क्या आप सहमत हैं कि भारतीय राजनीति आज मुख्य रूप से वर्णनात्मक राजनीति की बजाय विकास राजनीति के आस-पास घूमती है ? बिहार के संदर्भ में चर्चा करें।

क्या आप सहमत हैं कि भारतीय राजनीति आज मुख्य रूप से वर्णनात्मक राजनीति की बजाय विकास राजनीति के आस-पास घूमती है ? बिहार के संदर्भ में चर्चा करें।

अथवा

वर्णनात्मक राजनीति तथा विकासात्मक राजनीति की अवधारणाओं का उल्लेख करें। बिहार के संदर्भ में इन दोनों का परीक्षण करते हुए अपना मत स्पष्ट करें।
उत्तर – भारतीय राजनीति एक गत्यात्मक (Dynamic) स्वरूप रखती है। हमारे यहां अनेक राजनीतिक दल हैं जिनका स्वरूप राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय है। वर्तमान समय में भारतीय राजनीति वणर्नात्मक राजनीति (Ascriptive Politics) के बजाय विकास राजनीति के आस-पास घूमती है। वर्णनात्मक राजनीति, राजनीति के उस पक्ष को व्यक्त करती है जिसमें भूमिकाएं एवं पद पूर्व निर्धारित कारकों जैसे- वंश, आयु, लिंग, जाति, धर्म आदि पर निर्भर होती हैं, व्यक्तिगत उपलब्धियों पर नहीं। भारत में परंपरागत राजनीति में वर्णनात्मक राजनीति की झलक दिखाई देती है जिसमें वंशवाद, परिवारवाद, जातिवाद अथवा हिन्दूवाद आदि अवधारणाओं पर बल दिया गया। परिणामस्वरूप राजनीति का स्वार्थपूर्ण दुरूपयोग हुआ। लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन भी हुआ।
वर्तमान समय में भारतीय राजनीति में विकासात्मक पक्ष को बढ़ावा दिये जाने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। गठबंधन सरकार, क्षेत्रीय दलों का उभार आदि का आधार देश के विकास को बढ़ावा देने के प्रमुख कारकों के रूप में दिखाई देते हैं। वर्तमान में मतदाता वंशवाद, परिवारवाद तथा धार्मिक आधार पर मतदान नहीं करते बल्कि ऐसे दलों को मत देते हैं जो गरीबी तथा बेरोजगारी उन्मूलन, आर्थिक विकास आदि पक्षों की बात करते हैं।
बिहार के संदर्भ में विकास राजनीति- किसी भी राज्य की राजनीति उसके समाज और उसकी अर्थव्यवस्था के बीच विकासात्मक संबंधों की देन होती है। श्रीकृष्ण सिंह बिहार के पहले कांग्रेसी मुख्यमंत्री थे और अंतिम मुख्यमंत्री कांग्रेस के थे डाक्टर जगन्नाथ मिश्रा। पिछले कई सालों से कांग्रेस का कोई मुख्यमंत्री बिहार में नहीं बन पाया है। गैर कांग्रेसी पार्टी का शासन बिहार में गैर कांग्रेसी शासन को सबसे पहले आगाज किया कर्पूरी ठाकुर ने जो पहले नेता थे, जिन्होंने दलित और पिछड़े समाज के लिए आवाज उठाया। आजादी के बाद बिहार में सबसे बड़ा छात्र आंदोलन हुआ था जिसका नेतृत्व जयप्रकाश नारायण ने किया और इस आंदोलन ने कई ऐसे राजनेता को जन्म दे दिया जो आज वर्तमान में बिहार की सत्ता की कमान संभाल रहें हैं लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार और रामविलास पासवान का जन्म इसी आंदोलन से हुआ था बिहार की सत्ता अब इन्हीं तीनों के इर्द-गिर्द घूमती है।
बिहार में कांग्रेस पार्टी का शासन (1947-1989) और दूसरा गैर कांग्रेसी पार्टी का शासन 1990 से अब तक है। 1947 से 1989 के वर्षो में गैर कांग्रेसी बिहार में सिर्फ दो बार मुख्यमंत्री बने जिनका नाम महामाया सिन्हा (1967, लगभग 1 साल) और कर्पूरी ठाकुर (1970, लगभग 7 महीने 1977, लगभग 18 महीने ) था। देश के अन्य राज्यों की तरह ही अतीत में बिहार की राजनीति में मुख्यतः कांग्रेस का दबदबा रहा है। बिहार में कई दशकों तक काँग्रेस का निर्बाध शासन रहा और यह 1990 तक जारी रहा। भारतीय चुनावी इतिहास में इस अवधि को काँग्रेस काल कहा जाता है। पर मंडल-आंदोलन के बाद की स्थिति ने राज्य की राजनीति की दिशा और दशा बदल दी । चुनावी राजनीति और राजनीतिक प्रतिनिधित्व अब पहले जैसे नहीं रहे। इस दौर में क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियों का उदय हुआ और व्यापक जनाधार वाले क्षेत्रीय नेता भी सामने आए, विशेषकर समाज के निचले तबके, जैसे अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), दलित, आदिवासी (अविभाजित बिहार में) और मुस्लिम | मंडलोत्तर राजनीति ने राज्य में काँग्रेस के अवसान की शुरुआत कर दी।
आजादी के बाद के बिहार के राजनीतिक इतिहास दौड़ाने से इसके तीन भिन्न चरणों का पता चलता है। इसका पहला चरण (1947-1967) काँग्रेस के वर्चस्व का काल है जब ऊंची जातियाँ इसकी सत्ता- संरचना के शीर्ष पर बैठी दिखती हैं। दूसरा चरण (1967-1990) को संक्रमण काल कहा जा सकता है जब राजनीतिक क्षेत्र में काँग्रेस के साथ-साथ ऊंची जातियों के प्रभुत्व में आ रही क्रमशः गिरावट और इसके साथ ही मध्य जातियों के धीमे किन्तु निरंतर उभरते प्रभाव को देखा जा सकता है। तीसरा चरण 1990 से अब तक का है। मंडलोत्तर राजनीति के तीन दशक की इस अवधि के दौरान बिहार की राजनीति में कई तरह के उतार-चढ़ाव आए हैं। अब देश के साथ बिहार में भी विकास की बयार बहने लगी है। अब लोग वर्णात्मकता वाली राजनीतिक व्यवस्था में यकीन नहीं करते। जो भी राजनीतिक पार्टी सबके हितों और विकास को अपना मूलमंत्र बनाती है, उसकी समय की मांग समझते हैं।
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