बिहार में व्याप्त आर्थिक एवं सामाजिक विषमताओं के मुख्य कारण क्या हैं? सरकार द्वारा इन असमानताओं को कम करने के लिए उठाए गए कदमों का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।

बिहार में व्याप्त आर्थिक एवं सामाजिक विषमताओं के मुख्य कारण क्या हैं? सरकार द्वारा इन असमानताओं को कम करने के लिए उठाए गए कदमों का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।

अथवा

बिहार में फैले सामाजिक एवं आर्थिक विषमता के कारण मुख्य रूप से क्या हैं ? 
अथवा
राज्य सरकार द्वारा इन असमानता को दूर करने के लिए कौन-कौन से प्रयास किए गए हैं। आलोचनात्मक व्याख्या करें।
उत्तर- किसी राज्य विशेष में आर्थिक एवं सामाजिक विषमता के मुख्य कारण जनसंख्या वृद्धि, निरक्षरता और आधारभूत संरचना की कमी है, परन्तु ये केवल पिछड़ेपन या अल्पविकास के कारण मात्र नहीं हैं, बल्कि इसके परिणाम भी हैं। बिहार में व्याप्त अशिक्षा और आधारभूत सुविधाओं का अभाव, इसे अन्य राज्यों की तरह सामाजिक, आर्थिक विकास से अलग करता है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो सामाजिक एवं आर्थिक क्षेत्रों में व्याप्त असमानता का मुख्य कारण यह है कि कुछ लोगों का उत्पादन के साधनों पर बहुत अधिक नियंत्रण है और कुछ लोग उससे वंचित हैं।
•  विषमता के कारण
1. नर-नारी असमानता
2. रंगभेद पर आधारित असमानता
3. श्रम और जाति आधारित भेदभाव
4.निजी पूंजी से उत्पन्न पूंजीवादी विचार
5. व्यक्तिगत जीवन में किए जाने वाले हस्तक्षेप
6. बाजारवादी एवं संप्रदायवादी ताकतों का प्रसार
7. सामाजिक-आर्थिक पुनर्निमाण जैसे क्रांतिकारी विचारों का अभाव
8.गरीबी
9. औद्योगिक क्षेत्रों का अभाव
10. कृषि में भिन्नता
11. परिवहन एवं संचार की कमी
12. ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य / रूढ़िवा
13. भौगोलिक कारक
14. प्राकृतिक संसाधनों के वितरण एवं उपयोग में भिन्नता
15. देश के मुख्य वाणिज्यिक केन्द्रों से दूरी
16. आधारभूत संरचना की कमी
17. अच्छे नीतिगत शासन प्रणाली का अभाव
दशकों से संकटग्रस्त राज्य कहे जाने वाल बिहार राज्य में सुशासन के साथ-साथ नए बिहार की अवधारणा को विकसित कर शासन प्रणाली को अत्यधिक विकेंद्रीकृत व जन अभिमुखी बनाने का प्रयास किया गया है। इस संबंध में सरकार द्वारा कई प्रयास किये गये हैं।
1. जनता दरबार: यह नौकरशाही एवं सरकारी व्यवस्था में पारदर्शिता व जवाबदेही लाने हेतु आरंभ किया गया ताकि प्रशासनिक व्यवस्था को आम जनता की समस्याओं के प्रति अधिक जिम्मेदार व गंभीर बनाया जा सके और जनता का फीडबैक मालूम हो । इसी विकास यात्रा में यह बात सामने निकलकर आई कि राज्य के विकास में भ्रष्टाचार एक बाधा है। परंतु जनता दरबार या जनता दरबार में मुख्यमंत्री की सबसे बड़ी चुनौती नौकरशाहों का फिजुलखर्ची वाला रवैया या उनका अपनी प्राथमिकता के अनुसार विषय का चयन करना जिससे जनता की आवाज खासकर समाज के नीचे तबके के लोगों की दबकर रह जाती है।
2. महादलित आयोग: दलितों में मौजूद अत्यंत पिछड़ी जातियों को समाज के मुख्य धारा से जोड़ने के लिए ‘महादलित आयोग’ का गठन 30 अगस्त, 2007 को किया गया। इसने अपनी रिपोर्ट में महादलितों के सशक्तिकरण संबंधी उपायों को भी सुझाया तथा इसके लाभ हेतु 21 कार्यक्रमों की घोषणा की गई जिनमें पालनाघर, मुख्यमंत्री महादलित पोशाक योजना, ब्लॉक स्तर पर विकास मित्र की स्थापना महत्त्वपूर्ण हैं | सरकार ने 22 दलित उपजातियों में से 18 को महादलित में शामिल किया तथा अब केवल दुसाध (पासवान) ही एकमात्र ऐसी उपजाति बची जिसे महादलित आयोग में शामिल नहीं किया गया है।
