भारत में साम्प्रदायिकता पर नोट लिखें। विरोधी दल भाजपा को साम्प्रदायिक दल कहकर क्यों संबोधित करते हैं?

भारत में साम्प्रदायिकता पर नोट लिखें। विरोधी दल भाजपा को साम्प्रदायिक दल कहकर क्यों संबोधित करते हैं?

अथवा

‘साम्प्रदायिकता’ को समझाते हुए इसके व्यापक नकारात्मक पक्ष एवं प्रभाव को दिखाएं। भाजपा की स्थिति स्पष्ट करें।
उत्तर- अपने संप्रदाय अथवा धर्म की श्रेष्ठता के उन्माद में दूसरे संप्रदाय / धर्म से घृणा अथवा द्वेष रखना तथा फैलाना, जिसके परिणामस्वरूप विभिन्न धर्मों, सम्प्रदायों के मध्य कटुता, द्वेष, घृणा आदि उत्पन्न हो जाती है, सम्प्रदायवाद कहलाती है। सम्प्रदायों के मध्य ऐसी कटुता कभी-कभी व्यापक हिंसा का रूप धारण कर लेती है। सम्प्रदायों के मध्य ऐसी मानसिकता को साम्प्रदायिकता कहते हैं, तथा साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देने अथवा फैलाने वाले दल, संगठन अथवा व्यक्ति को साम्प्रदायिक कहते हैं ।
साम्प्रदायिकता एक नई अवधारणा है जिसका उदभूव एवं विकास मूलत: अंग्रेजों के समय में हुआ। यद्यपि अंग्रेजों से पहले भी विभिन्न सम्प्रदायों के मध्य टकराव की स्थिति थी। लेकिन अंग्रेजों ने विशेष रणनीति के तहत अपने फायदे के लिए साम्प्रदायिकता का उपयोग किया। 1857 की क्रांति तथा बहावी आंदोलन के बाद अंग्रेजों ने मुस्लिमों का दमन किया।
इस दौरान विभिन्न क्षेत्रों में हिन्दुओं का विकास हुआ और वे प्रबुद्ध बन गए एवं विभिन्न संगठनों का गठन कर सरकार विरोधी मुहिम का नेतृत्व करने लगे। 1885 में कांग्रेस का गठन हुआ जिसके अधिकांश नेता उच्चवर्गीय हिन्दू थे। अतः अधिकतर मुसलमान अंग्रेज विरोधी आंदोलनों में सक्रिय भाग नहीं ले सके। अंग्रेजों ने भी हिन्दू-मुसलमानों के मध्य फूट डालने की रणनीति के तहत बंगाल-विभाजन किया एवं 1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना में सहयोग किया। अंग्रेजों के मुस्लिमों के रहनुमा बनने की रणनीति के कारण अधिकांश मुस्लिम कांग्रेस एवं अन्य संगठनों को हिन्दू संगठन मानने लगे एवं इनके बीच दूरी बढ़ती गई। यद्यपि गांधीजी एवं अन्य नेताओं ने हिन्दू-मुस्लिम एकता पर जोर दिया लेकिन जिन्ना जैसे मुस्लिम नेताओं ने अपने निजी स्वार्थ के लिए ऐसा नहीं होने दिया। इस बढ़ती दूरी एवं साम्प्रदायिक द्वेष का विस्फोट भारत-विभाजन के रूप में दिखा जिसके बाद हुए साम्प्रदायिक हिंसा में लाखों लोगों की जाने गई एवं धन-सम्पदा की क्षति हुई।
स्वतंत्रता के बाद भी साम्प्रदायिकता का जहर भारत में विद्यमान रहा। 1984 के सिक्ख विरोधी दंगे में साम्प्रदायिकता का क्रूर रूप दिखा जहां लाखों सिक्खों की जान गई। गुजरात का गोधरा-कांड साम्प्रदायिक हिंसा का एक अन्य गंभीर उदाहरण है। धर्म-प्रचारक मिशनरियों के साथ भी साम्प्रदायिक हिंसा की कई घटनाएं होती रहती हैं।
 भारत अनेक धर्मों वाला देश है तथा यहां रहने वाले प्रत्येक धर्मावलंबी का इस पर समान अधिकार है। हमें धार्मिक कट्टरता से उपर उठकर आचरण करना होगा। विरोधी दल अकसर भाजपा को साम्प्रदायिक पार्टी कहकर इसका राजनीतिक विरोध करते हैं। परंतु विरोधी दलों का यह आचरण वास्तविकता से ज्यादा राजनीतिक है। अल्पसंख्यकों को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करने वाली राजनीतिक पार्टियां इस प्रकार के हथकंडे अपनाती रही हैं। परंतु विरोधी दलों को ऐसा कहने का मौका इसलिए मिलता है, क्योंकि भाजपा का संबंध राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) से है जिसे कुछ दल कट्टर हिन्दूवादी संगठन मानते हैं। दूसरी बात भाजपा के कुछ नेताओं का नाम बाबरी मस्जिद विध्वंस घटना में रहा है। इन्हीं बातों को मुद्दा बनाकर विरोधी पार्टियां भाजपा को साम्प्रदायिक पार्टी कहती हैं।
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