1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति का वर्णन करते हुए, उसके द्वारा शिक्षा में किए गए महत्त्वपूर्ण परिवर्तन का वर्णन कीजिए।

1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति का वर्णन करते हुए, उसके द्वारा शिक्षा में किए गए महत्त्वपूर्ण परिवर्तन का वर्णन कीजिए।

                                                                          अथवा

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 की विशेषताएँ बताइये ।
उत्तर— राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986-आदिकाल से शिक्षा का विविध भाँति विकास एवं प्रसार होता रहा है। प्रत्येक देश अपनी सामाजिक सांस्कृतिक अस्मिता (Identity) को अभिव्यक्ति देने और पनपाने के लिए तथा साथ ही समय चुनौतियाँ का सामना करने के लिए अपनी विशिष्ट शिक्षा प्रणाली विकसित है, लेकिन देश के इतिहास में कभीकभी ऐसा समय आता है जब मुद्दतों से चले आ रहे उस सिलसिले को एक नई दिशा देने की नितान्त जरूरत हो जाती है। हमारा देश आर्थिक और तकनीकी लिहाज से उस मुकाम पर पहुँच गया है जहाँ से हम अब तक संचित साधनों का इस्तेमाल करते हुए समाज के हर वर्ग को फायदा पहुँचाने का प्रबल प्रयास करते आए हैं। शिक्षा उस लक्ष्य तक पहुँचने का प्रमुख साधन है। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर भारत सरकार ने जनवरी 1985 में यह घोषणा की कि एक नई शिक्षा नीति निर्मित की जायेगी और फिर इस नई शिक्षा नीति को मई 1986 में संसद में प्रस्तुत किया गया ।
इन शिक्षा नीति को 12 निम्नलिखित भागों में बाँटा गया है–
 I.भूमिका—
(1) मनुष्य जाति के प्राचीन कालीन इतिहास से ही शिक्षा अपनी पहुँच एवं फैलाव का विकास विविधीकरण एवं प्रसार करती रही है। प्रत्येक देश अपनी विशिष्ट सामाजिक सांस्कृतिक अभिज्ञान को व्यक्त एवं उन्नत करने हेतु अपनी शिक्षा प्रणाली का विकास करता रहा है।
(2) राष्ट्र के आर्थिक तकनीकी विकास में एक स्तर तक पहुँच चुका है जबकि एक वृहद् प्रयास अवश्य किया जाना चाहिए, जिससे कि परिसम्पत्ति का पहले ही सृजन हो चुका है, उससे अधिकतम लाभ उठाया जा सके तथा परिवर्तन के लाभ सभी वर्गों तक पहुँच सके ।
(3) इस लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए सरकार ने जनवरी, 1985 में घोषित किया कि देश के लिए एक नवीन शिक्षा नीति का प्रतिपादन किया जायेगा। वर्तमान शिक्षा दृश्य का व्यापक मूल्य-निरूपण किया गया जिसके पश्चात् देश पर्यन्त वादविवाद हुआ। विभिन्न दशाओं से जो दृष्टिकोण और सुझाव प्राप्त हुए उनका सावधानीपूर्वक अध्ययन किया गया।
(4) स्वतन्त्रता के बाद भारत में शिक्षा के इतिहास में 1986 की राष्ट्रीय नीति एक महत्त्वपूर्ण कदम थी। उसका उद्देश्य राष्ट्रीय प्रगति, समान नागरिकता तथा राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करना था। उसने शिक्षा प्रणाली की पुनर्रचना की आवश्यकता पर उसकी गुणवत्ता के प्रत्येक प्रणाली स्तर पर उन्नयन करने हेतु बल दिया और विज्ञान एवं तकनीकी, नैतिक मूल्यों के संवर्धन तथा शिक्षा एवं लोगों के जीवन में घनिष्ठ सम्बन्ध पर अत्यधिक ध्यान दिया।
