राजस्थान के इतिहास के स्रोत : अभिलेख एवं सिक्के

राजस्थान के इतिहास के स्रोत : अभिलेख एवं सिक्के

राजस्थान के प्रमुख अभिलेख

उत्कीर्ण अभिलेखों के अध्ययन को ‘एपीग्राफी’ (पुरालेखशास्त्र) कहा जाता है। अभिलेखों एवं दूसरे पुराने दस्तावेजों की प्राचीन लिपि का अध्ययन ‘पेलियोग्राफी’ (पुरालिपिशास्त्र) कहलाता है । भारतीय लिपियों पर पहला वैज्ञानिक अध्ययन डॉ. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा ने किया। श्री ओझा ने भारतीय लिपियों पर ‘ भारतीय प्राचीन लिपिमाला’ पुस्तक की रचना की ।

राजस्थान के इतिहास को जानने के स्त्रोत

पुरातात्विक स्त्रोत पुरालेखागारिय स्त्रोंत साहित्यिक स्त्रोत
सिक्के हकीकत बही राजस्थानी साहित्य
शिलालेख हुकूमत बही संस्कृत साहित्य
ताम्रपत्र कमठाना बही फारसी साहित्य

साहित्यिक स्त्रोत

राजस्थानी साहित्य साहित्यकार
पृथ्वीराजरासो -चन्दबरदाई
बीसलदेव रांसो -नरपति नाल्ह
हम्मीर रासो -जोधराज
हम्मीर रासो -शारगंधर
संगत रासो -गिरधर आंसिया
बेलिकृष्ण रूकमणीरी -पृथ्वीराज राठौड़
अचलदास खीची री वचनिका -शिवदास गाडण
कान्हड़ दे प्रबन्ध -पदमनाभ
पातल और पीथल -कन्हैया लाल सेठिया
धरती धोरा री -कन्हैया लाल सेठिया
लीलटास -कन्हैया लाल सेठिया
रूठीराणी, चेतावणी रा चूंगठिया -केसरीसिंह बारहड
राजस्थानी कहांवता -मुरलीधर ब्यास
राजस्थानी शब्दकोष -सीताराम लालस
नैणसी री ख्यात -मुहणौत नैणसी
मारवाड रे परगाना री विगत -मुहणौत नैणसी
संस्कृत साहित्य
पृथ्वीराज विजय – जयानक (कश्मीरी)
हम्मीर महाकाव्य – नयन चन्द्र सूरी
हम्मीर मदमर्दन – जयसिंह सूरी
कुवलयमाला – उद्योतन सूरी
वंश भासकर/छंद मयूख – सूर्यमल्ल मिश्रण (बंूदी)
नृत्यरत्नकोष – राणा कुंभा
भाषा भूषण – जसवंत सिंह
एक लिंग महात्मय – कान्ह जी ब्यास
ललित विग्रराज – कवि सोमदेव
फारसी साहित्यः
चचनामा – अली अहमद
मिम्ता-उल-फुतूह – अमीर खुसरो
खजाइन-उल-फुतूह – अमीर खुसरों
तुजुके बाबरी (तुर्की) बाबरनामा – बाबर
हुमायूनामा – गुलबदन बेगम
अकनामा/आइने अकबरी – अबुल फजल
तुजुके जहांगीरी – जहांगीर
तारीख -ए-राजस्थान – कालीराम कायस्थ
वाकीया-ए- राजपूताना – मुंशी ज्वाला सहाय

 घोसुन्डी शिलालेख (द्वितीय शताब्दी ई.पू.)

द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व का यह लेख नगरी (चित्तौड़) के समीप घोसुन्डी ग्राम से प्राप्त हुआ है। इस शिलालेख का महत्त्व द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व में भागवत धर्म का प्रसार, संकर्षण और वासुदेव की मान्यता तथा अश्वमेध यज्ञ का प्रचलन आदि से है। इस प्रकार भागवत धर्म के प्रचलन की जानकारी देने वाला यह राजस्थान में प्राचीनतम प्रमाण है।

नांदसा यूप- स्तम्भ लेख (225 ई.)

भीलवाड़ा जिले में स्थित इस यूप-स्तम्भ की स्थापना 225 ई. में की गई थी। इस लेख से पता चलता है कि शक्तिगुणगुरु नामक व्यक्ति ने यहाँ षष्ठिरात्र (छ: रातों में सम्पन्न) यज्ञ किया था। इस स्तम्भ की स्थापना पश्चिमी (शक) क्षत्रपों के राज्य – काल में सोम द्वारा की गई थी ।

बड़वा स्तम्भ लेख (238-39 ई.)

बारौँ जिले में अन्ता के समीप बड़वा ग्राम से 238-239 ई. के ( पूर्व गुप्तकालीन) तीन यूप-स्तम्भ लेख प्राप्त हुए हैं। इनमें त्रिरात्र यज्ञों का उल्लेख है जिन्हें बलवर्धन, सोमदेव तथा बलसिंह नामक तीन भाइयों ने सम्पादित किया था। एक अन्य लेख में मौखरी वंशी धनत्रात द्वारा किये गये अप्तयाम (एक पूरे दिन के बाद दूसरे दिन तक चलने वाला) यज्ञ का उल्लेख है।

गंगधार का लेख ( 423 ई.)

यह लेख झालावाड़ जिले में गंगधार नामक स्थान से प्राप्त हुआ है जिसकी भाषा संस्कृत है । इस लेख के अनुसार राजा विश्वकर्मा के मंत्री मयूराक्ष ने एक विष्णु मन्दिर का निर्माण करवाया था। उसने तांत्रिक शैली का मातृगृह और एक बावड़ी का भी निर्माण करवाया था। इस लेख से पाँचवीं शताब्दी की सामंती व्यवस्था के बारे में भी जानकारी प्राप्त होती है।

भ्रमरमाता का लेख ( 490 ई.)

छोटी सादड़ी (प्रतापगढ़) के भ्रमरमाता मन्दिर से प्राप्त इस लेख की तिथि 490 ई. है । संस्कृत पद्य में लिखित इस प्रशस्ति का रचयिता ब्रह्मसोम और उत्कीर्णक पूर्वा था । इसमें गौर वंश और औलिकर वंश के शासकों का वर्णन है। यह लेख प्रारम्भिक सामन्त प्रथा और पाँचवीं शताब्दी की राजनीतिक स्थिति की जानकारी के लिए महत्त्वपूर्ण है।

सांमोली शिलालेख (646 ई.)

उदयपुर जिले के सांमोली ग्राम से प्राप्त यह लेख गुहिल वंश के शासक शिलादित्य के समय का है। मेवाड़ के गुहिल वंश के समय को निश्चित करने तथा उस समय की आर्थिक और साहित्यिक स्थिति की जानकारी के लिए यह लेख विशेष महत्त्वपूर्ण है।

अपराजित का शिलालेख (661 ई.)

