बिहार सरकार के 2019-20 के आर्थिक सर्वेक्षण में यह कहा गया है कि गत तीन वर्षों में बिहार की विकास दर भारत की विकास दर से अधिक रही है। अर्थव्यवस्था के किन क्षेत्रों ने इस प्रगति में योगदान किया है? वर्णन कीजिए।

बिहार सरकार के 2019-20 के आर्थिक सर्वेक्षण में यह कहा गया है कि गत तीन वर्षों में बिहार की विकास दर भारत की विकास दर से अधिक रही है। अर्थव्यवस्था के किन क्षेत्रों ने इस प्रगति में योगदान किया है? वर्णन कीजिए।

अथवा

आर्थिक सर्वेक्षण 2019-20 के अनुसार बिहार ने जिन-जिन क्षेत्रों में प्रगति की है इसका उल्लेख करें।
अथवा
बिहार का विकास दर भारत के विकास दर से कितना और किस प्रकार भिन्न है तुलनात्मक ब्योरा दीजिए।
उत्तर – वित्तीय संसाधनों की सीमित उपलब्धता के बावजूद बिहार में विगत तीन वर्षों में लगातार सामाजिक आर्थिक विकास दिखा है। इसका अर्थ यह है कि राज्य ने अर्थव्यवस्था में मात्रात्मक एवं गुणात्मक दोनों ही स्तर पर प्रगति की है। सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) की नई श्रृंखला के अनुसार वर्ष 2018-19 में स्थिर मूल्य पर बिहार की वृद्धि दर 10.53 प्रतिशत तथा वर्तमान मूल्य पर 15.01 प्रतिशत थी जो भारत की वृद्धि दर (स्थिर मूल्य पर 6.1% तथा वर्तमान मूल्य पर 11.0% ) से अधिक है।
> सकल राज्यगत मूल्यवर्धन (GSVA) में प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रों का हिस्सा क्रमश: 21.3 प्रतिशत, 19.7 प्रतिशत और 59.0 प्रतिशत था। द्वितीयक क्षेत्र के अंतर्गत निर्माण एवं विनिर्माण GSVA में मुख्य योगदाता हैं।
> यद्यपि वर्ष 2013-14 से वर्ष 2018-19 के बीच समग्र द्वितीयक क्षेत्र का योगदान 19 से 20 प्रतिशत के मध्य रहा है। तृतीयक क्षेत्र में मुख्य योगदाता व्यापार एवं मरम्मत सेवाएं, आवास स्वामित्व एवं पेशेवर सेवाएं थी। वर्ष 2012-13 से वर्ष 2018-19 के मध्य समग्र तृतीयक क्षेत्र का योगदान 13.3 प्रतिशत बढ़ा है।
इस प्रकार राज्य में विभिन्न क्षेत्रों में हुई आर्थिक व सामाजिक दोनों प्रकार की उपलब्धियों से स्पष्ट है कि अभी तक हुआ विकास व्यय सहित राज्य सरकार की विभिन्न नीतिगत पहल कदमियों का परिणाम है।
यद्यपि बिहार एक सघन आबादी वाला राज्य है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार यहां का जन घनत्व 1106 है जो देश के औसत जनघनत्व 382 से लगभग तिगुना है, तथापि अर्थव्यवस्था में ढांचागत परिवर्तन भी हुआ है। विकास प्रक्रिया को बल देने के लिये राज्य सरकार का ध्यान सात निश्चय पर काम करने के साथ-साथ ‘जल जीवन हरियाली’ जैसे महत्त्वाकांक्षी कार्यक्रम के माध्यम से पर्यावरण संबंधी चुनौतियों के समाधान पर भी केंद्रीत है। राज्य ने अपनी वित्त व्यवस्था का प्रबंध विवेकपूर्ण ढंग से किया, बिहार राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन (FRBM) अधिनियम, 2006 का पालन किया । अपने संसाधनों से राजस्व सृजन में सुधार करने की सीमाओं के बावजूद राज्य विगत वर्षों में राजस्व अधिशेष बनाए रखा ताकि सार्वजनिक निवेश के लिए राजकोषीय साधन उपलब्ध हो सके।