(5) 1968 की शिक्षा नीति को स्वीकार किये जाने के बाद समस्त देश में सभी स्तरों पर शिक्षा सुविधाओं का पर्याप्त विस्तार हुआ है।
(6) सबसे महत्त्वपूर्ण विकास जी हुआ है वह है समस्त देश में शिक्षा की समान संरचना को स्वीकृति और अधिकतर राज्यों में 10+2+3 प्रणाली का प्रारम्भ होना। बालक एवं बालिकाओं के लिए अध्ययन की समान योजना निर्धारित करने के अतिरिक्त विद्यालय पाठ्यचर्या में विज्ञान एवं गणित, अनिवार्य विषय के रूप में समाविष्ट कर दिये गये और कार्यानुभव का महत्त्वपूर्ण स्थान निर्दिष्ट कर दिया गया।
(7) पूर्वस्नातक स्तर पर पाठ्यक्रमों की पुनर्रचना प्रारम्भ कर दी गयी थी। स्नातकोत्तर शिक्षा एवं शोध के लिए अग्रवर्ती अध्ययन केन्द्रों की स्थापना की गयी।
(8) 1968 की नीति में समाविष्ट सामान्य संरूपणों विशिष्ट उत्तरदायित्वों तथा वित्तीय तथा संगठनात्मक अवलम्ब के निर्धारण सहित, क्रियान्वयन की विस्तृत रणनीति में रूपान्तरित न हो सकी। परिणामस्वरूप सुलभता, गुणवत्ता, परिणाम, उपयोगिता और परिव्यय की समस्याएँ वर्षों से आती रहती हैं और उन्होंने अब ऐसा वृहत रूप धारण कर लिया है कि उनका समाधान चरम अत्यावश्यकता के साथ-साथ होना चाहिए।
(9) ग्रामीण क्षेत्र अपनी हीन अवसंरचना और सामाजिक सेवाओं सहित, प्रशिक्षित एवं शिक्षित युवक का लाभ तब तक नहीं उठा सकेंगे जब कि ग्रामीण नागरिक असमानताएँ घटायी नहीं जायेंगी और रोजगार के अवसरों का विविधीकरण एवं प्रकीर्णन नहीं होगा।
(10) भारत का राजनैतिक एवं सामाजिक जीवन एक ऐसे दौर से गुजर रहा है कि हमारे दीर्घ स्वीकृत मूल्यों के क्षण का संकट प्रस्तुत हो गया है। धर्म-निरपेक्षता, समाजवाद, प्रजातन्त्र एवं व्यावसायिक नैतिकता पर दबाव बढ़ता जा रहा है।
(11) भारतीय ढंग की विचारधारा में मानव को एक रचनात्मक परिसम्पत्ति तथा एक बहुमूल्य राष्ट्रीय संसाधन माना गया है जिसे कोमलता एवं सावधानी तथा साथ ही साथ गतिशीलता से संजोये रखने, पोषण करने एवं विकसित करने की आवश्यकता है।
(12) भारत में शिक्षा एक चौराहे पर खड़ी है न सामान्य रेखीय प्रसार, न वर्तमान गति एवं उन्नति का प्रकार, परिस्थिति की आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकते हैं।
(13) आगे आने वाले दशकों में हमारी जनसंख्या वृद्धि सार्थक रूप से घटाये जाने की आवश्यकता है। इसका प्रयोग करने में सबसे बड़ा अकेला कारक है स्त्रियों में साक्षरता एवं शिक्षा का प्रसार ।
(14) आगे आने वाले दशकों में जीवन अप्रत्याशित अवसरों सहित नये तनाव प्रस्तुत करने वाला है। लोगों को पर्यावरण का लाभ उठाने एवं सूक्ष्म बनाने के लिए, मानव संसाधन विकास के लिए अभिकल्प की आवश्यकता होगी।
(15) इसके अतिरिक्त विविध प्रकार की नवीन चुनौतियाँ और सामाजिक आवश्यकताएँ शासन के लिए देश के लिए नवीन शिक्षानीति का प्रतिपादन और क्रियान्वयन अवश्यकरणीय बना देता है। इससे कम कुछ भी परिस्थिति का सामना नहीं कर सकेगा ।
II. शिक्षा का सार और उसकी भूमिका—
(1) सबके लिए शिक्षा– हमारे राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में “सबके लिए शिक्षा ” हमारे भौतिक और आध्यात्मिक विकास की बुनियादी आवश्यकता है।