वि. सं. 718 (661 ई.) का यह लेख नागदा के समीपस्थ कुंडेश्वर मन्दिर की दीवार पर लगा हुआ था, जिसे डॉ. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा ने विक्टोरिया हॉल म्यूजियम (अजमेर) में सुरक्षित रखवाया । लेख की भाषा संस्कृत है। गुहिल शासक अपराजित के इस लेख से गुहिलों की उत्तरोत्तर विजयों के बारे में सूचना प्राप्त होती है। लेखानुसार अपराजित ने एक तेजस्वी शासक वराहसिंह को पराजित कर उसे अपना सेनापति नियुक्त किया था। इसमें विष्णु मन्दिर के निर्माण का भी उल्लेख है । इस लेख की सुन्दर लिपि तथा स्पष्ट भाषा से मेवाड़ में विकसित शिल्पकला का पता चलता है। इससे 7वीं शताब्दी के मेवाड़ की धार्मिक तथा राजनैतिक व्यवस्था के बारे में भी महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है । इस प्रशस्ति की रचना दामोदर ने की और इसे यशोभट्ट ने उत्कीर्ण किया था।

चित्तौड़ का मानमोरी का लेख (713 ई.)

713 ई. का यह लेख चित्तौड़ के पास मानसरोवर झील के तट पर कर्नल टॉड को प्राप्त हुआ था। इसके रचयिता पुष्प और उत्कीर्णक शिवादित्य थे । जेम्स टॉड ने इस लेख को ब्रिटेन ले जाते समय किसी कारणवश समुद्र में फेंक दिया था, परिणामस्वरूप इस लेख की प्रतिलिपि केवल टॉड की पुस्तक एनाल्स में मिलती है ।

कणसवा (कंसुआ) का लेख (738 ई.)

यह लेख कोटा के निकट कंसुआ के शिवालय से मिला है जिसकी तिथि 738 ई. है । इस लेख में धवल नाम के मौर्य शासक का उल्लेख है । इसके बाद किसी मौर्यवंशी राजा का राजस्थान में वर्णन नहीं मिलता है ।

चाटसू की प्रशस्ति ( 813 ई.)

यह प्रशस्ति जयपुर जिले के चाटसू नामक स्थान से प्राप्त हुई है, जिसमें चाटसू के गुहिल शासकों की वंश परम्परा और उपलब्धियों की जानकारी प्राप्त होती है । इस लेख से पता चलता है कि चाटसू के गुहिल प्रतिहार वंश के शासकों के अधीन थे। इस वंश में मेवाड़ के गुहिलों की भाँति शिवभक्ति और विष्णुभक्ति का प्रचलन था।

बुचकला शिलालेख (815 ई.)

जोधपुर जिले में बिलाड़ा के समीप बुचकला गाँव के पार्वती मन्दिर में यह शिलालेख मिला है। इसकी भाषा संस्कृत पद्य है। यह लेख प्रतिहार शासक नागभट्ट द्वितीय के समय का है । इस लेख में प्रतिहार वंश के शासकों और सामन्तों के नाम मिलते हैं, जिससे उस समय के शासकों और सामन्तों के सम्बन्ध और स्तर का अनुमान लगाया जा सकता है।

मण्डोर का शिलालेख (837 ई.)

यह लेख मूलतः मण्डोर के विष्णुमन्दिर में लगा हुआ था जिसे बाद में जोधपुर के शहरपनाह में लगा दिया गया। यह लेख मण्डोर के प्रतिहारों की वंश परम्परा जानने के लिए महत्त्वपूर्ण ।

घटियाला का शिलालेख (861 ई.)

जोधपुर से 22 मील दूर घटियाला नामक स्थान पर एक जैन मन्दिर जिसे ‘माता की साल’ कहते हैं, के समीप स्थित स्तम्भ पर चार लेखों का समूह है । लेख की भाषा संस्कृत है जिसमें गद्य और पद्य का प्रयोग किया गया है । इस लेख में प्रतिहार शासकों, मुख्यतः कक्कुक प्रतिहार की उपलब्धियों और राजनीतिक, सामाजिक व धार्मिक नीतियों के बारे में सूचना प्राप्त होती है । इस लेख में ‘मग’ जाति के ब्राह्मणों का भी विशेष उल्लेख किया गया है जो वर्ण विभाजन का द्योतक है। ‘मग’ ब्राह्मण ओसवालों के आश्रय में रहकर निर्वाह करते थे तथा जैन मन्दिरों में भी पूजा सम्पन्न करवाते थे । ये लेख मग द्वारा लिखे गये तथा स्वर्णकार कृष्णेश्वर द्वारा उत्कीर्ण किये गये थे। ।

घटियाला के दो अन्य लेख (861 ई.)

यह लेख भी मंडोर के प्रतिहार शासक कक्कुक के समय का है । इस लेख में हरिश्चन्द्र से प्रारम्भ कर कक्कुक तक के मंडोर के प्रतिहारों की वंशावली तथा उनकी उपलब्धियों का उल्लेख किया गया है । इस लेख का अन्तिम श्लोक स्वयं कक्कुक ने लिखा था जिससे प्रतिहार शासकों की विद्वता की जानकारी मिलती है ।

सारणेश्वर प्रशस्ति ( 953 ई.)

यह प्रशस्ति उदयपुर के श्मशान के सारणेश्वर नामक शिवालय के पश्चिमी द्वार के छबने पर लगी हुई है। इसकी भाषा संस्कृत और लिपि नागरी है । इस प्रशस्ति से तत्कालीन शासन तथा कर व्यवस्था पर प्रकाश पड़ता है। इसमें मेवाड़ के गुहिलवंशी राजा अल्लट और उसके पुत्र नरवाहन एवं मुख्य कर्मचारियों के नाम उनके पद सहित दिये गये हैं। इस प्रशस्ति के लिपिकार कायस्थ पाल और वेलक थे ।

 ओसियाँ का लेख (956 ई.).

यह लेख संस्कृत पद्य में है जिसे सूत्रधार पदाजा द्वारा उत्कीर्ण किया गया था । लेख में प्रतिहार शासक वत्सराज को रिपुओं का दमन करने वाला कहा है तथा उसके समय की समृद्धि पर प्रकाश डाला गया है। इससे उस समय के वर्ण विभाजन की भी जानकारी मिलती है।

चित्तौड़ का लेख (971 ई.)

इस लेख से परमार शासकों की उपलब्धियों, उनका चित्तौड़ पर अधिकार, चित्तौड़ की समृद्धि आदि पर प्रकाश पड़ता है इस प्रशस्ति में देवालयों में स्त्रियों के प्रवेश को निषिद्ध बतलाया है जो उस समय की सामाजिक व्यवस्था और धार्मिक स्तर पर भी स्त्रियों के साथ भेदभाव का परिचायक है।

एकलिंगजी की नाथ प्रशस्ति (971 ई.).

यह शिलालेख उदयपुर के एकलिंग मन्दिर के पास लकुलीश मन्दिर में लगा हुआ है । यह प्रशस्ति मेवाड़ के राजनीतिक और सांस्कृतिक इतिहास को जानने के लिए उपयोगी है । इस प्रशस्ति के रचयिता आम्र कवि थे। गुहिल वंशी शासक नरवाहन के समय उत्कीर्ण इस लेख की भाषा संस्कृत और लिपि देवनागरी है।

हर्षनाथ मन्दिर की प्रशस्ति (973 ई.)