प्राथमिक क्षेत्र का हिस्सा तृतीयक क्षेत्र की ओर शिफ्ट होने से भी वर्ष 2011-12 से वर्ष 2018-19 के बीच बिहार की अर्थव्यवस्था की क्षेत्रवार संरचना को परिवर्तित किया है। परिणामतः फसलों एवं पशुधनों में प्रतिशत गिरावट के बावजूद भी 2012-13 से 2018-19 के मध्य परिवहन सेवा इत्यादि का योगदान राज्य के GSVA में बढ़ा है।
15वें वित्त आयोग द्वारा वर्ष 2020-21 के लिए जारी वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार कुल वितरणीय संसाधनों में बिहार का हिस्सा 9.67 प्रतिशत से बढ़कर 10.06 प्रतिशत हो गया, जिससे राज्य सरकार संसाधनों के लिए केंद्रीय अंतरणों एवं अनुदानों पर निर्भरता की सीमा को कुछ हद तक सीमित कर सकती है। राजकोषीय प्रबंधन की प्रभाविता में सुधार के प्रयास में राज्य सरकार ने 1 अप्रैल 2019 को व्यापक वित्त प्रबंधन प्रणाली (CFMS) की शुरुआत की ताकि राज्य की सारी वित्तीय गतिविधियां ऑनलाइन एवं कागजरहित हो जाए और मानव श्रम के साथ-साथ पूंजी का उपयोग भी दूसरे पिछड़े क्षेत्रों के उत्थान के लिए किया जा सके राज्य को वित्तीय सुरक्षा प्राप्त हो सके।
झारखंड राज्य बनने के बाद बिहार के अपने संसाधनों से राजस्व का हिस्सा काफी घट गया, जिसका मुख्य कारण अपने संसाधनों से राजस्व में आई गिरावट थी। किंतु वर्ष 2017-18 और 2018-19 के राजस्व लेखे के व्यय से यह सुधार फिर से दिख रहा और सामाजिक सेवाओं पर व्यय का हिस्सा 2 प्रतिशत अंक बढ़ा, जबकि आर्थिक सेवाओं और सामाजिक सेवाओं पर व्यय में एक-एक प्रतिशत अंक की गिरावट आई।
राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि क्षेत्र का योगदान 2017-18 में लगभग 20 प्रतिशत था। सीमित भूमि संसाधन, टुकड़ों में बंटी जोतों और अनियमित वर्षापात के बावजूद राज्य में फसलों और बागवानी का उत्पादन संबंधी प्रदर्शन उत्साहजनक रहा है। पशुधन, मछली पालन एवं जलकृषि में वार्षिक वृद्धि जैसी सक्षम कृषि व्यवस्था बिहार में समग्र आर्थिक विकास की विकासमूलक रणनीति का एक महत्त्वपूर्ण अंग बन गई है। इसके अतिरिक्त मुख्यमंत्री बागवानी मिशन, बिहार राज्य जैविक मिशन, प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना, जल जीवन हरियाली अभियान जैसे कृषि कार्यक्रम भी राज्य के कृषि राडमैप का अभिन्न अंग है जिसका प्रमाण राज्य को मिलने वाला कृषि कर्मण पुरस्कार है।