(2) सुसंस्कृत बनाने का माध्यम– शिक्षा सुसंस्कृत बनाने का माध्यम है। यह हमारी संवेदनशीलता और दृष्टि को प्रखर करती है जिससे राष्ट्रीय एकता पनपती है, वैज्ञानिक तरीके से अमल की संभावना बढ़ती है और समझ तथा चिंतन में स्वतंत्रता आती है ।
(3) जनशक्ति का विकास–शिक्षा के द्वारा ही आर्थिक व्यवस्था के विभिन्न स्तरों के लिए आवश्यकतानुसार जन-शक्ति का विकास होता है। शिक्षा वास्तव में वर्तमान तथा भविष्य के निर्माण का अनुपम साधन है।
III. राष्ट्रीय शिक्षा व्यवस्था —
(1) शिक्षा का नया रूप– 10+2+3 के ढाँचे को पूरे देश में स्वीकार कर लिया गया है । इस ढाँचे के पहले दस वर्षों के सम्बन्ध में यह प्रयत्न किया जाएगा कि उसका विभाजन इस प्रकार हो— प्रारम्भिक शिक्षा में 5 वर्ष का प्राथमिक स्तर और 3 वर्ष का उच्च प्राथमिक स्तर, तथा उसके बाद 2 वर्ष का हाई स्कूल ।
(2) आजीवन शिक्षा– आजीवन शिक्षा शैक्षिक प्रक्रिया का एक मूलभूत लक्ष्य है और सार्वजनिक साक्षरता उसका अभिन्न पहलू । युवा वर्ग, गृहिणियों, किसानों, मजदूरों, व्यापारियों आदि को अपनी पसन्द व सुविधा के अनुसार अपनी शिक्षा जारी रखने के अवसर उपलब्ध करवाए जायेंगे।
IV. समानता के लिए शिक्षा—
(1) महिलाओं की समानता हेतु शिक्षा– शिक्षा का उपयोग महिलाओं की स्थिति में बुनियादी परिवर्तन लाने के लिए एक साधन के रूप में किया जाएगा। महिलाओं की साक्षरता के प्रसार को सर्वोपरि प्राथमिकता दी जाएगी। इस काम के लिए विशेष व्यवस्थाएँ की जाएँगी । समयबद्ध लक्ष्य निर्धारित किए जायेंगे और उनके कार्यान्वयन पर कंड़ी निगरानी रखी जायेगी। विभिन्न स्तरों पर तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
(2) अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों की शिक्षा—इनकी शिक्षा के प्रसार के लिए निम्नलिखित उपाय किये जायेंगे—
(i) छात्रावास की सुविधाएँ बढ़ाई जायेंगी ।
(ii) इन परिवारों के बच्चों के लिए मैट्रिक – पूर्व छात्रवृत्ति योजना पहली कक्षा से आरम्भ की जाएगी ।
(iii) इन परिवारों के पढ़े-लिखे प्रतिभाशाली युवकों को प्रशिक्षण देकर अपने क्षेत्र में ही शिक्षक बनने के लिए प्रोत्साहन दिया जाएगा।
(3) प्रौढ़ शिक्षा– विभिन्न पद्धतियों और माध्यमों का उपयोग करते हुए प्रौढ़ तथा सतत् शिक्षा का एक व्यापक कार्यक्रम कार्यान्वित किया जाएगा। इसके अन्तर्गत निम्न प्रकार के कार्यक्रम आयेंगे—
(क) ग्रामीण क्षेत्रों में सतत् शिक्षा केन्द्रों की स्थापना ।
(ख) नियोजकों, मजदूर संगठनों और सम्बन्धित सरकारी एजेंसियों के द्वारा श्रमिकों की शिक्षा |
(ग) उच्च शिक्षा की संस्थाओं द्वारा सतत् शिक्षा ।
(घ) पुस्तकों के लेखन व प्रकाशन को तथा पुस्तकालयों और वाचनालयों को बड़े पैमाने पर प्रोत्साहन ।
(ङ) जन-शिक्षण और समूह शिक्षण के साधन के रूप में रेडियो, दूरदर्शन और फिल्मों का उपयोग।
(च) शिक्षार्थियों के समूहों और संगठनों का सृजन ।
(छ) दूर-शिक्षण के कार्यक्रम |
(ज) स्वाध्याय और स्वयं – शिक्षण में सहायता की व्यवस्था ।
(झ) आवश्यकता और रुचि पर आधारित व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रम ।
V. विभिन्न स्तरों पर शिक्षा का पुनर्गठन—