यह प्रशस्ति सीकर के हर्षनाथ मन्दिर में लगी हुई है जो संस्कृत पद्य भाषा में है। इससे चौहान शासकों के वंशक्रम तथा उनकी उपलब्धियों पर प्रकाश पड़ता है। इसमें वागड़ के लिए ‘वार्गट’ शब्द का प्रयोग किया गया है ।

आहड़ का देवकुलिका का लेख (977 ई.)

संस्कृत भाषा में लिपिबद्ध यह लेख मेवाड़ के गुहिल शासक शक्तिकुमार के समय का है जो आहड़ के एक जैन मन्दिर की देवकुलिका के छबने में लगा हुआ है। इस लेख से मेवाड़ के तीन शासकों – अल्लट, नरवाहन और शक्तिकुमार के समय के अक्षपटलाधीशों के बारे में जानकारी प्राप्त होती है । इससे अल्लट और प्रतिहार शासक देवपाल के मध्य युद्ध पर भी प्रकाश डाला गया है, इस युद्ध में देवपाल मारा गया था। मेवाड़ के प्राचीन शासकों और शासन सम्बन्धी जानकारी के लिए यह लेख महत्त्वपूर्ण है।

आहड़ का शक्तिकुमार का लेख (977 ई.)

शक्ति कुमार के इस लेख को कर्नल टॉड अपने साथ इंग्लैण्ड ले गये, उन्होंने अपनी ‘एनाल्स’ में इस लेख की विषयवस्तु का वर्णन किया है। संस्कृत भाषा के इस लेख में मेवाड़ के गुहिल शासक शक्तिकुमार की राजनीतिक प्रभुता और उसके समय में आहड़ की आर्थिक सम्पन्नता की जानकारी मिलती है । इस लेख में गुहिल शासक अल्लट की रानी हरियादेवी को हूण राजा की पुत्री बताया गया है जिसने हर्षपुर नामक ग्राम बसाया था। इस लेख में गुहदत्त से शक्तिकुमार तक पूरी वंशावली दी गई है जो मेवाड़ के प्राचीन इतिहास के लिए महत्त्वपूर्ण है। ।

जालौर का लेख (1118 ई.)

यह लेख जालौर में तोपखाना की इमारत की उत्तरी दीवार पर लगा हुआ था, वर्तमान में जोधपुर के संग्रहालय में रखा हुआ है । यह जालौर के परमारों से सम्बन्धित है तथा बताया गया है कि परमारों की उत्पत्ति वशिष्ठ के यज्ञ से हुई थी । इस लेख में जालौर के परमार वंश के संस्थापक वाक्पतिराज का उल्लेख है।

चित्तौड़ का कुमारपाल का शिलालेख (1150 ई.)

चालुक्य (सोलंकी) शासक कुमारपाल का यह लेख चित्तौड़ के समिद्धेश्वर मन्दिर में लगा हुआ है। इस लेख में चालुक्यों का यशोगान करते हुए मूलराज और सिद्धराज का वर्णन किया गया है। इस लेख से सिद्ध होता है कि चित्तौड़ पर कुछ समय चालुक्यों का शासन रहा था। इस प्रशस्ति का रचयिता दिगंबर जैन विद्वान रामकीर्ति था ।

किराडू का लेख (1152 ई.)

यह लेख किराडू (बाड़मेर) के निकट एक शिवमन्दिर में उत्कीर्ण है । यह लेख एक प्रकार से राजाज्ञा है जिसमें चौहान सामंत आल्हणदेव ने मास के दोनों पक्षों की अष्टमी, एकादशी और चतुर्दशी पर पशुवध निषेध घोषित कर दिया था। दंडस्वरूप सर्वसाधारण से 5 द्रम और राज्य परिवार के व्यक्ति से 1 द्रम लेने की व्यवस्था से स्पष्ट है कि विशेष अधिकार को उस युग में मान्यता दी जाती थी । इस लेख में विभिन्न प्रकार के पदाधिकारियों का भी उल्लेख मिलता है ।

बिजौलिया शिलालेख (1170 ई.)

 यह शिलालेख बिजौलिया के पार्श्वनाथ मन्दिर के समीप एक चट्टान पर उत्कीर्ण है । इस प्रशस्ति का रचयिता गुणभद्र था तथा गोविन्द ने इसको उत्कीर्ण किया। इसमें साँभर और अजमेर के चौहान वंश की सूची तथा उनकी उपलब्धियों की जानकारी मिलती है। लेख में चौहान शासकों को वत्सगोत्रीय ब्राह्मण कहा गया है। बिजौलिया क्षेत्र जिसे ऊपरमाल भी कहा जाता है, को इस लेख में ‘उत्तमाद्रि’ कहा गया है। अनेक क्षेत्रों के प्राचीन नाम भी इस लेख से प्राप्त होते हैं ।
इस शिलालेख की भाषा संस्कृत है। इसमें 13 पद हैं। मूलतः यह लेख दिगम्बर लेख है, जिसको दिगम्बर जैन श्रावक लोलाक ने पार्श्वनाथ मंदिर कुण्ड निर्माण स्मृति लिखवाया, इसमें देवालय निर्माण के अतिरिक्त चौहान वंश की जानकारी है। इस शिलालेख में जालौर का नाम जाबालिपुर, सांभर का नाम शांकम्बरी व भीनमाल का नाम श्रीमाल मिलता है। टॉड के अनुसार बिजौलिया का वास्तविक नाम ‘बिजयावल्ली’ था।

नादेसमाँ गाँव का लेख (1222 ई.)

यह लेख उदयपुर जिले के नादेसमाँ गाँव के चारभुजा मन्दिर के निकट टूटे हुए सूर्यमन्दिर के एक स्तम्भ पर उत्कीर्ण है इस लेख से पता चलता है कि जैत्रसिंह की राजधानी नागा थी । इससे स्पष्ट है कि 1222 ई. तक नागदा नगर नष्ट नहीं हुआ था।

लूणवसाही की प्रशस्ति ( 1230 ई.)

यह प्रशस्ति देलवाड़ा के लूणवसाही मन्दिर की है जो संस्कृत भाषा में है और पद्य में लिखी गई है । इस लेख से आबू के परमार शासकों और तेजपाल व वास्तुपाल के वंश के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। इससे पता चलता है कि आबू के परमार शासक सोमसिंह के समय में मंत्री वास्तुपाल के छोटे भाई तेजपाल ने लूणवसाही नामक नेमिनाथ का मन्दिर अपनी स्त्री अनुपमा देवी के श्रेय के लिए बनवाया था।

बीठू गाँव का लेख (1273 ई.)

पाली के पास बीठू गाँव में यह लेख प्राप्त हुआ है । इस लेख से राव सीहा के व्यक्तित्व और उसकी मृत्यु की तिथि निश्चित करने में मदद मिलती है । इस लेख के अनुसार मारवाड़ के राठौड़ों का आदिपुरुष सीहा सेतकुँवर का पुत्र था। उसकी पत्नी पार्वती ने उसकी मृत्यु पर देवल का निर्माण करवाया था। बीठू गाँव के उक्त देवल पर ही यह लेख उत्कीर्ण है । इस लेख के ऊपरी भाग में अश्वारोही सीहा को शत्रु पर भाला मारते हुए दर्शाया है ।

चीरवा का शिलालेख (1273 ई.)

यह लेख उदयपुर के समीप चीरवा गाँव के एक मन्दिर पर लगा हुआ है। आचार्य भुवनसिंह सूरि के शिष्य रत्नप्रभासूरि ने इस लेख की रचना की और केलिसिंह ने इसे उत्कीर्ण किया। इसमें गुहिलवंशीय शासकों पद्मसिंह, जैत्रसिंह, तेजसिंह ने और समरसिंह की उपलब्धियों का वर्णन है ।
इसमें 51 श्लोक लिखे गये हैं। इसकी तिथि कार्तिक शुक्ल वि.स. 1330 है। यह लेख बागेश्वर और बागेश्वरी की आराधना से प्रारम्भ होता है । इस लेख से अनुमान लगता है कि उस समय सती प्रथा का प्रचलन था ।

रसिया की छतरी का लेख (1274 ई.)

चित्तौड़ में रसिया की छतरी पर यह लेख लगा हुआ था। इसका रचयिता वेदशर्मा था। इसमें बापा से नरवर्मा तक के गुहिलवंशीय शासकों की उपलब्धियों पर प्रकाश पड़ता है।

चित्तौड़ के पार्श्वनाथ मन्दिर का लेख (1278 ई.)

इस लेख से पता चलता है कि राजा तेजसिंह की पत्नी जयतल्लदेवी ने श्यामपार्श्वनाथ मन्दिर बनवाया था। इस लेख से मेवाड़ के शासकों की धार्मिक सहिष्णुता की जानकारी मिलती है ।

अचलेश्वर का लेख (1285 ई.)

यह लेख आबू के अचलेश्वर मन्दिर के पास मठ के एक चौपाल की दीवार में लगा हुआ है। शुभचन्द्र इस लेख का लेखक व कर्मसिंह उत्कीर्णक था । इस लेख में नागदा में हारित ऋषि की तपस्या एवं उनकी कृपा से बापा को राजत्त्व की प्राप्ति तथा बापा से लेकर समरसिंह तक की वंशावली मिलती है । CR S

गंभीरी नदी के पुल का शिलालेख

यह लेख मेवाड़ के शासक समरसिंह के समय का है जिसे सम्भवत: अलाउद्दीन खिलजी ने इस पुल के निर्माण के दौरान इसमें लगवा दिया। इस लेख से समरसिंह द्वारा भूमि दान देने की जानकारी मिलती है ।

शृंगी ऋषि का लेख ( 1428 ई.)

राणा मोकल के समय का यह लेख एकलिंगजी (उदयपुर) के समीप शृंगी ऋषि नामक स्थान से प्राप्त हुआ है। इसके रचयिता कविराज वाणीविलास योगेश्वर और उत्कीर्णक पन्ना थे । इस लेख से राणा हम्मीर की उपलब्धियों और भीलों की सामाजिक स्थिति का पता चलता है । इस लेख में राणा लाखा के बारे में कहा गया है कि उसने काशी, प्रयाग और गया (त्रिस्थली) में हिन्दुओं से लिए जाने वाले कर को हटवाया तथा गया में मन्दिर बनवायें ।
इसकी भाषा स्पष्ट है कि इसमें 30 श्लोक हैं ।

देलवाड़ा का लेख (1434 ई.)

देलवाड़ा से प्राप्त इस लेख से टंक नाम की मुद्रा के प्रचलन की जानकारी मिलती है। यह लेख संस्कृत और मेवाड़ी भाषा में है।

रणकपुर प्रशस्ति (1439 ई.)

 कुम्भाकालीन यह प्रशस्ति रणकपुर के चौमुखा जैन मन्दिर से मिली है। इसकी भाषा संस्कृत तथा लिपि नागरी है। यह लेख मेवाड़ के गुहिल वंश के वंशक्रम की जानकारी का महत्वपूर्ण स्रोत है। इसमें बापा तथा कालभोज को अलग-अलग व्यक्ति माना है तथा बापा को गुहिल का पिता बताया है।
रणकपुर मंदिर निर्माता जैता नाम मिला है। इसमें बघा रावल से कुम्भा तक की जानकारी है। इसमें गुहिल को बापा का पुत्र बताया गया है।

कुम्भलगढ़ का शिलालेख (1460 ई.)

कुम्भा की विजयों का विस्तृत वर्णन इस लेख में दिया गया है। डॉ. ओझा के अनुसार इस लेख का रचयिता महेश था।
यह शिलालेख 5 शिलाओं पर लिखा है। इसमें 270 श्लोक है। इस शिलालेख में महाराणा कुम्भा द्वारा स्पादलक्ष, नाराणा, वसन्तपुरा और आबू विजय वर्णन है। इसमें एकलिंग जी मंदिर तथा कुटिला नदी का वर्णन है । ओझा के अनुसार यह प्रशस्ति महेश ने लिखी है ।

कीर्तिस्तंभ प्रशस्ति ( 1460 ई.)

चित्तौड़ के किले में कीर्तिस्तम्भ (विजयस्तम्भ) की नौवीं अर्थात् अन्तिम मंजिल पर यह प्रशस्ति उत्कीर्ण है। इस प्रशस्ति के रचयिता कवि अत्रि और महेश थे । इस लेख में कुम्भा की उपलब्धियों और उसके व्यक्तिगत गुणों, उपाधियों, संगीत ग्रन्थों आदि की विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है ।
इसमें 187 श्लोक है। इसमें कुम्भा को ‘दानगुरु, राजगुरु, शैल गुरु’ उपाधि दी गई ।

एकलिंगजी के मंदिर की रायमल की प्रशस्ति (1488 ई.)

महाराणा रायमल ने एकलिंग जी के मंदिर के जीर्णोद्धार के समय इस प्रशस्ति को उत्कीर्ण करवाया था। यह प्रशस्ति एकलिंगजी के मंदिर के दक्षिणी द्वार के ताक में लगी हुई है । लेख नागरी लिपि में है और भाषा संस्कृत है। इसमें कुल 101 श्लोक हैं। इसे सूत्रधार अर्जुन ने उत्कीर्ण किया था । अर्जुन की देखरेख में ही एकलिंगजी के मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया गया था ।
इस प्रशस्ति- लेख में हम्मीर से रायमल तक मेवाड़ के महाराणाओं की प्रमुख उपलब्धियों, दान, निर्माण, विद्योन्नति व जनता के नैतिक जीवन सहित तात्कालीन मेदपाट (मेवाड़) और चित्तौड़ (चित्रकूट) की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन दिया गया है, जो मेवाड़ के राजनीतिक व सांस्कृतिक इतिहास की जानकारी हेतु महत्त्वपूर्ण हैं।

बीकानेर की रायसिंह प्रशस्ति (1594 ई.)

बीकानेर के दुर्ग के सूरजपोल के पार्श्व में लगी यह प्रशस्ति महाराजा रायसिंह के समय की है। इसकी भाषा संस्कृत है। इसमें बीकानेर के दुर्ग के निर्माण की जानकारी मिलती है । इस प्रशस्ति में राव बीका से रायसिंह तक के बीकानेर के शासकों की उपलब्धियों का ज्ञान होता है। इस प्रशस्ति का रचयिता जैता नामक एक जैन मुनि था ।
बीका से रामसिंह तक वर्णन है। इसमें रामसिंह की काबुल विजय का वर्णन है।

आमेर का लेख (1612 ई.)

यह लेख राजा मानसिंह के समय का है जिसमें कछवाहा वंश को ‘रघुवंशतिलक’ कहा गया है तथा इसमें पृथ्वीराज, उसके पुत्र भारमल, उसके पुत्र भगवंतदास और उसके पुत्र महाराजाधिराज मानसिंह के नाम क्रम से प्राप्त होते हैं। इसमें जहाँगीर के राज्य की दुहाई दी गई है, जिससे आमेर और मुगलों के संबंधों के बारे में जानकारी प्राप्त होती है । इस लेख में मानसिंह द्वारा जमवारामगढ़ के दुर्ग के निर्माण का भी उल्लेख किया गया है ।

मांडल की जगन्नाथ कछवाहा की छतरी का लेख (1613 ई.)

मांडल (भीलवाड़ा) में जगन्नाथ कछवाहा की बत्तीस खम्भों की छतरी स्थित है जिसे सिंहेश्वरी महादेव का मन्दिर भी कहते हैं। इसमें उल्लेख है कि मेवाड़ अभियान से लौटते समय जगन्नाथ कछवाहा का देहान्त मांडल में हुआ था, जिसके स्मारक के रूप में यह छतरी बनाई गई ।

जगन्नाथ राय प्रशस्ति ( 1652 ई.)

यह प्रशस्ति उदयपुर के जगन्नाथ राय मन्दिर के सभामण्डप पर लगी हुई है। इस मन्दिर का निर्माण मेवाड़ महाराणा जगतसिंह प्रथम ने करवाया था। इसमें बापा से लेकर सांगा तक मेवाड़ के शासकों की उपलब्धियों का वर्णन है। इसमें हल्दीघाटी के युद्ध का भी वर्णन मिलता है।

त्रिमुखी बावड़ी का लेख (1675 ई.)

यह प्रशस्ति देबारी के पास त्रिमुखी बावड़ी में लगी हुई है । . इसमें राजसिंह के समय सर्वऋतु विलास नाम के बाग बनाये जाने, मालपुरा की विजय और लूट, चारुमति का विवाह, डूंगरपुर की विजय आदि का उल्लेख मिलता है।

राजप्रशस्ति (1676 ई.)

मेवाड़ के महाराणा राजसिंह (1652-80 ई.) ने अकाल के समय प्रजा को राहत पहुँचाने के लिए राजसमन्द नामक विशाल झील का निर्माण करवाया था । इस झील की पाल पर 25 पाषाण पट्टिकाओं पर यह प्रशस्ति उत्कीर्ण है। संस्कृत पद्य भाषा में लिखी इस प्रशस्ति का रचयिता रणछोड़ भट्ट था। राजप्रशस्ति को भारत का सबसे बड़ा शिलालेख माना जाता है।
इस प्रशस्ति में मेवाड़ का विस्तृत व क्रमबद्ध इतिहास लिखा गया है। यह प्रशस्ति 17वीं शताब्दी के मेवाड़ की सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, धार्मिक, तकनीकी और आर्थिक स्थिति के बारे में पर्याप्त जानकारी प्रदान करती है ।

जानासागर प्रशस्ति

उदयपुर में बड़ी गाँव के पास है । यह महाराणा राजसिंह के समय की है। जनासागर का निर्माण राजसिंह ने अपनी माता जनादे की याद में करवाया था। इस शिलालेख में मेड़ता परिवार को वैष्णव बताया गया। इस प्रशस्ति में 41 श्लोक हैं। प्रशस्ति लक्ष्मीनाथ ने लिखी थी ।

वैराठ का लेख

यहाँ छतरी का निर्माण सावंलदास ने करवाया यह गौड ब्राह्मण था । औरंगजेब ने इसे सिंह की उपाधि व पीपाड़ की जांगीर दी। यहाँ लेख ढूंढाड़ी भाषा में है। यहाँ छतरी का निर्माण छीतरमल की पत्नी जमना के सती होने पर करवाया था। सांवलदास छीतरमल का भतीजा था ।

घोसुन्डी शिलालेख

चित्तौड़ में स्थित है। यह शिलालेख महाजनी लिपी व हर्षकालीन लिपी में लिखा गया है ।

राजस्थान के सिक्के>>>>

सिक्कों के अध्ययन को न्यूमिसमेटिक्स (मुद्रा शास्त्र) कहा जाता है।
भारत के प्राचीनतम सिक्कों को आहत या पंचमार्क सिक्के कहा जाता है। ये चाँदी के बने हुए थे। आहत सिक्कों को साहित्य में ‘काषार्पण’ कहा गया है। आहत सिक्कों पर कोई लेख व तिथि अंकित नहीं होती थी ।
भारत में पहली बार लेख-युक्त ( राजा का नाम) सिक्के हिन्द – यवन या यूनानी (इण्डो-ग्रीक) शासकों ने जारी किए थे।
भारत में सर्वप्रथम सोने के सिक्के भी यूनानी शासकों ने चलाए थे। बड़े पैमाने पर सोने के सिक्के सर्वप्रथम कुषाण शासकों ने जारी किए थे।
रैढ़ (टोंक) से 3075 चाँदी की आहत मुद्राएँ मिली हैं। यह में एक ही स्थान से प्राप्त आहत सिक्कों का सबसे बड़ा भण्डार है। इन सिक्कों को धरण या पण कहा गया है।
रैढ़ के अतिरिक्त विराटनगर (जयपुर), आहड़, नगर (टोंक), नगरी (चित्तौड़) और साँभर आदि स्थानों से भी आहत मुद्राएँ मिली हैं ।
मालव गण से सम्बन्धित 6000 ताँबे के सिक्के नगर (टोंक) से प्राप्त हुए हैं जिनकी खोज कार्लाइल ने की थी । ये सिक्के संसार में सबसे छोटे और सबसे कम वजन वाले सिक्के माने जाते हैं ।
रंगमहल (हनुमानगढ़) से 105 ताँबे के सिक्के मिले हैं, जिनमें से एक सिक्का कुषाण शासक कनिष्क का है।
बैराठ (जयपुर) से 36 मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं जिनमें 8 आहत और 28 इण्डो-ग्रीक शासकों की हैं।
आहड़ से ताँबे के छ: सिक्के मिले हैं, जिनमें से एक मुद्रा पर त्रिशूल खुदा हुआ है तथा एक अन्य मुद्रा यूनानी शैली की है जिस पर यूनानी देवता अपोलो का अंकन है।
भरतपुर जिले में बयाना के समीप नगलाछैल नामक स्थान से गुप्तकालीन सोने के सिक्कों का ढेर मिला है जिसमें लगभग 1800 सिक्के हैं। इस ढेर में सर्वाधिक सिक्के चन्द्रगुप्त द्वितीय ‘विक्रमादित्य’ के हैं। यह गुप्तकालीन सिक्कों का सबसे बड़ा ढेर है।
टोंक जिले में रैढ़ से गुप्तकालीन 6 स्वर्ण मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं जिनमें से 4 चन्द्रगुप्त द्वितीय ‘विक्रमादित्य’ की हैं
नलियासर (साँभर) से गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम की चाँदी की मुद्राएँ मिली हैं, जिन पर मयूर की आकृति उत्कीर्ण है।
हूण शासकों द्वारा मेवाड़ और मारवाड़ में ‘गधिया’ सिक्कों का प्रचलन किया गया था।

रियासतकालीन सिक्के>>>>

मेवाड़ राज्य के सिक्के

गुप्तोत्तरकाल में मेवाड़ में ‘गधिया मुद्रा’ का प्रचलन था । मेवाड़ के प्रथम संस्थापक गुहिल ने ताँबे के सिक्के जारी किए थे। ‘गुहिलपति’ लेख वाले सिक्के गुहिल द्वारा चलाना माना जाता है।
बापा का एक स्वर्ण सिक्का प्राप्त हुआ है जिसका वजन 115 ग्रेन है, इस प्रकार बापा मेवाड़ के प्रथम गुहिल शासक थे जिन्होंने स्वर्ण सिक्के जारी किये । राणा कुम्भा ने चाँदी और ताँबे के सिक्के जारी किए थे। मुगल-मेवाड़ संधि (1615 ई.) के साथ मेवाड़ में मुगल सिक्कों का प्रचलन प्रारम्भ हो गया।
मुगल बादशाह मुहम्मदशाह (1719-1748 ई.) ने पुनः मेवाड़ में सिक्के जारी करने की अनुमति दी, परिणामतः चित्तौड़, भीलवाड़ा और उदयपुर में सिक्के ढलने लगे, जिन्हें क्रमशः चित्तौड़ी, भिलाड़ी और उदयपुरी रुपया कहते थे ।
महाराणा स्वरूपसिंह (1842-1861 ई.) ने स्वरूपशाही रुपया चलाया। स्वर्ण सिक्का चाँदोड़ी  (वजन 116 ग्रेन) भी स्वरूपसिंह ने चलाया था ।
मेवाड़ में ताँबे के सिक्कों को ढींगला, भिलाड़ी, त्रिशूलिया, भीडरिया, नाथद्वारिया आदि नामों से जाना जाता था।

प्रतापगढ़ राज्य के सिक्के

सर्वप्रथम 1784 ई. में सालिमसिंह ने ‘सालिमशाही’ नामक चाँदी की मुद्रा जारी की। 1818 ई. में अंग्रेजों से सन्धि के बाद परिवर्तित होने पर इसे ‘नया सालिमशाही’ कहा जाने लगा। 1904 में यहाँ कलदार का प्रचलन प्रारम्भ हो गया ।

बाँसवाड़ा राज्य के सिक्के

बाँसवाड़ा रियासत में भी ‘सालिमशाही’ सिक्कों का प्रचलन था। 1870 ई. में महारावल लक्ष्मणसिंह ने सोने, चाँदी और ताँबे के सिक्के जारी किए। इन सिक्कों को ‘लक्ष्मणशाही ‘ कहा जाता था। 1902 ई. में यहाँ भी कलदार का प्रचलन प्रारम्भ हो गया ।

डूंगरपुर राज्य के सिक्के

डूंगरपुर राज्य द्वारा स्वतंत्र रूप से सिक्के जारी नहीं किए गए। यहाँ मेवाड़ के ‘चित्तौड़ी’ और प्रतापगढ़ के ‘सालिमशाही’ रुपयों का प्रचलन था

जोधपुर राज्य के सिक्के

यहाँ भी प्रारम्भ में ‘गधिया मुद्रा’ प्रचलित थी। प्रतिहार शासक भोज (जिसे मिहिरभोज और भोजप्रथम भी कहा जाता है) ने मारवाड़ में ‘आदिवराह’ सिक्के चलाये थे। आदिवराह’ उसकी उपाधि थी।
महाराजा विजयसिंह ने सोने, चाँदी और ताँबे के सिक्के जारी किए थे, जिन्हें ‘विजयशाही’ कहा जाता है। 1900 ई. मे मारवाड़ में कलदार का प्रचलन हो गया ।

बीकानेर राज्य के सिक्के

बीकानेर में सम्भवतः 1759 ई. में टकसाल की स्थापना हुई और मुगल सम्राट शाहआलम के नाम के सिक्के ढलने लगे । बीकानेर के शासकों ने सिक्कों पर अपने विशेष चिह्न भी अंकित करवाये, जैसे- गजसिंह का चिह्न ‘ध्वज’, सूरतसिंह का चिह्न, ‘त्रिशूल’, रतनसिंह का ‘नक्षत्र’, सरदारसिंह का ‘छत्र’ तथा डूंगरसिंह का चिह्न ‘चँवर’ था । बीकानेर रियासत में प्रचलित सिक्कों में ‘आलमशाही’ और ‘गजशाही’ सिक्के प्रमुख थे।

जैसलमेर राज्य के सिक्के

मुगलकाल में जैसलमेर में चाँदी का ‘मुहम्मदशाही’ सिक्का चलता था। 1756 ई. में महारावल अखैसिंह ने चाँदी का ‘अखैशाही’ सिक्का जारी किया । जैसलमेर का ताँबे का सिक्का ‘डोडिया’ कहलाता था जिसका वजन 18-20 ग्रेन था ।

किशनगढ़ राज्य के सिक्के

किशनगढ़ राज्य में भी शाहआलम के नाम का सिक्का जारी किया गया था। यहाँ 166 ग्रेन का ‘चाँदोड़ी’ नाम का रुपया, मेवाड़ की राजकुमारी चाँदकुँवरी के नाम पर चलाया गया था।
धौलपुर राज्य के सिक्के 
धौलपुर में 1804 ई. में टकसाल की स्थापना हुई। यहाँ के सिक्के ‘तमंचाशाही’ कहलाते थे क्योंकि उन पर तमंचे का चिह्न लगाया जाता था।

जयपुर राज्य के सिक्के

जयपुर राज्य की मुद्रा को ‘झाड़शाही’ कहते थे, क्योंकि उस पर 6 टहनियों के झाड़ का चिह्न बना रहता था। महाराजा माधोसिंह और रामसिंह ने स्वर्ण सिक्के चलाये। माधोसिंह के रुपये को ‘हाली’ कहा जाता था। जयपुर में ताँबे के सिक्के का प्रचलन 1760 ई. से माना जाता है इसे ‘झाड़शाही पैसा’ कहते थे जिसका वजन 262 ग्रेन था।

अलवर राज्य के सिक्के

अलवर राज्य टकसाल राजगढ़ में थी। यहाँ 1772 ई. से 1876 ई. तक बनने वाले सिक्के ‘रावशाही रुपया’ कहलाता था जिसका वजन 173 ग्रेन था। अलवर रियासत के ताँबे के सिक्के ‘रावशाही टक्का’ कहलाते थे ।

भरतपुर राज्य के सिक्के

25 1763 ई. में सूरजमल ने बादशाह शाहआलम के नाम के चाँदी के सिक्के जारी किए थे। ताँबे के सिक्कों का प्रचलन 1763 से 1891 ई. तक रहा । भरतपुर राज्य में दो टकसालें थीडीग और भरतपुर ।

शाहपुरा राज्य के सिक्के

यहाँ मेवाड़ के ‘चित्तौड़ी’ और ‘भिलाड़ी’ सिक्कों का प्रचलन था। 1760 ई. में शाहपुरा के शासक ने सिक्का चलाया जिसे ‘ग्यारसंदिया’ कहते थे ।

बून्दी राज्य के सिक्के

बून्दी राज्य में 1759 से 1859 ई. तक ‘पुराना रुपया’ प्रचलित था। अकबर द्वितीय (1806 – 1837 ई.) के ग्यारहवें वर्ष ‘ग्यारह – सना’ (186 ग्रेन) सिक्का जारी
किया गया था ।
1859 से 1866 ई. के मध्य ‘रामशाही रुपया’ प्रचलित रहा। यहाँ ‘हाली’ और ‘कटारशाही’ सिक्के भी जारी किए गए थे ।
1901 ई. में कलदार के साथ ‘चेहरेशाही’ नामक चाँदी का रुपया चलाया गया जो 1925 ई. में बंद कर दिया गया । बून्दी के ताँबे के सिक्के को ‘पुराना बून्दी का पैसा’ कहा जाता था। बून्दी में स्वर्ण मुद्रा का अभाव दिखाई देता है ।

कोटा राज्य के सिक्के

मध्यकाल में यहाँ माण्डू और दिल्ली के सुल्तानों के सिक्के चलते थे। यहाँ ‘हाली’, ‘मदनशाही’ और ‘गुमानशाही’ सिक्कों का भी प्रचलन रहा। यहाँ तांबे के सिक्के भी बनते थे जो चौकोर होते थे । कोटा राज्य के सिक्के कोटा, गागरोन और झालरापाटन में ढलते थे। 1901 ई. में स्थानीय सिक्कों के स्थान पर कलदार का चलन प्रारम्भ हो गया ।

झालावाड़ राज्य के सिक्के

झालावाड़ में कोटा के सिक्के प्रचलित थे । यहाँ 1837 से 1857 ई. तक ‘पुराने मदनशाही’ सिक्के प्रचलन में थे। ‘नये मदनशाही’ सिक्कों का प्रचलन 1857 से 1891 ई. तक रहा। इस पर ‘पंच पंखुड़ी’ और ‘फूली’ का चिह्न अंकित रहता था। ताँबे के सिक्कों में ‘मदनशाही पैसा’ एवं ‘मदनशाही टंका’ चलते थे |

विभिन्न रियासतों में प्रचलित सिक्के

विजयशाही, भीमशाही   जोधपुर
गजशाही   बीकानेर
उदयशाही   डूंगरपुर
स्वरूपशाही, चाँदोड़ी   मेवाड़
रावशाही   अलवर
अखैशाही   जैसलमेर
गुमानशाही   कोटा
झाड़शाही   जयपुर
मदनशाही   झालावाड़
तमंचाशाही   धौलपुर
रामशाही   बूंदी
पदमशाही   मेवाड़
माधोशाही   शाहपुरा रियासत
ढब्बूशाही   सिरोही
कटार झाड़शाही, माणक शाही   करौली

ऐतिहासिक साहित्य

 पृथ्वीराज विजय

  • पृथ्वीराज चौहान तृतीय के आश्रित कवि पंडित जयानक ने 12 वीं शताब्दी के अंतिम चरण में इस ग्रंथ की रचना की।
  • इस ग्रंथ में अजमेर साम्राज्य विस्तार के साथ-साथ पृथ्वीराज चौहान तृतीय की सन् 1190 ई. तक कि विजयों का उल्लेख मिलता है।
  • तराइन के युद्धों का वर्णन इसमें नहीं मिलता है।

 हमीर महाकाव्य

  • इसके रचयिता ‘नयनचंद्र सूरि’ थे।
  • इस महाकाव्य के अनुसार चौहान राजपूतों की उत्पत्ति सूर्य से हुई है अतः इन्हें ‘सूर्यवंशी’ कहा जाता है।
  • यह एक उच्च कोटि का ‘राष्ट्रकाव्य’ है।
  • इसमें रणथम्भौर के चौहान वंश के इतिहास, अलाउद्दीन खिलजी द्वारा रणथम्भौर पर किए गए आक्रमण एवं हम्मीर देव के शौर्य, हठ, अतिथि सत्कार, धर्म परायणता का विशेष वर्णन मिलता है।

 एकलिंग महात्म्य

  • महाराणा कुंभा ने इस ग्रंथ को लिखने की शुरुआत की, कुंभा ने इसके प्रथम भाग को पूर्ण रूप से लिखा।
  • इसका प्रथम भाग ‘राजवर्णन’ कहलाता है।
  • इस ग्रंथ का अंत महाराणा कुंभा के कवि कान्ह व्यास ने किया।
  • इस ग्रंथ में गहलोत वंश की वंशावली, वर्णाश्रम और वर्ण व्यवस्था की जानकारी मिलती है।
  • मध्यकाल में मेवाड़ को मेदपाठ व हाडौ़ती को हाडा़वती कहते थे।

 अमरकाव्य वंशावली

  • इस ग्रंथ के रचनाकार ‘राज प्रशस्ति’ के लेखक ‘रणछोड़’ भट्ट (महाराणा राजसिंह, मेवाड़ के आश्रित कवि) थे।
  • इसमें बप्पा से लेकर राणा राजसिंह तक के मेवाड़ के इतिहास, जोहर, दीपावली आदि त्योहारों का विस्तृत वर्णन मिलता है।
  • इस ग्रंथ से हमें यह पता चलता है कि हल्दीघाटी के युद्ध से महाराणा प्रताप घायल अवस्था में बचकर जा रहे थे तो उनके विरोधी भाई शक्ति सिंह ने मुगल सेना को रोका था।

 प्रबंध चिंतामणि

  • रचनाकार – भोज परमार के राज कवि मेरुतंग
  • 13 वीं सदी का राजनीतिक एवं सांस्कृतिक वर्णन मिलता है।

 अचलदास खींची री वचनिका

  • रचना – 14 वीं शताब्दी में चारण जाति के शिवदास गाड़ण ने गागरोन दुर्ग में की।
  • यह ग्रंथ वीर रसात्मक चम्पू ( गद्य-पद्य ) काव्य है।
  • यह राजस्थान की सबसे प्राचीन वचनीका है।
  • इसमें गागरोन के राजा अचलदास खींची व मालवा के सुल्तान होशंगशाह गौरी के मध्य हुए युद्ध का वर्णन मिलता है।

 कान्हड़दे प्रबन्ध

  • रचना – जालौर के शासक अखैराज के दरबारी कवि ‘पद्मनाभ’ ने विक्रम संवत् 1200 ई. में की।
  • इस ग्रंथ में जालौर के शासक कान्हड़दे एवं अलाउद्दीन खिलजी के मध्य हुए युद्ध में अलाउद्दीन की जालौर विजेता उल्लेख है।