3. पंचायती राज में आरक्षण: बिहार पंचायती राज अधिनियम, 2005 के अधिनियमित होते ही राज्य में त्रिस्तरीय व्यवस्था लागू हो चुकी है। जिसके तहत मुख्य रूप से महिलाओं एवं EBC (अत्यंत पिछड़ा वर्ग) को दिया जाने वाला आरक्षण का प्रावधान महत्त्वपूर्ण है। इस संबंध में यह एक समतामूलक समाज की स्थापना में किए गए प्रयास का एक रूप malikas है, लेकिन पंचायती राज में इस आरक्षण की कई चुनौतियां भी हैं। महिला सरपंच, मुखिया के स्थान पर इसके पति, भाई, रिश्तेदार अपना वर्चस्व दिखा रहे हैं। परिणामतः सही मायने में महिला सशक्तिकरण की रूपरेखा कमजोर दिखाई पड़ती है।
4. बिहार विशेष न्यायालय अधिनियमः इसके माध्यम से सरकार भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा पायेगी। भ्रष्टाचारी लोकसेवक की संपत्ति दोषी पाये जाने पर सरकार की हो जाएगी, इसमें रिटायर्ड या पूर्व सभी लोकसेवकों को शामिल किया गया है, ताकि इस कानून के तहत पकड़े गए लोकसेवक की चल-अचल संपत्ति को जब्त करने का अधिकार सरकार का होगा। साथ ही देखने वाली बात यह भी है कि कहीं सरकारी प्रभाव इसके निर्णय को प्रभावित न करे, जैसा कि बीते दिनों आबकारी विभाग में देखने को मिला है।
5. समान शिक्षा प्रणाली: बिहार में शैक्षणिक व्यवस्था की नींव प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा है। शैक्षणिक व्यवस्था में वर्ग एवं स्टेटस के अंतर को समाप्त करने के लिए समान शिक्षा प्रणाली आयोग का गठन मुचकुंद दूबे की अध्यक्षता में किया गया। इस कमिटी की अनुशंसा मानें तो सभी वर्ग के बच्चे एक साथ पढ़ेंगें। परंतु आयोग की रिपोर्ट को सरकार लागू नहीं कर सकी और इसे केंद्र का विषय कहकर राज्य विशेष से नकार दिया गया। इसी प्रकार विश्वविद्यालय की बिगड़ती शैक्षणिक परिवेश पर भी सरकार की पकड़ में ढील दिखाई पड़ती है। समय पर परीक्षा का न हो पाना, महीनों कक्षा का स्थगित होना सरकार के व्यवस्था की कमजोरी को प्रदर्शित करती है। अतः उच्च शिक्षा को सशक्त किये बिना बिहार की आर्थिक-सामाजिक विषमता को दूर कर पाना असंभव है।
6. अति पिछड़ा वर्ग आयोग, किसान आयोग, अल्पसंख्यक आयोगः उदयकांत चौधरी, रामाधार एवं जाकिर हुसैन की अध्यक्षता में गठित क्रमशः अति पिछड़ा वर्ग आयोग, किसान आयोग एवं अल्पसंख्यक आयोग की रिपोर्ट में सभी वर्गों के उत्थान से संबंधित कई सिफारिशें हैं किंतु विभिन्न मतभेदों एवं वैचारिक अंतर ने सरकार को इसे लागू करने से वंचित रखा और कुछ रिपोर्ट खुद कमिटी के अध्यक्ष की कमजोरी की वजह से सौपी नहीं जा सकी जो, स्वयं में एक प्रश्नचिह्न है।
7. नौकरशाही शासनः अफसरों पर किसी प्रकार का राजनीतिक नियंत्रण का न होना या कम होना नौकरशाह शब्द को परिभाषित करता है। समग्र रूप से इसमें सरकार द्वारा विकास की रणनीति के माध्यम से राजनीति के आयाम को विस्तृत आधार प्रदान किया जाता है। उदाहरणत: भूमि सुधार को यदि नेक मनसाहत के साथ बिहार में लागू नहीं किया गया तो असमानता/विषमता को समाप्त करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य होगा क्योंकि यहां अभी भी भू-सामंतियों का वर्चस्व है। इसे तोड़ने एवं नक्सलवाद की समस्याओं को जड़ से मिटाने के लिए भूमि सुधार आवश्यक है।
8. सामाजिक सशक्तिकरण: इसमें सामाजिक सशक्तिकरण जैसे-मिड डे मील (अब पीएम पोषण), कस्तूरबा गांधी विद्यालय, नवोदय विद्यालय, राष्ट्रीय प्रतिभा खोज योजना, राजीव गांधी राष्ट्रीय छात्रवृत्ति, प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए निःशुल्क कोचिंग एवं उच्च प्राथमिक स्तर की शिक्षा के बाद सभी छात्र-छात्राओं को सुरक्षित हॉस्टल की सुविधा प्रदान कर सरकार ने सामाजिक विषमता को दूर करने का भले ही भागीरथ प्रयास किया हो, परंतु इसका जमीनी स्तर पर सही संचालन न हो पाना भी सरकार के लिए चुनौतियां खड़ी करती हैं।
9. आर्थिक सशक्तिकरण: इसके तहत सरकार ने रोजगार और आय के अवसर उत्पन्न करने वाले कार्यक्रम के सुचारू रूप से संचालन प्रारंभ किये हैं, जैसे- NSFDC, NSKFDC, SCDC, NSTFDC, STDC, ट्राइफेड इत्यादि । इस हेतु निम्न उच्चतम वित्तीय संगठन स्थापित किये गये हैं। यह सामाजिक और आर्थिक रूप से अभावग्रस्त वर्गों को वित्तीय सहायता के साथ-साथ बाजार भी उपलब्ध करवाता है। यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि राज्य सरकार अपनी भूमिका का निर्वहन कितने सटीक ढंग से कर पा रही है।
10. महिला सशक्तिकरण: यह भारत के संविधान की प्रस्तावना, मौलिक अधिकार, मौलिक कर्त्तव्य तथा नीति निदेशक तत्त्वों में समाहित हैं। संविधान न केवल महिलाओं को समानता प्रदान करता है बल्कि राज्य को महिलाओं के हित में सकारात्मक कदम उठाने के लिए भी सशक्त करता है, लेकिन इससे संबंधित विभागीय स्तर पर काफी अंतर है। उनकी शिक्षा–स्वास्थ्य तथा उत्पादक संसाधनों तक पर्याप्त पहुंच नहीं हो पाई है। ये अभी भी समाज की मुख्यधारा से बाहर हैं। इस हेतु सरकार की व्यवस्था को अन्य तंत्रों की अपेक्षा अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है।
 उपरोक्त के अलावा बिहार में व्याप्त आर्थिक सामाजिक विषमता को समाप्त करने या कम करने हेतु सरकार द्वारा निम्नलिखित उपाय भी किए गए हैं जिसे वांछित रूप में कार्यरूप देने की आवश्यकता है
1. इंटरनेट हब का विकास
2. सकल खिड़की प्रणाली संबंधी शोध कार्य
3. शहरी – ग्रामीण गवर्नेस संबंधी शोध कार्य
4. विद्युत आपूर्ति, सिंचाई व्यवस्था को पुनर्जीवित करना
5. केंद्रीय योजना में प्राप्त राशि का पूर्णत उपयोग
6. अनुशासन हीनता पर रोक
7. परियोजनाओं को लागू करना
8. सटीक कानून व्यवस्था को संचालित करना
9. नौकरशाहों में सुधार पर बल देना
10. उद्योग मित्र के तहत नई औद्योगिक नीति बनाना
11. मुख्यमंत्री कन्या सुरक्षा योजना
12. मुख्यमंत्री अक्षर आंचल योजना
13. डेयरी उद्योग एवं कोऑपरेटिव क्षेत्र के विकास को बढ़ावा देना
> सामाजिक विषमता के कारण- लैंगिक असमाना, अशिक्षा, रंगभेद, जातिवाद, सामाजिक न्याय, तानाशाही, वर्ग – विभेद इत्यादि।
> आर्थिक विषमता के कारण – पूंजीवादी विचार, एकाधिकार की भावना, बाजारवादी एवं संप्रदायवादी विचार कृषि भिन्नता इत्यादि।
> सरकार द्वारा किए गए विभिन्न प्रयास- आयोग का गठन, जागरूकता कार्यक्रम, सरकार की नीतियां, योजनाएं, नौकरशाही पर अंकुश, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, महिला सशक्तिकरण इत्यादि।
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