(1) शिशुओं की देखभाल और शिक्षा– शिशुओं की देखभाल और शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाएगा और इसे जहाँ भी सम्भव हो, समेकित बाल विकास सेवा कार्यक्रम (Integrated Child Development Services Programme) के साथ जोड़ा जाएगा प्राथमिक शिक्षा के सार्वजनीकरण के संदर्भ में शिशुओं की देखभाल के केन्द्र खोले जायेंगे ।
(2) प्रारम्भिक शिक्षा– नई शिक्षा नीति में स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की समस्या सुलझाने को उच्च प्राथमिकता दी जाएगी। यह सुनिश्चित किया जाएगा कि 1990 तक जो बच्चे 11 वर्ष के हो जायेंगे उन्हें विद्यालय में 5 वर्ष की शिक्षा या अनौपचारिक धारा में इसकी समतुल्य शिक्षा, अवश्य मिल जाए। इसी प्रकार 1995 तक 4 वर्ष की अवस्था वाले सभी बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा अवश्य दी जाएगी।
(3) ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड– प्राथमिक विद्यालयों में आवश्यक सुविधाओं की व्यवस्था की जाएगी। इनमें किसी भी मौसम में काम देने लायक कम से कम दो बड़े कमरे, आवश्यक खिलौने, ब्लैकबोर्ड, नक्शे, चार्ट और अन्य शिक्षण सामग्री शामिल हैं। हर स्कूल में कम से कम दो शिक्षक होंगे, जिनमें एक महिला होगी। यथासंभव जल्दी ही प्रत्येक कक्षा के लिए एक- एक शिक्षक की व्यवस्था की जाएगी। पूरे देश में प्राथमिक विद्यालयों की दशा को सुधारने के लिए एक क्रमिक अभियान शुरू किया जाएगा जिसका सांकेतिक नाम आपरेशन ब्लैक बोर्ड’ होगा।
(4) अनौपचारिक शिक्षा– ऐसे बच्चे जो बीच में स्कूल छोड़ गए हैं, या ऐसे स्थानों पर रहते हैं जहाँ स्कूल नहीं हैं या जो काम में लगे हैं, वे लड़कियाँ जो दिन में स्कूल में पूरे समय नहीं जा सकतीं, इन सबके लिए एक विशाल और व्यवस्थित अनौपचारिक शिक्षा का कार्यक्रम चलाया जाएगा।
(5) माध्यमिक ( सैकण्डरी) शिक्षा– इस स्तर पर विशेष संस्थाओं में व्यवसायों की शिक्षा के द्वारा और माध्यमिक शिक्षा की पुनर्रचना के द्वारा देश के आर्थिक विकास के लिए मूल्यवान जनशक्ति जुटाई जा सकती है। जिन क्षेत्रों में अभी सैकण्डरी शिक्षा नहीं पहुँची है वहाँ तक इसे पहुँचा कर अधिक सुलभ बनाया जाएगा। दूसरे क्षेत्रों में दृढ़ीकरण पर बल रहेगा ।
(6) गति निर्धारक विद्यालय (नवोदय विद्यालय )– देश के विभिन्न भागों में एक निर्धारित ढाँचे पर गतिनिर्धारक विद्यालयों की स्थापना की जाएगी। इनमें नई-नई पद्धतियों को अपनाने और प्रयोग करने की छूट रहेगी। मोटे तौर पर इन विद्यालयों का उद्देश्य होगा कि वे समता और सामाजिक न्याय के साथ शिक्षा में उत्कृष्टता लाएँ । अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए इन विद्यालयों में आरक्षण रहेगा। इन विद्यालयों में देश के विभिन्न भागों के मुख्यतया ग्रामीण क्षेत्रों के, प्रतिभाशाली बच्चे एक साथ रह कर पढ़ेंगे जिससे उनमें राष्ट्रीय एकता की भावना का विकास होगा। इन विद्यालयों में बच्चों को अपनी क्षमताओं के पूरे विकास का अवसर मिलेगा। सबसे बड़ी बात यह है कि ये विद्यालय समूचे देश में विद्यालय सुधार के कार्यक्रम में उत्प्रेरक का काम करेंगे। ये विद्यालय आवासीय और निःशुल्क होंगे।