 राव जैतसी रो छंद

  • रचना – बिठू सूजा ने 1269 ईस्वी में डिंगल भाषा में की।
  • इस ग्रंथ में राव चूड़ा से लेकर राव लूणकरण सिंह की ऐतिहासिक घटनाओं का वर्णन है।

 वेलि क्रिसन रूक्मणी री वचनिका

  • इसकी रचना सम्राट अकबर के नवरत्नों में से एक कवि पृथ्वीराज राठौड़ ने गागरोन दुर्ग में की।
  • पृथ्वीराज राठौड़ बीकानेर के शासक कल्याणमल का पुत्र एवं राय सिंह का भाई था।
  • इस ग्रंथ में श्री कृष्ण एवं रुक्मणी के विवाह की कथा का वर्णन मिलता है।
  • दूरसा हाड़ा ने इस ग्रंथ को पाँचवा वेद या 19 वाँ पुराण की उपमा दी।
  • पृथ्वीराज राठौड़ पीथल नाम से साहित्य की रचना करते थे।
  • टैस्सीटोरी ने इनको ‘डिंगल का हैरोस’ कहा है।

 पृथ्वीराज रासो

  • पृथ्वीराज चौहान तृतीय के मित्र एवं दरबारी कवि चन्दबरदाई ने पिंगल (ब्रज हिंदी) भाषा में की।
  • इस ग्रंथ में 1 लाख छंद एवं 69 अध्याय है।
  • इससे यह पता चलता है कि पृथ्वीराज चौहान तृतीय एवं चन्दबरदाई का जन्म एवं मृत्यु एक साथ हुई।
  • पृथ्वीराज रासो में गुर्जर प्रतिहार, परमार, चालुक्य/सौलंकी एवं चौहानों की उत्पत्ति गुरु वशिष्ठ के आबू पर्वत के अग्निकुंड से बताई गई है।
  • इसमें संयोगिता हरण एवं तराईन युद्ध का विशुद्ध वर्णन किया गया है
  • इस ग्रंथ में पृथ्वीराज चौहान द्वारा गौरी की मृत्यु का वर्णन मिलता है।

‘‘आठ बांस बत्तीस गज अंगुल अष्ट प्रमाण, ता ऊपर सुल्तान है मत चुके चौहाण’’

  • पृथ्वीराज रासो की समाप्ति चंदबरदाई के दत्तक पुत्र ‘जल्हण’ ने की।

 मुहणौत नैणसी री ख्यात

  • रचनाकार – मोहणौत नैणसी > जन्म 1610 ई. में ओसवाल परिवार में।
  • मुंशीदेवी प्रसाद ने इनको राजपूताने का अबुल फजल कहा है।
  • मुहणौत नैणसी री ख्यात सबसे प्राचीन एवं विश्वसनीय ख्यात मानी जाती है।
  • यह मारवाड़ी एवं डिंगल भाषा में लिखी गई है।
  • इसमें राजपूताने के लगभग सभी राज्यों विशेषतः जोधपुर, गुजरात, मालवा व बुंदेलखंड के राजपूतों का विस्तृत वर्णन मिलता है।
  • मुहणौत नैणसी री ख्यात को जोधपुर राज्य का ‘गजेटियर’ ग्रंथ कहा जाता है।
  • इस ख्यात को राजस्थान का प्रथम ऐतिहासिक ग्रंथ कहते हैं।
  • इसमें राजपूतों की 36 शाखाओं का वर्णन मिलता है।

 मारवाड़ रा परगना री विगत

  • रचनाकार – मुहणौत नैणसी
  • इसमें मारवाड़ राज्य का विस्तृत इतिहास लिखा हुआ है।
  • यह ख्यात इतनी बड़ी है कि इसे ‘सर्वसंग्रह’ भी कहते हैं।

ताम्रपत्र

जब शासक किसी महत्वपूर्ण अवसर पर भूमि, गाँव, स्वर्ण एवं रत्न आदि दान देते थे या कोई अनुदान स्वीकृत करते थे, तब वे इस दान या अनुदान को ताम्बे की चद्दर पर उत्कीर्ण करवाकर देते थे ताकि पीढ़ियों तक यह साक्ष्य उस परिवार के पास उपलब्ध रहे। हजारों की संख्या में ताम्रपत्र उपलब्ध होते हैं। कुछ दानपत्रों से इतिहास की महत्वपूर्ण कड़ियों को जोड़ने में सहायता मिलती है। अब तक सबसे प्राचीन ताम्रपत्र ई.679 का धूलेव का दानपत्र मिला है। ई.956 का मघनदेव का ताम्रपत्र, ई.1002 का रोपी ताम्रपत्र, ई.1180 का आबू के परमार राजा धारावर्ष का ताम्रपत्र, ई.1185 का वीरपुर का दानपत्र, ई.1194 का कदमाल गाँव का ताम्रपत्र, ई.1206 का आहाड़ का ताम्रपत्र, ई.1259 का कदमाल ताम्रपत्र, ई.1287 का वीरसिंह देव का ताम्रपत्र तथा ई.1437 का नादिया गाँव का ताम्रपत्र प्रमुख हैं।

सिक्के

राजस्थान से मिले पंचमार्का सिक्के, गधैया सिक्के, ढब्बू सिक्के, आहड़ उत्खनन से प्राप्त सिक्के, मालवगण के सिक्के और सीलें, राजन्य सिक्के, यौधेय सिक्के, रंगमहल से प्राप्त सिक्के, सांभर से प्राप्त मुद्रायें, सेनापति मुद्रायें, रेड से प्राप्त सिक्के, मित्र मुद्रायें, नगर मुद्रायें, बैराट से प्राप्त मुद्रायें, गुप्तकालीन सिक्के, गुर्जर प्रतिहारों के सिक्के, चौहानों के सिक्के तथा मेवाड़ी सिक्के राजस्थान के प्राचीन इतिहास को जानने के प्रमुख स्रोत हैं। अजमेर से मिले एक सिक्के में एक तरफ पृथ्वीराज चौहान का नाम अंकित है तथा दूसरी तरफ मुहम्मद गौरी का नाम अंकित है। इससे अनुमान होता है कि पृथ्वीराज चौहान को परास्त करने के बाद मुहम्मद गौरी ने उसके सिक्कों को जब्त करके उन्हें अपने नाम से दुबारा जारी किया था।

राजस्थान की विभिन्न रियासतों में भी समय-समय पर विभिन्न सिक्कों का प्रचलन हुआ। इनसे मध्यकाल एवं मध्येतर काल के इतिहास की जानकारी मिलती है। इनमें स्वरूपशाही सिक्के तथा राव अमरसिंह राठौड़ के सिक्के महत्वपूर्ण हैं। मुगलों के शासन काल में कुचामन के ठाकुर को सिक्के ढालने की अनुमति दी गई थी। कुछ लोगों ने नकली कुचामनी सिक्के ढाल कर चला दिये जिससे कुचामनी सिक्का काफी चर्चित रहा।

hostinger

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