वेदना और कल्पना : भाव-सौंदर्य एवं शिल्प-सौंदर्य

वेदना और कल्पना : भाव-सौंदर्य एवं शिल्प-सौंदर्य प्रगतिवाद और नयी कविता के प्रमुख हस्ताक्षर गजानन माधव मुक्तिबोध की आरंभिक कविताओं में छायावाद का प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है। वैसे बाद में मुक्तिबोध छायावादी भावुकता के विरूद्ध ठोस यथार्थ की कविताएं लिखने लगे। लेकिन ‘वेदना और कल्पना’ में छायावादी रूझान से इंकार नहीं किया जा सकता … Read more

मुक्तिबोध : जीवन-यात्रा

मुक्तिबोध : जीवन-यात्रा मुक्तिबोध : जीवन-यात्रा गजानन माधव मुक्तिबोध का जन्म 13 नवम्बर 1917 को श्योपुर (ग्वालियर) में हुआ। मुक्तिबोध के परदादा वासुदेव जी जलगाँव (खानदेश, महाराष्ट्र) छोड़कर ग्वालियर आ बसे। मुक्तिबोध के शैशवावस्था की एक मजेदार घटना यह है कि जब वे छ: महीने के रहे होंगे, एक बंदर उन्हें झूले पर से उठा … Read more

प्रगतिवाद : अवधारणा और स्वरूप

प्रगतिवाद : अवधारणा और स्वरूप प्रगतिवाद सामाजिक यथार्थवाद के नाम पर चलाता गया वह साहित्यिक आंदोलन है जिसमें जीवन और यथार्थ के वस्तु- सत्य को उत्तर छायावाद काल में प्रश्रय मिला और जिसने सर्वप्रथम यथार्थवाद की ओर समस्त साहित्यिक चेतना को अग्रसर होन की प्रेरणा दी। प्रगतिवाद का उद्देश्य था साहित्य में उस सामाजिक यथार्थवाद … Read more

दुर्वादल : काव्य सौंदर्य

दुर्वादल : काव्य सौंदर्य सन् 1947 में नई कविता की पहली आहट की तरह अज्ञेय का कविता संग्रह ‘हरी घास पर क्षण भर’ प्रकाशित हुआ। संग्रह के फ्लैप की यह टिप्पणी गौरतलब है, ‘अज्ञेय के इस नये संग्रह में एक नयी ताजगी है। अनुभूति की कोमलता के साथ बुद्धि की ललकार भी।’ ‘दूर्वादल’ कविता इसी … Read more

अज्ञेय : कवि के रूप में

अज्ञेय : कवि के रूप में अज्ञेय : कवि के रूप में अज्ञेय का पूरा राम सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन था। इनका जन्म सन् 19।। ई0 में और मृत्यु सन् 1986 ई0 में हुआ। अज्ञेयजी ने जब कविता की भूमि पर कदम रखा, एक और तो छायावाद का लाजवंती रूप था, जिसे जीवन की धूप बर्दाश्त … Read more

नयी कविता : उद्भव, विकास और प्रवृत्तियाँ

नयी कविता : उद्भव, विकास और प्रवृत्तियाँ हिंदी साहित्य कोश के अनुसार, नयी कविता मूलत: 1953 ई0 में ‘नये पत्ते’ के प्रकाशन के साथ विकसित हुई और जगदीश गुप्त तथा रामस्वरूप चतुर्वेदी के संपादन में प्रकाशित होनेवाले संकलन ‘नयी कविता (1954) में सर्वप्रथम अपने समस्त संभावित प्रतिमानों के साथ प्रकाश में आयो। इस काल की … Read more

भीष्म का पश्चाताप : समीक्षा

भीष्म का पश्चाताप : समीक्षा आधुनिक हिंदी कविता में दिनकर रचित ‘कुरूक्षेत्र’ की सार्थकता रेखांकन योग्य है। यह आशा और उत्साह, दुख और पश्चाताप, ग्लानि और क्षोभ, वीरता और बलिदान आदि नाना भावों को व्यक्त करने वाला काव्य है। यह उस प्रकार का काव्य है, जिससे पराधीन जाति को स्वतंत्रता-संघर्ष से जूझने की शक्ति प्राप्त … Read more

युधिष्ठिर की ग्लानि : कथानक एवं काव्य सौंदर्य

युधिष्ठिर की ग्लानि : कथानक एवं काव्य सौंदर्य ‘महाभारत’ रामधारी सिंह दिनकर के प्रिय विषय (ग्रंथ) रहे हैं। महाभारत को आधार बनाकर उन्होंने कई रचनाएं की हैं। इन रचनाओं में कवि ने कई समकालीन प्रश्नों और समस्याओं को विमर्श का केंद्र बनाया। ‘युधिष्ठिर की ग्लानि’ कविता दिनकर जी की महत्त्वपूर्ण रचना ‘कुरुक्षेत्र’ के द्वितीय सर्ग … Read more

हाहाकार : कथानक

हाहाकार : कथानक हाहाकार : कथानक ‘हुंकार’ काव्य-संग्रह में संकलित रामधारी सिंह दिनकर की कविता ‘हाहाकार’ में जनता के दुख, उसकी घोड़ा और उसके घोर अभाव का हाहाकार स्पष्ट सुनायी देता है। इस कविता में कवि का आक्रोश अपने चरम पर है। वे प्रगतिवादी कवियों की तरह शोषकों की दमन नीति को जड़ से उखाड़ … Read more

कहने लगा चांद : भावार्थ

कहने लगा चांद : भावार्थ आलोचकगण भले ही दिनकर के काव्य-वैविध्य पर प्रश्न चिहन लगाये किंतु इसमें दो राय नहीं कि उनकी कविता का पूज छोटा नहीं है। कहने लगा चांद’ दिनकर की लीक से हटकर लिखी गई कविता है। इस कविता को कवि की प्रयोगवादी रचना भी मानी जा सकती है। यह कविता उनके … Read more