(7) शिक्षा का व्यावसायीकरण– यह प्रस्ताव है कि उच्चतर माध्यमिक स्तर के विद्यार्थियों का दस प्रतिशत 1990 तक और 25 प्रतिशत 1995 तक व्यावसायिक पाठ्यचर्या में आ जाए । इस बात के लिए कदम उठाए जायेंगे कि व्यावसायिक शिक्षा पाकर निकले हुए विद्यार्थियों में से अधिकतर को या तो नौकरी मिले या वे अपना रोजगार स्वयं कर सके। व्यावसायिक पाठ्यक्रमों का पुनरीक्षण नियमित रूप से किया जाएगा। माध्यमिक स्तर पर पाठ्यक्रमों के विविधीकरण को बढ़ावा देने के लिए सरकार अपने अधीन की जाने वाली भर्ती की नीति पर भी पुनः विचार करेगी।
(8) उच्च शिक्षा—
(i) बड़ी संख्या में कॉलेजों को स्वायत्तता देने पर बल दिया जाएगा ताकि वर्तमान अनुबंधन की प्रथा के स्थान पर विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के बीच एक स्वतन्त्र और अधिक सृजनशील सम्बन्ध का जन्म हो ।
(ii) विशिष्टीकरण की माँग को बेहतर ढंग से पूरा करने के लिए पाठ्यक्रमों और कार्यक्रमों को नए सिरे से बनाया जाएगा।
(iii) शिक्षण विधियों को बदलने के प्रयास किये जायेंगे। दृश्यश्रव्य साधनों (Audio-Visual Aids) और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का प्रयोग प्रारम्भ होगा। विज्ञान और टेक्नोलॉजी के शिक्षाक्रम, शिक्षण सामग्री के विकास, अनुसंधान एवं अध्यापक प्रशिक्षण पर ध्यान दिया जाएगा। इसके लिए अध्यापकों की सेवा पूर्व तैयारी और बाद में उनकी सतत् शिक्षा आवश्यक होगी। अध्यापकों के कार्य का मूल्यांकन व्यवस्थित ढंग से किया जाएगा।
(9) डिग्री को नौकरी से अलग करना— डिग्री को नौकरी से अलग करने की योजना उन सेवाओं में शुरू की जाएगी जिनमें विश्वविद्यालय की डिग्री आवश्यक नहीं होनी चाहिए ।
VI. तकनीकी व प्रबन्ध शिक्षा— तकनीकी व प्रबन्ध शिक्षा संस्थानों को आधुनिक अधिगम सुविधाओं-पुस्तकालय, कम्प्यूटर से सज्जित किया जाएगा। तकनीकी संस्थानों तथा उद्योग-शोध व विकसित संस्थाओं, ग्रामीण व समुदाय विकास कार्यक्रमों तथा शिक्षा के पूरक क्षेत्रों के मध्य जाल प्रणालियाँ स्थापित की जाएगी ।
VII. शिक्षा व्यवस्था को कारगर बनाना– देश ने शिक्षा व्यवस्था में असीम विश्वास रखा है और लोगों को यह अधिकार है कि वे इस व्यवस्था से ठोस परिणामों की आशा करें। सबसे पहला काम तो इस तंत्र को सक्रिय बनाना है। यह आवश्यक है कि सभी अध्यापक पढ़ाएँ और सभी विद्यार्थी पढ़ें, इसके लिए निम्नलिखित युक्तियाँ अपनाई जाएँगी—
(i) अध्यापकों को अधिक सुविधायें और साथ ही उनकी अधिक जवाब देही ।
(ii) विद्यार्थियों के लिए सेवा में सुधार और साथ ही उनके सही आचरण पर बल ।
(iii) शिक्षा संस्थाओं को अधिक सुविधाएँ दिया जाना ।
(iv) राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर तय किए गए मानदंड के आधार पर शिक्षा संस्थाओं के कार्य के मूल्यांकन की पद्धति का सृजन ।
VIII. शिक्षा की विषय वस्तु और प्रक्रिया को नया मोड़ देना–
(1) सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य– शिक्षा की पाठ्यचर्या और प्रक्रियाओं को सांस्कृतिक विषय वस्तु के समावेश द्वारा अधिक से अधिक रूपों में समृद्ध किया जाएगा। इस बात का प्रयत्न होगा कि सौन्दर्य, सामंजस्य और परिष्कार के प्रति बच्चों की संवेदनशीलता बढ़े।
