बिहार राज्य में बढ़ती ऊर्जा की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए उन वैज्ञानिक प्रयासों का सुझाव दीजिए, जिन्हें आप लागू करना चाहेंगे।

बिहार राज्य में बढ़ती ऊर्जा की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए उन वैज्ञानिक प्रयासों का सुझाव दीजिए, जिन्हें आप लागू करना चाहेंगे।

अथवा
बिहार राज्य में ऊर्जा की आवश्यकता एवं उन वैज्ञानिक प्रयासों/ गैर-परम्परागत स्रोतों की चर्चा कीजिए जो ऊर्जा की समस्याओं को दूर कर सकें।
उत्तर – समकालीन परिप्रेक्ष्य में बिहार के सर्वांगीण विकास हेतु ऊर्जा आवश्यक घटक हो गई है। राज्य के विभाजन के बाद बिहार में ऊर्जा आधारित संरचना के विकास में अनेक बाधाएं आती रही हैं। इन बाधाओं को दूर करने हेतु वैज्ञानिक प्रयास अभी तक संतोषजनक नहीं रहे हैं।
बिहार में कोयले तथा खनिज तेल पदार्थ की उपलब्धता पूर्णत: शून्य है | ताप विद्युत उत्पादन के लिए कोयले की संपूर्ण मात्रा भी झारखण्ड की खानों से प्राप्त होता है। इसके अलावा वांछित पेट्रोलियम संसाधन की प्राप्ति असम से पाइप लाइन के द्वारा होती है। जल विद्युत के लिए प्रचुर जल संसाधन स्रोत हैं, लेकिन नदी के धरातल आकृति के अनुकूलता का अभाव है। वर्तमान में बिहार की विद्युत उत्पादन क्षमता मात्र 36% रह गई है। बिहार में प्रति व्यक्ति मात्र 16.7% विद्युत उपलब्ध है, जबकि अन्य राज्यों में इससे बहुत ज्यादा है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् 1948 में विद्युत (आपूर्ति) अधिनियम पारित हुआ, जिसके तहत राज्य स्तर पर विद्युत के समेकित विकास हेतु ‘बिहार राज्य विद्युत परिषद्’ का गठन 1 अप्रैल, 1958 ई. को हुआ। जबकि अन्य राज्यों ने इस अधिनियम का लाभ उठाकर 1949 से ही अपने यहां विद्युत परिषद् का गठन कर लिया था। अपने संयंत्र स्थापना में पिछड़ने
से परियोजना लागत में भी भारी वृद्धि हुई और प्रारंभ से ही उत्पादन, वितरण और विद्युत मांग का बना में ऊर्जा के संकट निम्न कारणों से हैं
>  बिहार में ऊर्जा के क्षेत्र में निजी निवेश नहीं होने के कारण इसका पर्याप्त विस्तार नहीं हो सका। विद्युत उत्पादन केन्द्रों में मशीनें पुरानी पड़ रही हैं। इनमें बदलाव की प्रक्रिया शुरू नहीं हो पाई है।
> विद्युत संकट का एक कारण सरकारी अधिकारी एवं राज्य विद्युत परिषद् की अकुशलता एवं अनियमितताओं का परिणाम है। नौकरशाही में लापरवाही आ जाने और राजनैतिक हस्तक्षेप बढ़ जाने से अकुशल प्रबंधन की स्थिति उत्पन्न हो गई। वित्तीय अभाव ने प्रबंधन की अकुशलता को और भी गंभीर बना दिया।
> बिहार में बिजली की चोरी भी एक बड़ी समस्या है। इसमें सरकारी राजस्व की हानि होती है। चोर बिजली के तार काट लेते हैं, जिससे काफी लम्बे समय तक विद्युत उत्पादन में रुकावट होती है।
> बिजली के वितरण एवं संरक्षण भी एक समस्या है जिसकी वजह से बिजली की अधिकांश मात्रा का क्षय हो जाता है
> परंपरागत ऊर्जा स्रोतों तक पहुंच भी बिहार में एक महत्वपूर्ण समस्या है। तकनीकी अभाव के कारण प्रचुर संसाधन होते हुए भी लोगों को भू-तापीय विद्युत ऊर्जा पर ही निर्भर होना पड़ता है।
 इन तमाम संकटों को दूर कर ही विद्युत ऊर्जा की कमी को पूरा किया जा सकता है। इसके लिए आवश्यक है इन पर वैज्ञानिक प्रयास किए जाएं। इसके लिए कुछ प्रभावी कदम उठाए जाने की जरूरत है
> राज्य में गैर-परंपरागत ऊर्जा स्रोतों को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए ।
> जहां अधिक विद्युत चोरी होती है, वहां विशेष निगरानी दल की व्यवस्था की जानी चाहिए। बिजली के तारों की चोरी रोकने का सबसे अच्छा उपाय यह है कि तारों को जमीन के अन्दर से ले जाने की व्यवस्था की जानी चाहिए।
> बायोगैस के प्रचुर संसाधन बिहार में मौजूद हैं, इस तकनीक को अपना कर वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा दिया जाए।
> एक नियामक बोर्ड बनाकर विद्युत क्षेत्र को निजीकृत कर देना चाहिए तथा सुनिश्चित करना चाहिए कि निजी उद्यम पिछड़े क्षेत्रों एवं आर्थिक रूप से पिछड़े व्यक्तियों को रियायती दरों पर अपने विद्युत केन्द्रों से बिजली बांटे जाएं।
> अगनूर परियोजना, कलेर (अरवल), त्रिवेणी संयोजक परियोजना, ओबरा (औरंगाबाद), डेलाबाग लघु परियोजना, डेहरी (रोहतास), जयनगर-नोखा लघु परियोजना, नोखा (रोहतास) आदि परियोजनाएं बिहार में कार्यशील हैं, आवश्यकता है इन परियोजनाओं की क्षमता को बढ़ाना एवं उसकी निगरानी करना । इसके अलावा अन्य नदियों पर जल-विद्युत के स्रोत तलाशे जाएं जिनसे पन – बिजली परियोजना का और अधिक विकास हो सके।
उपर्युक्त सुधारों से आवश्यक ऊर्जा के अभाव को पूरा करने में हल खोजा जा सकता है। आवश्यकता है सरकार की निष्ठा एवं आमजन की भागीदारी की, जिनसे बिहार संवृद्धि की राह पर तरक्की कर सके।
> परंपरागत ऊर्जा स्रोतों की जगह नवीन वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की चर्चा करें।
> विद्युत (आपूर्ति) अधिनियम, 1948 की खामियां एवं खूबियां ।
> बिहार राज्य विद्युत परिषद् का गठन 1 अप्रैल, 1958 ई. के नवीकरण पर बल ।
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