बिहार औद्योगिक क्षेत्र विकास प्राधिकरण (बिआडा) ने अनेक सुधार के जरिए बिहार में औद्योगिकरण में सहायता की है। जिससे विगत वर्षों में निवेश बढ़ा है। पर्यटन क्षेत्र ने भी काफी बड़ी संख्या में देशी विदेशी पर्यटकों को आकर्षित किया है। समय के साथ प्रवास की प्रकृति और भूगोल में भी काफी गुणात्मक परिवर्तन दिखे हैं। बिहार में बुनियादी ढांचे के विकास पर खर्च में वृद्धि के कारण राज्य से श्रमिकों के पलायन में कमी आई है। अनेक राजकीय अभिकरण और आयोग युवा वर्ग की रोजगार पाने की क्षमता बढ़ाने के लिए कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रम चला रहे हैं। इसके अतिरिक्त राज्य सरकार ने भौतिक अधिसंरचना परियोजनाओं, आर्थिक विकास कार्यक्रमों और व्यवसाय करने में आसानी आदि के पारदर्शी बिडिंग और सार्वजनिक खरीद अनुश्रवण और मूल्यांकन उपलब्ध कराने के लिए अनेक ई-शासन कार्यक्रमों का क्रियान्वयन भी किया है।
राज्य में कानून एवं प्रशासन बरकरार रखने के लिए राज्य सरकार ने CCTNS, साइबर सुरक्षा, ई- प्रीजन CCTV एवं विडियो से निगरानी, ई-कोर्ट तथा प्रत्यक्ष लाभांतरण (DBT) के माध्यम से शिक्षा, स्वास्थ्य, समाज कल्याण खाद्य सुरक्षा आदि क्षेत्रों में लोगों का भरोसा बढ़ाया है। नागरिकों को राज्य सरकार ने अधिकार आधारित अनेक शक्तियां जैसे – RTPS, सूचना का अधिकार इत्यादि प्रदान की है। इस हेतु राज्य सरकार को ओरेकल – ई शासन एक्सैलेंस अवार्ड, राष्ट्रीय ई-शासन पुरस्कार, प्रधानमंत्री लोक प्रशासन उत्कृष्टता पुरस्कार, डिजिटल इंडिया अवार्ड जैसे कई अन्य सम्मान प्राप्त हुए हैं। ये सब ई-सेवाओं में वृद्धि के लिए राज्य के विभिन्न विभागों द्वारा भौगोलिक एवं जनसांख्यिक रूप में सरकार की पहुंच का विस्तार करती हैं साथ ही लोक वित्त प्रबंधन एवं अपात सेवाएं इत्यादि में दिशाबद्ध किये गये सरकार के प्रयासों को पृष्ठांकित करती हैं।
सबसे तीव्र गति से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक बिहार को अपना विकास पर्यावरण की सुस्थिरता के लक्ष्य के अनुरूप व्यवस्थित करने में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। वर्ष 2013-14 से 2018-19 तक सकल राज्यगत मूल्यवर्धन में वानिकी एवं काष्ठ निर्माण क्षेत्रों का 1.6 प्रतिशत योगदान रहा है। पर्यावरण की स्थिरता, पारिस्थितिक संतुलन और वन्यजीव तथा जैव विविधता की रक्षा के लिए नोडल अभिकरण के रूप में कार्य करता है। बिहार राज्य कृषि वानिकी नीति, 2018 का प्रयास पारितंत्र के संरक्षण और स्थिरीकरण, अनुकूल फसल प्रणाली को बढ़ावा देने तथा कृषि वानिकी के प्रसास के जरिए ग्रामीण परिवारों को रोजगार बढ़ाने पर है। इसके साथ ही बिहार राज्य जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना (बिहारSAPCC) का लक्ष्य कृषि, जल संसाधन, वन एवं जैव विविधता तथा आपदा प्रबंधन से संबंधित नीतियों पर फोकस करना है।