(2) मूल्यों की शिक्षा– हमारा समाज सांस्कृतिक रूप में बहु आयामी है इसलिए शिक्षा के द्वारा उन सार्वजनिक और शाश्वत् मूल्यों का विकास होना चाहिए जो हमारे लोगों को एकता की ओर ले जा सके।
(3) पुस्तकें और पुस्तकालय—
(i) जन शिक्षा के लिए की कीमत पर पुस्तकों का उपलब्ध होना बहुत ही जरूरी है। पुस्तकों की गुणात्मकता को सुधारने, पढ़ने की आदत का विकास करने और सृजनात्मक लेखन
और प्रोत्साहित करने के लिए कदम उठाए जायेंगे ।
(ii) पुस्तकों के विकास के साथ-साथ मौजूदा पुस्तकालयों के सुधार के लिए और नए पुस्तकालयों की स्थापना के लिए एक राष्ट्रव्यापी अभियान चलाया जाएगा।
(4) संचार माध्यम और शैक्षिक प्रौद्योगिकी– शैक्षिक प्रौद्योगिकी का प्रयोग उपयोगी जानकारी के लिए, अध्यापकों के प्रशिक्षण और पुनः प्रशिक्षण के लिए, शिक्षा की गुणवत्ता को सुधारने के लिए, कला एवं संस्कृति के प्रति जागरूकता और स्थाई मूल्यों के संस्कार उत्पन्न करने के लिए किया जाएगा। औपचारिक और अनौपचारिक दोनों प्रकार की शिक्षा में टेक्नोलॉजी का प्रयोग होगा ।
(5) कार्यानुभव– कार्यानुभव एक ऐसा उद्देश्यपूर्ण और सार्थक शारीरिक काम है जो सीखने की प्रक्रिया का अनिवार्य अंग है और जिससे समाज को वस्तुएँ या सेवाएँ मिलती हैं। यह अनुभव एक सुसंगठित और क्रमबद्ध कार्यक्रम के द्वारा दिया जाना चाहिए । कार्यानुभव की गतिविधियाँ विद्यार्थियों की रुचियों, योग्यताओं और आवश्यकताओं पर आधारित होंगी।
(6) मूल्यांकन प्रक्रिया और परीक्षा में सुधार– परीक्षा में इस प्रकार सुधार किया जाएगा जिससे कि मूल्यांकन की एक वैध और विश्वसनीय प्रक्रिया उभर सके और वह सीखने और सिखाने की प्रक्रिया में एक सशक्त साधन के रूप में काम आ सके । क्रियात्मक रूप से इसका अर्थ होगा—
(i) अत्यधिक संयोग और आत्मगतता के अंश को समाप्त करना ।
(ii) रटाई पर जोर को हटाना।
(iii) ऐसी सतत् और सम्पूर्ण मूल्यांकन प्रक्रिया का विकास करना जिससे शिक्षा के शास्त्रीय और शास्त्रतर पहलू समाविष्ट हो जाएँ और जो शिक्षण की पूरी अवधि में व्यापक रहे ।
(iv) अध्यापकों, विद्यार्थियों और माता-पिता के द्वारा मूल्यांकन की प्रक्रिया का प्रभावी उपयोग।
(v) परीक्षाओं के आयोजन में सुधार।
(vi) परीक्षा में सुधार के साथ-साथ शिक्षण सामग्री और शिक्षणविधि में सुधार ।
(vii) माध्यमिक स्तर से क्रमबद्ध रूप में सत्र प्रणाली का प्रारम्भ ।
(viii) अंकों के स्थान पर “ग्रेड” का प्रयोग ।
IX. शिक्षक—
(1) (i) किसी समाज में अध्यापकों के दर्जे से उसकी सांस्कृतिक सामाजिक दृष्टि का पता लगता है। कहा गया है कि कोई भी राष्ट्र अपने अध्यापकों के स्तर से ऊपर नहीं उठ सकता।
(ii) अध्यापकों को भर्ती करने की प्रणाली में इस प्रकार परिवर्तन किया जाएगा कि उनका चयन उनकी योग्यता के आधार पर व्यक्ति निरपेक्ष रूप से और उनके कार्य की अपेक्षाओं के अनुरूप हो सके।
(iii) शिक्षकों का वेतन और सेवा की शर्तें उनके सामाजिक और व्यावसायिक दायित्व के अनुरूप हों और ऐसी हों जिनसे प्रतिभाशाली व्यक्ति शिक्षण-व्यवसाय की ओर आकृष्ट हों।
(iv) व्यावसायिक प्रामाणिकता की हिमायत करने, शिक्षक की प्रतिष्ठा को बढ़ाने और व्यावसायिक दुर्व्यवहार को रोकने में शिक्षक संघों को अहम् भूमिका निभानी चाहिए ।
