों पर व्यक्त करने और दूसरों के अनुभव सुनने के लिये कहानी का आश्रय लिया होगा। अतः कहानी साहित्य … Read more

हिन्दी साहित्य में उपन्यासों का उद्भव और विकास

हिन्दी साहित्य में उपन्यासों का उद्भव और विकास १९वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में समय की कठोर आवश्यकताओं ने जहाँ गद्य के विकास में योग दिया, वहाँ उपन्यास साहित्य की भी श्रीवृद्धि हुई। अंग्रेजी तथा उससे प्रभावित बंगाली तथा मराठी उपन्यासों में हिन्दी साहित्यकारों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया। भारतेन्दु जी के समय में अनेकों … Read more

मुसलमान कवियों की हिन्दी सेवा

मुसलमान कवियों की हिन्दी सेवा  राजनैतिक क्षेत्र में हिन्दू और मुसलमानों के कुछ भी सम्बन्ध रहे हों, परन्तु साहित्यिक क्षेत्र में मुसलमानों ने हिन्दी की अमूल्य सेवा की,वे हिन्दुओं के अधिक निकट आये । भारतीय  सभ्यता और संस्कृति से वे अत्यधिक  प्रभावित हुए, धार्मिक क्षेत्र में यद्यपि वे एकेश्वरवाद को मानते थे। उनका मूलमन्त्र था-‘ला … Read more

हिन्दी साहित्य में गीतिकाव्य परम्परा-उद्भव और विकास

हिन्दी साहित्य में गीतिकाव्य परम्परा-उद्भव और विकास जब मानव के व्यक्तिगत अनुभव, भावावेश में संगीतमय होकर कोमलकांत पदावली के  माध्यम से अभिव्यक्त होते हैं, उन्हें गीत कहते हैं। भारतीय समस्त साहित्य ही गेय होता था, इसीलिए  गीतिकाव्य का भारतीय साहित्य में कोई पृथक् अस्तित्व नहीं रहा । जैसा कि अंग्रेजी में गीति को ‘लिरिक’ कहते … Read more

राष्ट्र-निर्माण में साहित्य का महत्व और प्राण से नहीं कर शरीर के महत्व

राष्ट्र-निर्माण में साहित्य का महत्व और प्राण से नहीं कर शरीर के महत्व जिस प्रकार शब्द से अर्थ को और अर्थ से शब्द को तथा शरीर से प्राण को शरीर को पृथक् नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार हम राष्ट्र को भी साहित्य से पृथक् सकते और न साहित्य को राष्ट्र से । जिस प्रकार … Read more

हिन्दी काव्य में प्रकृति चित्रण

हिन्दी काव्य में प्रकृति चित्रण प्रकृति चित्रण प्रकृति मानव की चिरसंगिनी रही है। अपने दैनिक जीवन के कृत्यों से उसका जब-जब मन ऊबा, तब तब उसने प्रकृति का आश्रय लिया । उसने अनुभव किया कि प्रकृति उसके दुःख में दुःखी और सुख में सुखी है। आकाश, सूर्य, तारागण, समुद्र, मेघ, बिजली, द्रुमलतायें, पशु-पक्षी, ऊषा की … Read more

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल अथवा हिन्दी में वैज्ञानिक समालोचना के जन्मदाता

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल अथवा हिन्दी में वैज्ञानिक समालोचना के जन्मदाता आपके प्रिय निबन्धकार की शैलीगत विशेषतायें अथवा मेरा प्रिय लेखक- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल अथवा हिन्दी में वैज्ञानिक समालोचना के जन्मदाता – मेरा प्रिय लेखक निबन्धकार एवं हिन्दी में वैज्ञानिक समालोचना के जन्मदाता आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जी हैं। शुक्ल जी हिन्दी के अद्भुत समालोचक, उच्चकोटि के … Read more

बिहारी के काव्य में गागर में सागर भरा हुआ है

बिहारी के काव्य में गागर में सागर भरा हुआ है मेरा प्रिय कवि अथवा “बिहारी के काव्य में गागर में सागर भरा हुआ है” आविर्भाव का समय – अपने-अपने मन की बात है। किसी को मीठा अच्छा लगता और किसी को खट्टा और नमकीन । किसी को फीका दूध अच्छा लगता है तो किसी को … Read more

साहित्य समाज का दर्पण है | साहित्य अपने समय का प्रतिबिम्ब होता है

साहित्य समाज का दर्पण है | साहित्य अपने समय का प्रतिबिम्ब होता है  “साहित्य समाज का दर्पण है” अथवा “साहित्य अपने व्यापक अर्थ में समाज के गूँगे इतिहास का मुखर सहोदर है” अथवा “साहित्य अपने समय का प्रतिबिम्ब होता है “ “हितने सहितम्, सहितम्, साहितस्य भावः साहित्यम्” इस विग्रह के अनुसार साहित्य का शाब्दिक अर्थ … Read more