पिछले कई वर्षों में प्रति व्यक्ति विकास व्यय 14.2 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है, जबकि राष्ट्रीय औसत 13.3 प्रतिशत ही है। राज्य में शिक्षा और स्वास्थ्य पर व्यय में क्रमश: 13.8 प्रतिशत और 20.8 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि हुई है। शिशु मृत्यु दर, संस्थागत प्रसव और अधिसंरचना अर्थात परिणाम, प्रक्रिया और लागत जैसे विकास संबंधी महत्त्वपूर्ण सूचकों के मामले में राज्य का प्रत्युत्तर संतोषजनक रहा है। साक्षरता दर में उपर जाना एवं लैंगिक दर में गिरावट मानव विकास का सूचक है।
अनुसूचित जातियों और जनजातियों अल्पसंख्यकों तथा महिलाओं के कल्याण को राज्य के कल्याणकारी कार्यक्रम में उच्च प्राथमिकता देना राज्य के विकास का सकारात्मक संकेत है। राज्य सरकार के सामाजिक सुरक्षा के उपायों से वंचित समुदाय के कल्याण में ही सुधार नहीं हुआ है बल्कि उनमें आत्मविश्वास का भी संचार हुआ है। यह बिहार में सामाजिक सुरक्षा एवं विकास व्यय में लगातार वृद्धि का ही परिणाम है। क्योंकि सिर्फ आर्थिक विकास पर ही ध्यान देना किसी भी राष्ट्र या राज्य के लिए बीमार मानव विकास का कारण बन सकता है। ऐसे में मानव विकास सामाजिक विकास के लिए एक व्यापक अवधारणा निर्मित करती है जिसमें लोग/नागरिक अपनी रूचियों तथा आवश्यकताओं के अनुरूप अपनी पूरी
क्षमता विकसित कर सकें और उत्पादक जीवन जी सकें। इस प्रकार बिहार में स्वास्थ्य, पेयजल एवं स्वच्छता, शिक्षा, समाज कल्याण, महिला सशक्तिकरण और बुजुर्गों तथा निःशक्तों की सामाजिक सुरक्षा जैसे विभिन्न आयामों के माध्यम से सामाजिक विकास की रूपरेखा तैयार की गई है जो राज्य के विकास दर को आगे रखने में सहायक सिद्ध हुआ।
बैकों और अन्य वित्तीय संस्थानों के जरिये होने वाले वित्तीय लेनदेन किसी भी राज्य के आर्थिक विकास में मुख्य भूमिका निभाते हैं। ये संस्थाएं संपत्ति की रक्षा करने के साथ-साथ उत्पादन के मुख्य उपादान-पूंजी भी उपलब्ध कराती है, क्योंकि वित्तीय विकास और आर्थिक वृद्धि के मध्य सकारात्मक संबंध होता है। बिहार की अर्थव्यवस्था मुख्यतः देश-विदेश के बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्रों के विकासों से प्रभावित होती है। उपभोक्ताओं के लिए बैंकिंग में नवाचारी साधनों यथा – इंटरनेट बैंकिंग, मोबाइल बैंकिंग, डेबिट एवं क्रेडिट कार्ड का उपयोग तथा एटीएम के प्रयोग एवं विकास से उपभोक्ताओं की वित्तीय साक्षारता और जागरूकता में सुधार हुआ है। राजकीय अर्थव्यवस्था में नगदीरहित लेनदेन को बढ़ावा देने के लिए इस पारितंत्र को NEFT, RTGS, UPI, QR code, PPI तथा शिकायत तंत्र को मजबूत करने हेतु CMS, UCB, NBFC जैसे अनेक उपाय किये गये हैं। परिणामतः राज्य में लघुवित्त बैंकों और सूक्ष्मवित्त संस्थानों की भूमिका लगातार बढ़ती जा रही है।
आर्थिक संपन्नता और समग्र सामाजिकस्थानिक विकास के अग्रदूत कहे जाने वाले शहरी क्षेत्र जिन्हें विकास का इंजन व राज्य में सामाजिक परिवर्तन का तीर्थस्थल भी माना जाता है, को राज्य के आर्थिक विकास की अनिवार्य शर्त कही गई है। समकालीन भारत के आर्थिक व राजनीतिक इतिहास में बिहार हमेशा ही महत्त्वपूर्ण भागीदार रहा है, इसीलिए यहां शहरी विकास की संभावना अधिक होती है। इससे कृषितर कार्यों का विस्तार एवं राज्य से देश के अन्य राज्यों में होने वाले प्रवास को विराम लगा है। अभी राज्य में अनेक नगर विकास पहलकदमियों का क्रियान्वयन किया जा रहा है जिसमें से कुछ को केन्द्र सरकार द्वारा वित्तीय सहायता भी प्राप्त है । परिणामस्वरूप राज्य द्वारा नमामि गंगे कार्यक्रम, दीन दयाल अन्त्योदय योजना-शहरी/ग्रामीण इत्यादि जैसे विकासमूलक कार्यक्रमों का क्रियान्वयन किया जा रहा है। पटना, भागलपुर, बिहारशरीफ और मुजफ्फरपुर को स्मार्ट सिटी मिशन के लिए चुना जाना इसका सर्वोत्तम उदाहरण हो सकता है ।
बिहार सरकार ने शहर के साथ-साथ ग्रामीण अधिसरंचना और आय वृद्धि कार्यक्रमों में निवेश के लिए रणनीतिक दृष्टिकोण अपनाया है, बिहार ग्रामीण जीविका प्रोत्साहन समिति के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी निवारण में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। मनरेगा के साथ-साथ राज्य सरकार तीन मुख्य दीर्घस्थायी लक्ष्य SDG-1, SDG-5 और SDG-10 पर लगातार कार्य कर रही है ताकि बहु – क्षेत्रीय दृष्टिकोण अपनाकर विकास को टिकाऊ और समावेशी बनाया जा सके।
उपलब्धता वर्ष 2012-13 से वर्ष 2018-19 के मध्य राज्य में बिजली की प्रति व्यक्ति खपत 114 प्रतिशत बढ़ी है, बिजली की में सुधार, बिजली की बिक्री में वृद्धि और उसके कारण राजस्व संग्रहण की उत्तरोत्तर वृद्धि को स्पष्ट करता है। नवीकरणीय उर्जा के उपयोग को प्राथमिकता देने के लिए राज्य सरकार ने बिहार नवीकरणीय उर्जा विकास अभिकरण (BREDA) की स्थापना की है। यह मुख्य रूप से केपेक्स (पूंजीगत व्यय) मोड के तहत सौर उर्जा पंप और सौर विद्युत उत्पादन संबंधी विभिन्न परियोजनाओं का क्रियान्वयन कर उर्जा दक्षता संबंधी अनेक योजनाएं भी चलाता है।
राज्य सरकार द्वारा बढ़ाये गये निवेश के कारण ही अधिसंरचना (मुख्य रूप से परिवहन क्षेत्र) में दो अंकों की वृद्धि दर्ज की गई। पथ सुरक्षा के मामले में प्रति लाख आबादी पर दुर्घटना की दर देश के अन्य राज्य की अपेक्षा कम है। राज्य परिवहन निगम ने राजस्व संग्रहण में पिछले 5 वर्षों में लगभग सात गुनी वृद्धि की है।
निष्कर्षतः पिछले वर्षों में बिहार में राज्य सरकार के प्रयासों के कारण राज्य में आर्थिक और सामाजिक विकास न केवल मजबूत बल्कि समावेशी भी रहा है। बिहार में समग्र मुद्रास्फीति दर और ग्रामीण मुद्रास्फीति दर संपूर्ण भारत की मुद्रास्फीति दरों से काफी नीचे रही है। बिहार की अर्थव्यवस्था का यह प्रदर्शन राज्य द्वारा उच्च विकासमूलक व्यय के कारण संभव हो सका है। खास तौर पर राज्य की वित्त व्यवस्था के प्रबंधन के कारण बिहार की विकास गाथा एक सतत प्रक्रिया रही है, जिसे राज्य ने प्रमाणिकता के साथ दर्ज किया है।
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