(2) अध्यापकों की शिक्षा—
(i) अध्यापकों की शिक्षा एक सतत् प्रक्रिया है और इसके सेवा पूर्व एवं सेवा-कालीन अंशों को अलग नहीं किया जा
सकता।
(ii) जिला शिक्षा और प्रशिक्षण संस्थान स्थापित किए जायेंगे जिनमें प्राथमिक विद्यालयों के अध्यापकों की ओर अनौपचारिक शिक्षा और प्रौढ़ शिक्षा के कार्यक्रमों के प्रशिक्षण की व्यवस्था होगी। इन संस्थाओं की स्थापना के साथ बहुत ही घटिया प्रशिक्षण संस्थाओं को बन्द किया जाएगा।
(iii) कुछ चुने हुए माध्यमिक अध्यापक प्रशिक्षण कॉलेजों का दर्जा बढ़ाया जाएगा ताकि वे राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण संस्थानों के पूरक के रूप में काम कर सकें।
X. शिक्षा का प्रबन्ध—
(1) राष्ट्रीय स्तर पर– केन्द्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड शैक्षिक विकास का पुनरावलोकन करेगा, शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए आवश्यक परिवर्तनों को सुनिश्चित करेगा और कार्यान्वयन सम्बन्धी देख-रेख में निर्णायक भूमिका अदा करेगा।
(2) भारतीय शिक्षा सेवा– शिक्षा के प्रबन्ध के उपयुक्त ढाँचे के निर्माण के लिए तथा इसे राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में लाने के लिए यह आवश्यक होगा कि भारतीय शिक्षा सेवा का एक अखिल भारतीय सेवा के रूप में गठन किया जाए।
(3) राज्य स्तर पर– राज्य सरकारें केन्द्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड की तरह राज्य शिक्षा सलाहकार बोर्ड स्थापित करेंगी।
(4) जिला तथा स्थानीय स्तर पर—
(i) उच्चतर माध्यमिक स्तर तक शिक्षा का प्रबन्ध करने के लिए जिला शिक्षा बोर्डों की स्थापना की जाएगी तथा राज्य सरकारें यथाशीघ्र इस सम्बन्ध में कार्यवाही करेंगी।
(ii) उपयुक्त निकायों (appropriate bodies) के माध्यम से स्थानीय लोग विद्यालय सुधार कार्यक्रमों में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करेंगे।
(5) स्वैच्छिक ऐजेन्सियाँ तथा सहायता प्राप्त संस्थाएँ– गैर सरकारी तथा स्वैच्छिक प्रयासों को जिनमें समाजसेवी सक्रिय समुदाय भी शामिल हैं, प्रोत्साहन दिया जाएगा और वित्तीय सहायता भी प्रदान की जाएगी। बशर्ते कि उनकी प्रबन्ध व्यवस्था ठीक हो ।
XI. संसाधन तथा समीक्षा– शिक्षा को राष्ट्रीय विकास एवं उत्तरजीविता के हेतु पूँजी निवेश का एक अत्यन्त आवश्यक क्षेत्र माना जाता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 में यह निर्धारित किया गया था कि शिक्षा में पूँजी निवेश में क्रमश: इस प्रकार वृद्धि की जायेगी कि वह राष्ट्रीय आय के 6 प्रतिशत के व्यय के स्तर तक पहुँच जाये । यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है कि इस नीति में निर्धारित कार्यक्रम हेतु कोष जुटाने के लिए अपेक्षाकृत दृढ़ संकल्प जुटाया जाये।
हमसे जुड़ें, हमें फॉलो करे ..
  • Telegram ग्रुप ज्वाइन करे – Click Here
  • Facebook पर फॉलो करे – Click Here
  • Facebook ग्रुप ज्वाइन करे – Click Here
  • Google News ज्वाइन करे – Click Here

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *