संथाल विद्रोह भारत में औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध प्रथम तीव्र प्रतिक्रिया थी | व्याख्या किजिए।

संथाल विद्रोह भारत में औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध प्रथम तीव्र प्रतिक्रिया थी | व्याख्या किजिए।

(43वीं BPSC/2001 )
अथवा
अंग्रेजों को पहली बार इतने बड़े स्तर पर इतने भारी विद्रोह का सामना करना पड़ा था- को सिद्ध करते हुए संथाल विद्रोह का सामान्य वर्णन करें।
संथाल विद्रोह ( 1855-56)
> नेता– सिद्धू एवं कान्हू
> क्षेत्र – भागलपुर, मानभूम एवं राजमहल की पहाड़ियों के आदिवासी
> कारण- जमींदारों एवं साहूकारों द्वारा शोषण, अत्याचार साथ ही पुलिस का दमन
इनके परंपरागत जमीन से इन्हें बेदखल किया जाना प्रारंभ में ये आधुनिक छोटानागपुर के आसपास बसे थे। लेकिन 1793 की भूमि के स्थायी बंदोबस्त से ये राजमहल की पहाड़ियों में चले गए। लेकिन वहां भी जमींदारों ने अपना दावा किया
परिणाम- अंग्रेजों ने इस आंदोलन को निर्ममता पूर्वक कुचल दिया। कैप्टन फगान के नेतृत्व में पैलापुर के मुठभेड़ में कान्हू मारा गया एवं सिद्धू पकड़ा गया
क्षेत्र का शासन गर्वनर जनरल के अधीन कर इसे ‘बहिर्गत क्षेत्र’ (Excluded Area) घोषित किया गया। यह क्षेत्र ‘संथाल परगना’ कहलाया
उत्तर – प्लासी की लड़ाई (1757) के पश्चात अंग्रेजों के अनेक सशस्त्र संघर्ष वनवासियों अथवा जनजातियों के साथ हुए। इन संघर्षों में संथालों का संघर्ष अद्वितीय था।
स्वतंत्रताप्रिय एवं परंपरागत रीति-रिवाजों को दृढ़ता से मानने वाले संथाल जनजाति के लोग आधुनिक छोटानागपुर के दक्षिण में बसे हुए थे। लेकिन 1793 की भूमि के स्थायी बंदोबस्त से यह भूमि जमींदारों की हो गई थी। इस कारण से ये लोग राजमहल की पहाड़ियों में चले गए एवं कठिन परिश्रम से उस क्षेत्र को खेती योग्य बनाया। परंतु, इस पर भी जमींदारों ने अपना दावा किया। साथ ही साहूकारों के अत्याचार एवं पुलिस दमन भी चरम पर थे।
इन्हीं अत्याचारों ने भयंकर असंतोष का रूप ले लिया जो 1855-56 में एक सशस्त्र विद्रोह के रूप में प्रकट हुआ जिसमें भागलपुर, मानभूम, राजमहल की जनजातियों ने भाग लिया। लगभग 400 गांवों के दस हजार संथाल धनुष, तीर, तलवार, भाले के साथ भगनीडीह गांव में एकत्र हुए और सिद्धू एवं कान्हू के नेतृत्व में स्वतंत्रता की घोषणा की – “अब हमारे ऊपर कोई सरकार, थानेदार, हाकिम नहीं है, संथाल राज्य स्थापित हो गया है । “
इन्होंने महाजन, जमींदार व अधिकारियों के घरों पर आक्रमण किए एवं डाकघर, पुलिस स्टेशनों, अंग्रेजों की फैक्ट्रियों को भी निशाना बनाया।
सिद्धू एवं कान्हू के नेतृत्व में इन्होंने 60,000 संथालों की सेना बनाई एवं नारा दिया- ‘जमींदार, महाजन, पुलिस और सरकारी कर्मचारियों का नाश हो । ‘ कुछ ही समय में आंदोलन ने भयंकर रूप ले लिया एवं जमींदारों, महाजनों एवं अफसरों की क्रूर हत्याएं की गईं, महिलाओं एवं बच्चों को भी नहीं छोड़ा गया। विद्रोहियों ने भागलपुर एवं राजमहल के बीच की रेल एवं डाक सेवाओं को खत्म कर दिया।
सरकार ने भी इस विद्रोह का कठोरता से दमन किया। कैप्टन फगान के नेतृत्व में पैलापुर नामक स्थान पर हुए मुठभेड़ में कान्हू सहित संथालों के कई प्रमुख नेता मारे गये। सिद्धू को भी बाद में पकड़ लिया गया। सरकार के ‘मार्शल लॉ’ लागू करने एवं अनेक संघर्षो के बाद धीरे-धीरे विद्रोह शिथिल होता गया। इसमें लगभग 10,000 संथाल मारे गए। यह सशस्त्र क्रांति भारत में ब्रिटिश राज के लिए लावे की तरह साबित हुई।
क्रांति के बाद इस क्षेत्र का शासन सीधे भारत के गवर्नर जनरल के अधीन कर दिया गया एवं इस क्षेत्र को ‘संथालपरगना’ नाम दिया गया और संथालों को विशेष सुविधाओं के नाम पर इसे ‘बहिर्गत क्षेत्र’ (Excluded Area) घोषित किया गया। इस प्रकार संथाल विद्रोह 1857 के पहले का सबसे ज्यादा उग्र आंदोलन था जिसे ब्रिटिश शासन को नियंत्रित करने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी। यह आंदोलन भविष्य के जनजातीय विद्रोह एवं संपूर्ण स्वतंत्रता संघर्ष के लिए प्रेरणा – स्रोत बना रहा। ‘क्रांतिकारी आतंकवाद’ में विश्वास रखने वाले क्रांतिकारी, संथालों की वीरता एवं संगठन शक्ति की प्रशंसा करते हैं।
हमसे जुड़ें, हमें फॉलो करे ..
  • Telegram ग्रुप ज्वाइन करे – Click Here
  • Facebook पर फॉलो करे – Click Here
  • Facebook ग्रुप ज्वाइन करे – Click Here
  • Google News ज्वाइन करे – Click Here

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *